Gulshan Kumar

गुलशन कुमार की हत्या कैसे हुई, जूस की दुकान से टी सीरीज तक का सफर

Vyakti Vishesh

यूट्यूब पर अगर सबसे बड़े चैनल की बात की जाए, तो दो चैनल रेस में हैं. टी सीरीज़ और प्युडीपाई. ये दोनों ही चैनल हर दूसरे दिन एक दूसरे को पछाड़ते रहते हैं. इनके सब्सक्राइबर्स की संख्या 10 करोड़ के आस पास है. आज बात टी सीरीज की करेंगे और उसे स्थापित करने वाले गुलशन कुमार की करेंगे.

जूस की दुकान पर गुलशन कुमार

गुलशन कुमार का पूरा नाम गुलशन कुमार दुआ था. गुलशन कुमार का जन्म 5 मई साल 1956 में दिल्ली हुआ. शुरुआती जिंदगी में गुलशन कुमार ने दिल्ली के दरियागंज में जूस की दुकान भी चलाई. अगर आप उनकी पढ़ाई लिखाई और परिवारिक पृष्ठभूमि को देखें तो ऐसा कहीं से नहीं लगता है कि वो एक दिन म्यूजिक इंडस्ट्री के बादशाह बनेंगे. लेकिन वो आगे चलकर म्यूजिक इंडस्ट्री के बेताज बादशाह बने.

1980 के दशक में गुलशन कुमार के पिता ने कैसेट्स रिकॉर्डिंग और रिपेयरिंग की दुकान खोली थी. वहीं से उन्हें संगीत से लगाव पैदा हो गया. जूस की दूकान से ज्यादा रस उन्हें संगीत के कारोबार में नज़र आया और उन्होंने इस ओर कदम बढ़ा दिए. 

नोएडा से सफर की शुरुआत

उत्तरप्रदेश के ज़िले नोएडा में उन्होंने छोटा सा रिकॉर्डिंग स्टूडियो खोला और सुपर कैसेट्स कंपनी की स्थापना की. शुरुआत में गुलशन कुमार भजन और भक्ति गीत स्थानीय गायकों की आवाज़ में रिकॉर्ड करते और इनके कैसेट सस्ते दामों पर बेचते. धीरे-धीरे व्यापर बढ़ने लगा तो उन्होंने फ़िल्म संगीत के व्यवसाय में उतरने का फ़ैसला किया.

भारतीय संगीत के कारोबार जगत में उन दिनों एचएमवी जो कि अब सारेगामा है, का बोलबाला था. एचएमवी का लोगो- माइक्रोफ़ोन के सामने बैठा हुआ कुत्ता था. 

कॉपीराइट का तोड़ निकाला

कॉपीराइट के तहत एक कंपनी के पास किसी फ़िल्म या किसी कलाकार के संगीत या प्रोगाम के अधिकार होते हैं. दूसरी कंपनियां पूर्व में प्रदर्शित फ़िल्म या किसी कलाकार के प्रोगाम के कैसेट्स नहीं बना सकती थीं. इसलिए एचएमवी के ही कैसेट्स बिकते थे. एचएमवी उन्हें मनमाने दामों पर बेचती थी.

1990 की शुरुआत से कुछ पहले कैसेट्स रिकॉर्डरों के बाजार में ज़बरदस्त उछाल आया जिससे प्री-रिकार्डेड कैसेट्स की मांग इतनी बढ़ गई कि इसे एचएमवी जैसी कंपनियां पूरा नहीं कर पा रही थीं. दूसरे कुछ नहीं कर सकते थे क्योंकि कॉपीराइट का मसला था. यानी की बाजार में संभावनाएं थी और विकल्प ज्यादा नहीं थे. 

गुलशन कुमार ने इंडियन कॉपीराइट एक्ट को बारीकी से समझा और उसका तोड़ निकाल लिया. कॉपीराइट एक्ट मूल प्रोग्राम को किसी और कंपनी को जारी करने की इजाज़त तो नहीं देता पर उसकी नक़ल करने से नहीं रोकता. 

यानी अगर किसी फ़िल्म के म्यूज़िक राइट्स एचएमवी के पास थे तो अन्य कंपनी उस म्यूज़िक को जारी तो नहीं कर सकती पर उसकी नक़ल बना सकती है. 

नये कलाकारों को तरजीह

गुलशन कुमार ने संघर्षरत कलाकारों की आवाज़ में पुरानी फ़िल्मों के गाने रिकॉर्ड किये और एचएमवी से लगभग एक तिहाई दामों पर कैसेट्स निकाल दिए. लोगों को लता मंगेशकर की आवाज़ तो सुनने को नहीं मिली, पर उनसे मिलती-जुलती आवाज में उनके गाये हुए गाने उपलब्ध हो गए. बस, फिर क्या? टी-सीरीज़ की गाड़ी निकल पड़ी.

बड़ी और स्थापित कंपनियां अभी भी अपनी ख़ुमारी में थीं. एचएमवी कंपनी के अधिकारियों को लगता था कि मौलिक संगीत सुनने वाले इस भोंडी नकल को पसंद नहीं करेंगे. 

धीरे-धीरे मौलिक गानों की कैसेट्स से ज़्यादा नक़ल की गई कैसेट्स बिकने लगीं और टी-सीरीज़ बाज़ार में छा गई. उसके साथ-साथ अनुराधा पौडवाल, कुमार सानू, उदित नारायण, सोनू निगम और विपिन सचदेव जैसे गायकों की एक नई फौज भी उभरी. वहीं संगीतकारों में नदीम-श्रवण और आनंद-मिलिंद जैसी जोड़ियां बॉलीवुड में आईं. 

बाजार पर कब्जा

गुलशन कुमार अब एक नाम बन चुका था और टी-सीरीज़ एचएमवी का सबसे बड़ा ब्रांड. पर वे यहीं नहीं रुके. उनका कॉमनसेंस उन्हें बार-बार समझा रहा था कि यह सब क्षणिक और तात्कालिक है. 

टिके रहने और आगे का सफ़र तय करने के लिए कुछ नया, साहसिक और मौलिक करना होगा. उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा जुआ खेला और रिलीज़ होने वाली कंपनियों के म्यूज़िक राइट्स ऊंचे दामों पर खरीदने शुरू कर दिए. 

इससे एचएमवी, टिप्स और वीनस जैसी स्थापित कंपनियों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई. म्यूज़िक इंडस्ट्री पर टी-सीरीज़ का राज हो गया. एक समय आया जब सुपर कैसेट्स ने लगभग 65 फीसदी बाजार पर कब्ज़ा कर लिया था.

फिल्मों का निर्माण

गुलशन कुमार ने कई फिल्मों का निर्माण भी किया. इनमें ‘लाल दुपट्टा मलमल का’, ‘आशिक़ी’ और ‘दिल है कि मानता नहीं’ प्रमुख थीं. 1990 के दौर में संगीतकार नदीम-श्रवण की जोड़ी सबसे ज़्यादा डिमांड में थी. इसको बनाने वाले गुलशन कुमार ही थे. नदीम ने ‘हाय ज़िंदगी’ नाम से एक म्यूज़िक अल्बम निकाला जिसके अधिकार टी-सीरीज़ के पास थे. इस अल्बम में नदीम ने कुछ गाने भी गाए थे. यह खास नहीं चला. बताया जाता है कि नदीम को लगा कि गुलशन कुमार ने इसकी मार्केटिंग सही तरह से नहीं की.

गुलशन कुमार और नदीम में टकराव

नदीम के कई बार कहने के बाद भी गुलशन कुमार ने अपना रुख नहीं बदला, जिससे नदीम खफ़ा हो गए. गुलशन कुमार की एक ख़ास बात थी कि वे नए चहरे और नाम को प्रमोट करते थे. नदीम-श्रवण अब स्थापित जोड़ी थी, सो उन्होंने अन्य जोड़ियों को मौका देना शुरू किया. कहा जाता है कि इससे मनमुटाव और बढ़ गया. फिर, जिन फ़िल्मों में नदीम-श्रवण संगीत देते थे, उनके म्यूज़िक राइट्स गुलशन कुमार ने लेने बंद कर दिए. चूंकि सुपर कैसेट्स 65 फीसदी बाजार पर कब्ज़ा जमाये बैठी थी, नदीम को लगा कि उनका संगीत एक बड़े तबके तक नहीं पहुंचेगा.

अबू सलेम को गुलशन कुमार की सुपारी

ऐसा कहा जाता है कि इसी मनमुटाव और घबराहट के चलते, नदीम ने अंडरवर्ल्ड के अबू सलेम से संपर्क साधा और गुलशन पर उन्हें प्रमोट करने का दवाब बनाया. बताया जाता है कि अबू सलेम ने गुलशन कुमार से जान की सलामती की कीमत मांगी जिसकी उन्होंने सिर्फ़ एक किश्त दी. 

अबू सलेम ने जब और पैसों के लिए उन पर दबाव बनाया और धमकी दी तो गुलशन ने इसे संजीदगी ने नहीं लिया और न ही पुलिस को इसकी जानकारी दी. कहते हैं कि इसी बात से खफ़ा होकर उसने गुलशन कुमार की 12 अगस्त 1997 को दिन दहाड़े हत्या करवा दी. 

इस हत्या का आरोप नदीम और टिप्स कंपनी के मालिक रमेश तूरानी पर भी लगा. नदीम तो भागकर इंग्लैंड चले गए और वहीं की नागरिकता ले ली पर तूरानी को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया. 

भारत ने कई बार नदीम के प्रत्यर्पण की कोशिश की पर इंग्लैंड की कोर्ट ने उनके ख़िलाफ़ सुबूतों को नाकाफ़ी मानते हुए उन्हें भारत भेजने से मना कर दिया है. आज तक हत्या की यह गुत्थी नहीं सुलझी है. सिर्फ़ एक शूटर, जिसने गोलियां चलाई थीं, उसके अलावा कोई भी पकड़ा नहीं जा सका.