Pathakhe

दुनिया में पटाखे पहली बार कब और कहां फोड़े गये

Explainer

उपलब्ध दस्तावेजों से पता चलता है कि भारत के पड़ोसी देश चीन ने छठी सदी में सॉल्टपीटर यानी की पोटैशियम नाइट्रेट और सल्फर मिलाकर बारूद बना लिया. पटाखे बनाने की शुरुआत इस बारूद से ही हुई. भारत में पटाखों की शुरुआत कब से हुई ये तो साफ नहीं है लेकिन प्रमाण, १५वीं सदी से मिलने शुरू होते हैं.

चीन को लेकर कई कहानियां

ऐसा कहा जाता है कि चीन में बारूद का अविष्कार एक दुर्घटना के चलते हुआ था. एक चीनी रसोइए ने खाना बनाते समय गलती से साल्टपीटर (पोटेशियम नाईट्रेट) आग पर डाल दिया। इससे उठने वाली लपटें रंगीन हो गईं. इन रंगीन लपटों को देखकर लोगों की उत्सुकता बढ़ी. फिर रसोइए ने साल्टपीटर के साथ कोयले और सल्फर का मिश्रण इसमें डाल दिया, जिससे रंगीन लपटों के साथ ही काफी तेजी आवाज भी हुई. बस यहीं से बारूद की खोज हो गई. एक अन्य दावे के अनुसार, सॉन्ग वंश (960- 1276) के दौरान बारूद का आविष्कार हुआ था.

बारूद के अविष्कार को लेकर एक दावा यह भी है कि, हजार साल पहले एक संन्यासी ली तियान ने इसकी खोज की थी. वह चीन के हुनान प्रांत के लियुयांग शहर का रहने वाला था. यह क्षेत्र आज भी आतिशबाजी के उत्पादन में दुनियाभर में सबसे आगे माना जाता है.

सोंग वंश के दौरान ली तियांग की पूजा के लिए एक मंदिर का निर्माण करवाया गया था. चीन के लोग आज भी हर साल 18 अप्रैल को आतिशबाजी के अविष्कार का जश्न मनाते हैं और ली तियांग को याद करते हैं. चीन में ऐसी मान्यता है कि आतिशबाजी, पटाखों से बुरी आत्माएं भागती हैं.

भारत में बारूद का ज्ञान

भारत में बारूद का ज्ञान 8वीं शताब्दी से मौजूद है. 8वीं शताब्दी में संकलित संस्कृत भाषा के गृंथ वैशम्पायन के नीति प्रकाशिका में एक समान पदार्थ का उल्लेख मिलता है. हालांकि आतिशबाजी में इस्तेमाल होने के लिए बारूद की क्षमता उस वक्त महसूस नहीं की गई थी.

इतिहासकार कौशिक रॉय का यह मानना है कि प्राचीन भारत साल्टपीटर को अग्निचूर्ण या आग पैदा करने वाले पाउडर के रूप में जानता था. 13वीं शताब्दी में चीन में मिंग राजवंश की सैन्य गतिविधियों ने दक्षिण पूर्व एशिया, पूर्वी भारत और अरब दुनिया से बारूद का परिचय करवाया. शुरुआत में बारूद का उपयोग सैन्य गतिविधियों में ही किया गया. आतिशबाजी के तौर पर भी इसका इस्तेमाल करना चीन ने ही दुनिया को सिखाया.

ना केवल इतिहास की किताबों में बल्कि पुरानी पेंटिंग्स में भी आतिशबाजी के दृश्य देखने को मिलते हैं.

साल 1953 में इतिहासकार और ‘भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट पुणे के पहले क्यूरेटर पीके गौड़ ने ‘द हिस्ट्री ऑफ फायरवर्क्स इन इंडिया बिटवीन एडी 1400 एंड 1900’ शीर्षक से एक किताब लिखी. यह किताब भारतीय इतिहास में आतिशबाजी और पटाखों के दिलचस्प इतिहास का एक दुर्लभ दस्तावेज है.

पीके गौड़ के मुताबिक दीवाली ही पटाखे फोड़ने का इकलौता मौका नहीं हुआ करता था. किताब में गौड़ बताते हैं कि आतिशबाजी शादियों और त्योहारों के जरूरी हिस्से हुआ करते थे. वे एक पुर्तगाली यात्री दुआर्ते बार्बोसा के हवाले से कहते हैं कि साल 1518 में, गुजरात में एक ब्राह्मण परिवार की शादी में जोरदार आतिशबाजी की गई और यह उस दौर में पटाखों की पर्याप्त उपलब्धता की तरफ इशारा करता है.

इसके अलावा लोग पटाखों का इस्तेमाल हाथी जैसे बड़े जानवरों को प्रशिक्षण देने में भी किया करते थे. सत्रहवीं सदी में दिल्ली और आगरा की यात्रा पर आए फ्रांसीसी यात्री फ्रैंकोसिस बर्नियर अपने आश्चर्य को कुछ इन शब्दों में व्यक्त करते हैं –

‘…ल़ड़ते हुए जानवर केवल उन पटाखों की आवाज के जरिए ही अलग किए जा सकते थे. इसके लिए उनके पास बम का धमाका या आतिशबाजी की जाती थी. इसका कारण था कि वे स्वभाव से थोड़े डरपोक होते थे और उन्हें आग से डर भी लगता था. यही कारण था कि बमगोलों के आने के बाद युद्ध में हाथियों का इस्तेमाल थोड़ा कम हो गया.

पटाखों का इस्तेमाल देश के किसी एक हिस्से तक ही सीमित नहीं था. अलग-अलग इलाकों की छानबीन करते हुए गौड़ को उड़ीसा में भी बारूद बनाने वाले सामान की एक सूची मिली. यह सोलहवीं सदी की शुरूआत में तैयार किया दस्तावेज था जो संस्कृत में लिखा था. दिलचस्प यह है कि इस सामग्री में गौमूत्र का भी जिक्र था. हालांकि इसके 300 साल बाद लिखे गए दस्तावेजों में इसे जगह नहीं दी गई है.

तस्वीरों में पटाखे

मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट में लगी ये तस्वीर १८वीं सदी की है. इसमें शब ए बारात के मौके पर हुई आतिशबाजी को देखा जा सकता है.

ये तस्वीरें हमें बताती हैं कि पटाखे सिर्फ हिंदू त्योहारों यानी दीवाली-दशहरा का ही हिस्सा नहीं थे बल्कि मुसलमानों के कुछ त्यौहारों जैसे शब-ए-बारात में भी आतिशबाजी एक जरूरी रस्म हुआ करती थी.

अपनी किताब में गौड़ ने मराठी संत कवि एकनाथ की एक कविता का जिक्र किया है, जो साल १९७० में लिखी गई. इसमें रुक्मिणी और कृष्ण के विवाह में आतिशबाजी होने की बात कही गई है.

शादी में आतिशबाजी का यह चलन 19वीं सदी में भी रहा जब 1820 में बड़ौदा के महाराज सयाजी राव द्वितीय ने अपनी दूसरी शादी में तीन हजार रुपए केवल आतिशबाजी पर खर्च कर दिए. उस समय के हिसाब से यह बड़ा खर्चा था इसलिए इतिहास में दर्ज हो गया.