Ayodhya

संपूर्ण अयोध्या कांड, मस्जिद से मंदिर तक, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में क्या कहा

Explainer

अयोध्या के रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जगह को बांटने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने पूरी विवादित ज़मीन रामलला को दिये जाने का आदेश दिया. सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में कहीं पर 5 एकड़ की वैकल्पिक ज़मीन देने का आदेश दिया और निर्मोही अखाड़े का दावा खारिज कर दिया. कोर्ट ने सरकार को ३ महीने में मंदिर निर्माण और उसके प्रबंधन के लिए ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया. जिसमें निर्मोही अखाड़े को भी कुछ प्रतिनिधित्व मिलेगा.

फैसला सुनाते वक्त सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा-

बाबरी मस्जिद को मीर बाकी ने बनाया था.

कोर्ट को लोगों की आस्था को स्वीकार करना चाहिए

रामजन्मभूमि लीगल पर्सनैलिटी नहीं है, लेकिन देवता (राम लला) न्यायिक पर्सन है

ASI की रिपोर्ट को अनदेखा नहीं किया जा सकता

ASI की रिपोर्ट में रिपोर्ट में कहा गया था कि वहां एक मंदिर था

बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनी थी. विवादित भूमि के नीचे वाला ढांचा इस्लामिक मूल का नहीं था

इतिहास दर्शाता है कि हिंदू का विश्वास रहा है कि अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि है

ASI ने यह साफ नहीं किया था कि मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को गिराया गया था

सुन्नी वक्फ बोर्ड एडवर्स पजेशन का दावा नहीं कर सकता

यह साफ है कि मुस्लिम अंदर वाले कोर्टयार्ड में नमाज पढ़ते थे और हिंदू बाहर वाले कोर्टयार्ड में पूजा करते थे

४० दिन चली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर 6 अगस्त से शुरू हुई रोजाना सुनवाई 16 अक्टूबर को पूरी हुई थी. 40 दिनों की यह सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) रंजन गोगोई की अगुवाई वाली 5 जजों की संविधान बेंच ने की. इस बेंच में सीजेआई गोगोई के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल रहे.

क्या था अयोध्या का पूरा विवाद?

आयोध्या मामले में सिर्फ हिंदू मुस्लिम नहीं थे बल्कि इस मामले के 3 मुख्य याचिकाकर्ताओं में से दो- निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान हिंदू पक्ष से रहे. इन दोनों ने ही विवादित जमीन पर अपना-अपना हक जताया. जहां निर्मोही अखाड़ा की दलील थी कि लंबे समय से भगवान राम की सेवा करने की वजह से उसे जमीन मिलनी चाहिए, वहीं रामलला विराजमान ने कहा था कि इस जमीन पर मालिकी सिर्फ देवता की ही हो सकती है.

कोर्ट में किस तरह आगे बढ़ा मामला?

यह मामला पहली बार साल 1885 में कोर्ट पहुंचा था. जब फैजाबाद कोर्ट में महंत रघुबर दास ने एक याचिका दाखिल की. इस याचिका में उन्होंने विवादित ढांचे के पास राम चबूतरे पर मंदिर बनाने की अनुमति मांगी थी. हालांकि फैजाबाद कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया था. इसके बाद साल 1949 में एक बड़ी घटना हुई, जब 22-23 दिसंबर की रात विवादित ढांचे के मुख्य गुंबद के पास राम लला की मूर्तियां रख दी गईं. स्थानीय प्रशासन ने दंगे भड़क जाने की आशंका जताते हुए इन मूर्तियों को वहां से हटाने से इनकार कर दिया.

29 दिसंबर 1949 को फैजाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने पूरी जगह को कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर (CrPC) की धारा 145 के तहत विवादित साइट घोषित कर दिया और इसका मालिकाना हक साबित होने तक इसे अटैच करके स्थानीय प्रशासन के हवाले कर दिया.

इसके बाद साल 1950 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के नेता गोपाल विषारद ने फैजाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में याचिका दाखिल करके राम लाल की पूजा का अधिकार मांगा. उसी साल परमहंस रामचंद्र दास ने भी एक याचिका दाखिल की, उन्होंने भी रामलला की मूर्तियों की पूजा का अधिकार मांगा.

साल 1959 में निर्मोही अखाड़े ने विवादित भूमि का संरक्षक होने का दावा करते हुए इसके पूर्ण स्वामित्व (कंप्लीट पजेशन) लिए एक याचिका दाखिल की.

इसके बाद साल 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने ये घोषित किए जाने की मांग के साथ याचिका दाखिल की कि बाबरी मस्जिद वक्फ की संपत्ति है और उसके आसपास की जगह कब्रिस्तान है.

साल 1989 में भगवान रामलला विराजमान और श्री रामजन्मभूमि की तरफ से इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज देवकी नंदन अग्रवाल ने विवादित साइट के मालिकाना हक के लिए एक याचिका दाखिल की.

14 अगस्त 1989 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित ढांचा को लेकर यथास्थिति बनाए रखने का अंतरिम आदेश दिया था. इसके बाद यह मामला लंबे समय तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा. इसी बीच 6 दिसंबर 1992 को कई हिंदू संगठनों के कारसेवकों ने विवादित ढांचे को ढहा दिया.

3 अप्रैल, 1993 को केंद्र सरकार 2.77 एकड़ की कुल विवादित भूमि के 67.703 एकड़ हिस्से पर अधिग्रहण के लिए ‘एक्यूजिशन ऑफ सर्टेन एरिया एट अयोध्या एक्ट’ लेकर आई. इस कानून के खिलाफ कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल हुईं, जिनमें से एक इस्माइल फारुखी की याचिका थी.

24 अक्टूबर 1994 को सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फारुखी की याचिका पर कहा थामस्जिद इस्लाम की धार्मिक गतिविधियों का अभिन्न हिस्सा नहीं है. नमाज कहीं भी पढ़ी जा सकती है, इसलिए भारतीय संविधान के प्रावधान इसका (मस्जिद) अधिग्रहण प्रतिबंधित नहीं करते.

अप्रैल 2002 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह तय करने के लिए सुनवाई शुरू कर दी कि विवादित भूमि पर किसका मालिकाना हक है. इसी साल हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) को विवादित भूमि का सर्वे करने के लिए कहा. इसके बाद ASI ने 2003 में अपनी 574 पेजों की रिपोर्ट सौंपी, जिसमें विवादित भूमि के नीचे प्राचीन ढांचे के सबूत मिलने की बात कही गई.

इलाहाबाद कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?

30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट की 3 जजों की बेंच ने 2:1 के बहुमत से अयोध्या मामले पर अपना फैसला सुनाया था और 2.77 एकड़ की विवादित भूमि को मामले के 3 मुख्य पक्षकारों- निर्मोही अखाड़ा, राम लला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया था. 3 जजों की इस बेंच में जस्टिस एसयू खान, जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस धरमवीर शर्मा शामिल थे.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस आदेश पर मामले के तीनों मुख्य पक्ष ही सहमत नहीं हुए और उन्होंने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी. सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ हिंदू पक्ष और मुस्लिम पक्ष की कम से कम 14 याचिकाएं दाखिल हुईं.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का हल मध्यस्थता के जरिए निकालने की कोशिश भी की. हालांकि इस कोशिश के नाकाम रहने के बाद 5 जजों की संविधान बेंच ने इस मामले पर रोजाना सुनवाई शुरू की.