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चीन और महाबलीपुरम में क्या रिश्ता है?

Explainer

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से करीब ६२ किलो मीटर की दूरी पर स्थित महाबलीपुरम, यूनेस्को की सूची में शामिल ऐतिहासिक धरोहरों में से एक है. किसी जमाने में इसे मामल्लापुरम कहा जाता था. तमिलनाडु का यह प्राचीन शहर अपने भव्य मंदिरों और सागर तटों के लिए प्रसिद्ध है. सातवीं शताब्दी में यह शहर पल्लव राजाओं की राजधानी था. द्रविड वास्तुकला की दृष्टि से यह शहर अग्रणी स्थान रखता है. यहा पर पत्थरो को काट कर मन्दिर बनाया गया.

चीन और महाबलीपुरम का रिश्ता

कभी महाबलीपुरम के शासकों ने चीन के साथ तिब्बत की सीमा की सुरक्षा के लिए समझौता किया था. महाबलीपुरम का पुराना है इतिहास समुद्र किनारे बसे इस शहर को पल्लव वंश के राजा नरसिंह देव बर्मन ने बसाया था. इस शहर से कभी चीनी सिक्के मिले थे, जिससे ये बात सामने आई थी कि यहां और चीन के बीच व्यापारिक संबंध थे, जो बंदरगाह के जरिए होते थे.

यही कारण रहा है कि चीन और पल्लव वंश लगातार करीब आते चले गए, इसी के बाद सातवीं सदी में चीन ने महाबलीपुरम के राजाओं से समझौता किया. दोनों के बीच हुआ ये समझौता सुरक्षा को लेकर था, जो कि तिब्बत सीमा के लिए हुआ था. चीन ने ये समझौता पल्लव वंश के तीसरे राजकुमार बोधिधर्म के साथ किया था, जिन्होंने बाद में बौद्ध धर्म अपनाया और बौद्ध भिक्षु बन गए थे. यही समझौता और चीन को की गई मदद एक कारण भी बनी कि चीन में बोधिधर्म को सम्मानित दर्जा प्राप्त है.

एतिहासिक मंदिरों का शहर

महाबलीपुरम तमिलनाडु की उन जगहों में शामिल है जो वहां के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं. अगर आपको एतिहासिक इमारतों को देखने में रुचि है तो आपके लिए महाबलीपुरम में काफी कुछ देखने के लिए है.

वराह मंदिर

वाराह गुफ़ा मंदिर में कई अद्भुत मूर्तियां हैं. इसे वाराह मूर्तिकला के कारण ही वाराह मंदिर कहा जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान नरसिंह के लिए किया गया था. दीवार से लगे दो पूर्ण स्तंभ और दो अन्य स्तंभ हैं. गर्भगृह अंदर की ओर नहीं बल्कि बाहर की ओर है. दीवार में एक वाराह शिल्पकला भी है.

अर्जुन की मूर्ति

यहां द्वापर युग में जन्में अर्जुन की तपस्या करती हुई मूर्ति है. यह मूर्ति स्थलसयना पेरुमाल मंदिर के पीछे है और यह एक विशाल पत्थर को तराशकर तैयार की गई है. यह मूर्ति क़रीब 30 मीटर लंबी और 60 मीटर चौड़ी है.

रथ मंदिर

आमतौर पर इस मंदिर को पांडवों के रथ मंदिर के रूप में जाना जाता है. यह एक ही पत्थर को तराशते हुए बनाया गया है. बहुत से लोगों का मानना है कि इन मंदिरों को पाँच पांडवों के लिए ही निर्मित किया गया था लेकिन यहां उनकी कोई प्रतिमा नहीं मिलती है.

कहा जाता है कि ये मंदिर शिव, विष्णु और कोत्रवई (देवी) का है. यहां बने हर एक मंदिर की अपनी अलग शिल्पकला है. 

समुद्र किनारे बने मंदिर

महाबलीपुरम नाम दो किनारे के मंदिरों की छवि को स्पष्ट करता है. इन मंदिरों का निर्माण नरसिम्हा द्वितीय ने किया था. इसे राजसिम्हा भी कहते हैं. जब साल 2004 में सुनामी ने तमिलनाडु के किनारों को अपनी चपेट में लिया था तो समुद्र का पानी मंदिरों में प्रवेश कर गया था. हालांकि ये मंदिर इतने मज़बूत हैं कि इन्हें बहुत अधिक नुक़सान नहीं पहुंचा था. मंदिर के गर्भगृह में एक शिवलिंग भी स्थित है.

ऐसी मान्यता है कि इन मंदिरों का निर्माण नरसिम्ह वर्मा प्रथम के शासनकाल (630 से 680) के बीच हुआ. लेकिन इन मंदिरों का काम उनके शासनकाल तक पूरा नहीं हो सका. ऐसा माना जाता है कि ये मंदिर महेंद्र वर्मन द्वितीय और परमेश्वरवर्मन के शासनकाल के दौरान पूरा हुआ.