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डिजिटल मीडिया के लिए कैसा रहा साल 2019?

Digital Learning

डिजिटल मीडिया की खास बात ये है कि इसे कोई भी शुरू कर सकता है, बिना कोई बड़ी पूंजी लगाये. सबसे बुरी बात ये है कि बड़े इन्वेस्ट के बावजूद यहां लागत निकलना मुश्किल होता है. जब बात भारतीय भाषाओं में चल रहे डिजिटल वेंचर्स की आती है तो ये समस्या और बढ़ जाती है.

भारतीय भाषाओं में चल रही वेबसाइट्स, ऐप, वीडियो प्लेटफॉर्म के पास यूजर्स तो हैं लेकिन उन्हें चलाने के लिए पैसे नहीं हैं क्योंकि यहां विज्ञापन के रेट्स काफी कम हैं. इसकी वजह है इम्पैक्ट न होना. आज भी अख़बार और न्यूज़ चैनलों का इम्पैक्ट डिजिटल के मुकाबले कहीं ज्यादा है, इसलिए जहां इम्पैक्ट है वहां विज्ञापन का रेट ज्यादा है. अब आपको लग सकता है कि इस मामले में अंग्रेजी में चल रहे डिजिटल वेंचर्स की हालत ठीक होगी, लेकिन ऐसा नहीं है. उनका थोड़ा बहुत इम्पैक्ट है भी तो यूजर्स की संख्या बेहद कम है.

2019 में दोगुने हुए यूजर्स

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की रैंकिंग और डेटा जारी करने वाली वेबसाइट कॉमस्कोर के मुताबिक ऑनलाइन ख़बर पढ़ने वाले यूजर्स की संख्या पिछले एक साल में लगभग दोगुनी हो गई है. ये न केवल हिंदी भाषा में हुआ है बल्कि बाकी दूसरी भारतीय भाषाओं में भी यही ट्रेंड देखने को मिला. मराठी, बंगाली, तमिल, तेलुगू और असमी में तो ये संख्या लगभग तीन गुनी तक हो गई है.

2018 में 35-40 मिलियन यूजर्स लाने वाली हिंदी न्यूज़ वेबसाइट नंबर वन हो जाती थी लेकिन 2019 खत्म होते-होते ये संख्या 60-70 मिलियन के बीच पहुंच गई है. वहीं मराठी में जहां पिछले साल नंबर एक न्यूज़ वेबसाइट के पास 5-6 मिलियन यूजर्स थे तो वहीं अब ये संख्या 15 मिलियन तक पहुंच गई है. यही हाल बाकी भाषाओं का भी है.

 

Hindi

Website Dec-18 Nov-19
Aaj Tak 36.6 66.8
Bhaskar 35.7 34.9
Amar Ujala 27.2 49.5
Patrika 24.7 25.8
Jagran 23.4 45.8
News18 Hindi 23.1 48.2
NDTV Khabar 21.8 34.1
Live Hindustan 19.6 41.2
Jansatta 15.1 33.4

 

 

Marathi

Website Dec-18 Oct-19 Nov-19
Loksatta 5.7 8.5 12.6
Maharashtra Times 5.2 18.1 12.6
Lokmat 4.9 9.2 9.2
Zeenews 24Taas 3.8 7.6 7.5
ABP Manjha 2.7 7.1 4
News18 Lokmat 2.1 13.5 12.1

 

यूजर्स बढ़ने की वजह –

यूजर्स बढ़ने की दो प्रमुख वजहे हैं. पहली है सस्ता डेटा और इसकी पहुंच 45 साल से ज्यादा उम्र के लोगों तक होना. अब हमारे माता-पिता भी इंटरनेट पर उतना वक्त व्यतीत कर रहे हैं जितना की हम लोग. यानी की एक पूरी पीढ़ी इंटरनेट से पिछले एक साल में जुड़ी है.

दूसरी बड़ी वजह है कि साल 2019 ख़बरों के मामले में किसी और साल के मुकाबले एतिहासिक रहा है. फरवरी में बालाकोट एयरस्ट्राइक, मार्च में अभिनंदन, मई में मोदी सरकार की वापसी, जुलाई में चंद्रयान और ट्रिपल तलाक, अगस्त में अनुच्छेद 370, नवंबर में अयोध्या फैसला, दिसंबर में नागरिकता संशोधन कानून.

यूजर्स बढ़े पैसा नहीं आया

आपने हर किसी से सुना होगा कि भविष्य डिजिटल का है लेकिन अभी तक किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि पैसा कहां से आएगा? अख़बार और न्यूज चैनलों का खर्चा तो विज्ञापन से किसी तरह चल ही जाता है लेकिन न्यूज वेबसाइट और ऐप का? दरअसल ये सब कुछ निर्भर करता है प्रभाव पर यानी की इम्पैक्ट.

आज भी डिजिटल प्लेटफॉर्म जनता के लिए ख़बर का भरोसेमंद सोर्स नहीं है. अख़बार और न्यूज चैनलों का इम्पैक्ट ज्यादा है इसलिए वहां विज्ञापन के रेट ज्यादा हैं. लगभग हर अख़बार और न्यूज चैनल के पास ऐड सेल्स की टीम है जो बाजार से विज्ञापन लाती है. सरकारों और सरकारी मशीनरी के पास भी इन्हें विज्ञापन देने के लिए एक सिस्टम है.

जबकि डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ ऐसा नहीं है. आज भी ज्यादातर डिजिटल प्लेटफॉर्म के पास खुद की ऐड सेल्स टीम नहीं है. वो अपने सहयोगी अख़बार या टीवी चैनल की टीम के सहारे चल रहे हैं.

रेगुलर कमाई के लिए वो गूगल ऐडसेंस और फेसबुक ऑडिएंस नेटवर्क जैसी थर्ड पार्टी एड नेटवर्क एजेंसी पर निर्भर हैं. जिनसे कभी भी इतना पैसा नहीं आ सकता है कि एक बड़ी साइट चलाई जा सके. बतौर वीडियो ब्लॉगर हो सकता है आप ठीक-ठाक कमाई कर लें लेकिन जब आप टीम बनाकर काम करते हैं तब ये माध्यम इतने पैसे नहीं दे सकते हैं कि एक टीम का खर्च चला सकें.

सोशल मीडिया पर निर्भरता कम हुई –

भारतीय न्यूज़ साइटों की ग्रोथ ही सोशल मीडिया के साथ हुई थी. जैसे-जैसे फेसबुक और ट्विटर हमारी जिंदगी में महत्वपूर्ण होते गये वैसे-वैसे न्यूज़ वेबसाइट्स की ग्रोथ बढ़ती गई लेकिन साल 2019 पहला ऐसा साल है जब न्यूज़ वेबसाइटों ने सोशल प्लेटफॉर्म की जगह गूगल सर्च और डायरेक्ट यूजर्स पर ध्यान दिया है.

बचपन में विज्ञान की किताब के पहले पेज पर लिखा था, आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है. 2015-17 के बीच न्यूज़ वेबसाइट्स पूरी तरह फेसबुक पर निर्भर थीं. ना केवल ट्रैफिक के मामले में बल्कि रिवेन्यू के मामले में भी. फेसबुक ने इंस्टैट आर्टिकल लॉन्च कर दिया था, ऑडिएंस नेटवर्क आ चुका था.

इंस्टैंट ऑर्टिकल के जरिये फेसबुक ने 2G और 3G चलाने वाले यूजर्स की समस्या का समाधान कर दिया था. वहीं ऑडिएंस नेटवर्क के जरिये उसने गूगल एडसेंस का विकल्प पेश कर दिया था. जिसके रेट काफी अच्छे थे. हिंदी जैसे मार्केट में CPM रेट्स  USD 0.50 तक थे. यानी की यूजर और पब्लिशर दोनों का फायदा था.

नतीजा ये हुआ कि हर दूसरा व्यक्ति वेबसाइट शुरू करने लगा. हर बड़े मीडिया संस्थान में एक-दो लोग ऐसे जरूर होते थे जो खुद की वेबसाइट चला रहे थे. अंतत: क्लिकबेट का मामला शुरू हुआ, ट्रैफिक के लिए लोगों ने सोशल मीडिया पर गंदगी मचानी शुरू की, जो धीरे-धीरे फेक न्यूज़ में बदल गई.

जिससे ना केवल लोगों का डिजिटल प्लेटफॉर्म पर से भरोसा उठा बल्कि इसका असर फेसबुक पर भी पड़ा. दुनियाभर में फेसबुक पर सवाल उठने लगे. आखिरकार सितंबर 2017 में छुट्टियों से लौटने के बाद मार्क जकरबर्ग ने एलान किया कि वो फेक न्यूज पर लगाम लगाएंगे. वो लगाम तो नहीं लगा पाए लेकिन फेसबुक ने न्यूज़ पब्लिशर्स की रीच कम कर दी, रही सही कसर कैम्ब्रिज एनालिटिका विवाद ने पूरी कर दी.

2018 में ना केवल वेबसाइटों का ट्रैफिक प्रभावित हुआ बल्कि रिवेन्यू भी प्रभावित हुआ. जिसके बाद कई छोटी-मोटी वेबसाइटें बंद हुईं. बाजार में सिर्फ बड़े प्लेयर रह गये. ऐसी वेबसाइट जो बंद नहीं हो सकती थीं. जो बड़े-बड़े मीडिया संस्थान के लिए प्रतिष्ठा का विषय भी थीं.

इसलिए वेबसाइटों ने अपने लिए वैकल्पिक ट्रैफिक का स्रोत तलाशना शुरू किया. इसमें सबसे बड़ी मदद गूगल ने की.

हाइपरलोकल कंटेंट

ये बहुत जरूरी है कि वही कंटेंट परोसा जाए जो जनता पढ़ना चाहे. अपने आस-पास की ख़बरें सभी को आकर्षित करती हैं. टीवी में ये प्रयोग पहले हो चुका था. सहारा, जी, नेटवर्क 18 और आईटीवी ग्रुप के कई क्षेत्रीय चैनल पहले से बाजार में थे. डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इसको थोड़ी देर से समझा. देर आए, लेकिन दुरुस्त आए. अब हर बड़ा प्लेटफॉर्म हाइपरलोकल कंटेंट की तरफ जा रहा है जिसका असर उसके ट्रैफिक पर भी दिख रहा है.

न्यूज एग्रिगेटर्स का बुलबुला फूटा

हम कह सकते हैं कि साल 2019 में न्यूज़ एग्रिगेटर्स का बुलबुला फूट चुका है. एक समय था जब वेबसाइटें काफी हद तक यूसी न्यूज़, न्यूज़ डॉग, न्यूज़ रिपब्लिक, जियो न्यूज़, ओपरा न्यूज़ और डेली हंट पर निर्भर थीं. शुरूआती दौर में इन्होंने काफी पैसे भी बांटे, लेकिन तेजी से बदलते बाजार और मानवीय व्यवहार की वजह से इनमें से ज्यादातर लंबे समय तक टिक नहीं पाये. सिर्फ वही टिके जिन्होंने ख़बरों और उसके विश्वसनीय सोर्स के साथ समझौता नहीं किया.

डिजिटल मीडिया के लिए 2020

ट्रैफिक के मामले में 2019 ने एक ऐसी बड़ी लकीर खींची है जिसके बराबरी में फिर से लकीर खींचना काफी मुश्किल होगा. रिवेन्यू हमेशा की तरह इस साल भी एक बड़ी समस्या बनी रहेगी. साल खत्म होते-होते इंटरनेट डेटा के दाम 40 फीसदी तक बढ़ गये हैं जिसका असर यूजर्स पर पड़ना तय है. यूजर्स घटने पर कमाई बढ़ाना एक बड़ी चुनौती होगी.

*कॉमस्कोर के सभी नंबर मिलियन में हैं और मोबाइल यूजर्स के हैं