‘लिज्जत पापड़’ की सफलता की 27 अनसुनी बातें !

जब भी हम पापड़ का नाम लेते है तो सबसे पहले हमारे ज़हन में लिज्जत पापड़ का नाम आता है जो पिछले 50 सालों के पापड़ के कारोबार में सबसे ऊपर है. 90 के दशक में लिज्जत पापड़ का कारोबार इतना फ़ैल गया था कि इस कम्पनी ने अखबारों और टीवी पर विज्ञापन देना शुरू कर दिया था. अगर हम 90 के दशक के दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले विज्ञापनों की बात करें, तो लिज्जत पापड़ को हम कभी नही भूल सकते. 80 रूपये की पूंजी से शुरू होने वाला ये कारोबार आज 500 करोड़ रूपये से ज्यादा का हो गया है.

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लिज्जत पापड़ की सफलता की 27 अनसुनी बातें.

तो चलिए लिज्जत पापड़ के सफर पर और पढ़िए इससे जुड़े कुछ लाजवाब तथ्य…..

1. साल 1959 में जब जसवंती बेन का मकसद सिर्फ परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिये कुछ पैसे कमाना था. फिर उन्होंने अपने साथ और बेरोजगार महिलाओं को जोड़कर 100 रुपये का कर्ज लिया और पापड़ बनाने का काम शुरु किया.

2. सिर्फ सात महिलाओं के साथ शुरू होने वाला यह छोटा सा व्यापार जहां आज 40,000 महिलाएं उनके यहां काम करती हैं और हर साल 200 करोड़ रुपये का एनुअल प्रॉफिट होता है.

3. इन सात महिलाएं जसवंतीबेन जमनादास पोपट, पार्वतीबेन रामदास ठोदानी, उजमबेन नरानदास कुण्डलिया, बानुबेन तन्ना, लागुबेन अमृतलाल गोकानी, जयाबेन विठलानी और सातवीं महिला का नाम किसी को नहीं पता.

4. इस कम्पनी में जो महिलाएं काम करती हैं वो अशिक्षित हैं लेकिन वो इसे अपनी कमी नहीं मानतीं और यही इस कारोबार की सफलता का राज है. ये सभी महिलाएं पापड़ों की क्वालिटी का खास ख्याल रखती हैं.

5. सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरे भारतवर्ष मे जसवंती बेन के लिज्जत पापड़ फेमस हैं. और इसी वजह से इन्हें इकनॉमिक टाइम्स अखबार की ओर से साल 2002 में महिला उद्यमी के तौर पर अवार्ड भी दिया गया.

6. लिज्जत पापड़ फर्म में आज भारत के लगभग 50 हजार लोग काम करते हैं.

7. इस फर्म की मुख्य शाखा मुम्बई में है और पुरे भारतवर्ष में इसकी 81 शाखाएं हैं. ग्रामीण इलाकों के इस व्यवसाय ने किस तरह ऊंचाइयों को छुआ ये तो बस उसमें मेहनत करने वाली वे महिलायें ही जानती होंगी.

8. इस फर्म की सातों गुजराती महिलाओं ने Servants of India Society के अध्यक्ष और एक सामाजिक कार्यकर्ता छगनलाल पारेख से 100 रूपये उधार लिए. इसके बाद उन्होंने एक घाटे में चल रहे उद्यम से पापड़ बनाने वाली मशीन को खरीद लिया और इसके साथ ही कुछ पापड़ बनाने के जरुरी सामान भी खरीदे.

9. उसके बाद 15 मार्च 1959 को ये सभी गुजराती महिलायें अपने बिल्डिंग की छत पर गयी और सारे सामानों की मदद से उन्होंने पापड़ के चार पैकेट बनाये. अब इन्होंने इन पापड़ों को एक जाने माने व्यापारी भुलेश्वर को बेचना शूरू कर दिया.

10. शुरुआत से इन महिलाओं ने प्रण किया था कि वो अपने इस व्यवसाय के लिए किसी से चंदा नही मांगेगी, चाहे उनका वो व्यवसाय घाटे में ही क्यों ना चला जाये.

11. अब छगनलाल पारेख उनके इस काम में उनका मार्गदर्शक बने गये. पहले तो इन महिलाओं ने दो प्रकार के पापड़ बनाये, जिसमें से एक क्वालिटी को वो सस्ते दामों पर बेचते थे.

12. छगनलाल ने उन महिलाओं को स्टैण्डर्ड पापड़ बनाने के सुझाव दिया और क्वालिटी से समझौता ना करने को कहा. छगनबापा व्यापार में माहिर तो थे ही साथ ही साथ वो इन महिलाओं का लेखा-जोखा भी सम्भालते थे.

13. धीरे-धीरे लिज्जत कोआपरेटिव सिस्टम बन गया. इसमें शुरुआत में छोटी लड़किया भी काम कर सकती थीं लेकिन बाद में इसमें जुड़ने की न्यूनतम आय 18 वर्ष कर दी गयी.

14. 3 महीनों के अंदर पापड़ बनाने वाली औरतों की संख्या 25 हो चुकी थी. अब कुछ महिलाएं अपने साथ पापड़ बनाने के कुछ जरुरी सामान जैसे बर्तन, स्टोव आदि साथ लाती थीं जिससे काफी आर्थिक मदद होती थी. पहले साल में इसकी वार्षिक सेल 6,196 रूपये थी.

15. टूटे हुए पापड़ो को वे सभी अपने पडोसियों को मुफ्त में बाँट दिया करती थीं. शुरुआती सालों में तो महिलाओं को बारिश की मौसम के चार महीनों में अपने इस काम को ठप्प करना पड़ता था क्योंकि बारिश के मौसम में पापड़ सूखते नहीं थे. अगले साल इन्होंने इसका भी इलाज ढूंढ निकाला और उन्होंने एक खटिया और स्टोव खरीद लिया.

16. अब इन पापड़ो को खटिया पर सुखाया जाता था और उसके नीचे स्टोव से आग जलाई जाती थी जिससे बारिश के मौसम में भी उनका काम ठप्प नहीं हुआ.

17. इस ग्रुप ने माउथ पब्लिसिटी और और अखबारों में उनके आर्टिकल के जरिये खूब नाम कमाया. इस पब्लिसिटी में उनको काफी फायदा हुआ और कई औरतें इस उद्यम के साथ जुड़ती गयीं.

18. दूसरे साल में इस ग्रुप में 100 से 150 महिलाएं जुड़ गयी थीं जो तीसरे साल में 300 के पार पहुंच चुकीं थीं. अब उनका कारोबार इतना फ़ैल गया था कि इसकी स्थापना करने वाली सातों महिलाओं की छत कम पड़ गयी थी इसलिए उन्होंने अपने सदस्यों को घर पर ले जाकर पापड़ बनाने की सलाह दी. पापड़ बनने के बाद उन्हें वापस लाकर तोला जाता था और फिर पैक कर दिया जाता था.

19. साल 1962 में इस ग्रुप ने अपने पापड़ का नामकरण किया और ‘लिज्जत पापड़’ नाम रखा. यह एक गुजराती शब्द है जिसक अर्थ स्वादिष्ट होता है.

20. इसके नामकरण के लिए एक कांटेस्ट रखा गया था और लिज्जत नाम देने वाली धीरजबेन रुपारेल इस कांटेस्ट में विजयी हुयीं जिसके लिए उन्हें 5 रूपये का पुरुस्कार मिला. इस ऑर्गेनाइजेशन का नाम “श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़” रखा.

21. साल 1962-63 में इस ग्रुप की वार्षिक आय 1 लाख 82 हजार पहुंच गयी. जुलाई साल 1966 को लिज्जत को Societies Registration Act 1860 के तहत रजिस्टर किया गया. इसी साल Khadi Development and Village Industries Commission के अध्यक्ष देवधर में खुद लिज्जत का इंस्पेक्शन किया और 8 लाख की पूंजी का निवेश किया.

22. अब लिज्जत पापड़ की अपार सफलता के बाद लिज्जत ने खाखरा, मसाला, वादी और बेकरी प्रोडक्ट भी शूरू कर दिए. 70 के दशक में लिज्जत ने आटा चक्की, प्रिंटिंग डिवीज़न और पैकिंग डिसिशन की मशीने भी लगा दीं.

23. इस ग्रुप में माचिस और अगरबती बनाने का काम भी शुरू किया था लेकिन सफल नही हुआ. 80 के दशक में लिज्जत ने मेलो और प्रदर्शनियों में भाग लेना शुरू कर दिया जिससे लोगों के बीच लिज्जत नाम का काफी प्रसार हुआ.

24. इसके बाद अखबारों, टीवी और रेडियो के जरिये भी लिज्जत का काफी प्रसार किया गया. 90 के दशक में लिज्जत ने अपना व्यापार विदेशो में फैलाना शुरू कर दिया. साल 2002 में लिज्जत का टर्न ओवर 10 करोड़ तक पहुंच गया.

25. आज इस ग्रुप के पूरे भारत देश में 62 शाखाओं में 42 हजार लोग काम करते है. 15 मार्च 2009 को लिज्जत ने 50वीं वर्षगाँठ मनाई थी.

26. लिज्जत ग्रुप की प्रत्येक सदस्य को “बहन” सम्बोधित किया जाता है और वह “श्री महिला उद्योग लिज्जत पापड़ की सह-स्वामित्वधारी मानी जाती हैं. लिज्जत नाम चुनाव स्वाद, गुणवत्ता और औरतों द्वारा स्वंतंत्र आजीविका कमाने की प्रतिष्ठा की अच्छाई को ध्यान में रखकर किया गया था.

27. सालों से दो स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता छगन पारेख और पुरुषोतम दत्तानी द्वारा उद्मीय महिलाओं का संरक्ष्ण किया जाता है क्योंकि उन्होंने ही 100 रूपये की पूंजी से प्रारम्भिक बीज पूंजी की व्यवस्था की थी. लिज्जत आज इतना बड़ा ब्रांड है जिसको अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार मिले हैं.

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