HAL HF-24 Marut

भारत का पहला स्वदेशी फाइटर प्लेन मारूत क्यों हुआ फेल

Explainer

आज़ादी के बाद ही भारत का सपना रहा है कि वो खुद का फाइटर प्लेन बनाये. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस दिशा में कोशिश भी की. नेहरू चाहते थे कि भारत, एशिया का वो पहला देश बने जिसके पास खुद का बनाया हुआ फाइटर प्लेन हो. गरीबी और पिछड़ेपन से जूझ रहे इस देश में, फाइटर प्लेन बनाने का जिम्मा सौंपा गया, हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड को.

नेहरू की महत्वाकांक्षी परियोजना

नेहरू की इस महत्वकांक्षी परियोजना के लिए विदेश से इंजीनियर भी आयात किये गये. नेहरू और उनके सलाहकारों ने इसके लिए जर्मन एरोस्पेस साइंटिस्ट कुर्ट टैंक को भारत बुलाया. टैंक ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी के लिए वुल्फ 190 बनाया था,  जो कि बेस्ट जर्मन सिंगल इंजन फाइटर प्लेन था.

कुर्ट टैंक को सबसे पहले मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजी भेजा गया. इससे जुड़ा हुआ एक रोचक तथ्य यह भी है कि यहां उस समय एपीजे अब्दुल कलाम छात्र थे. जो बाद में मिसाइल मैन और भारत के राष्ट्रपति बने.

अगस्त 1956 में जवाहरलाल नेहरू, टैंक और उनके सहयोगी हेर मिट्टेलहुपर को लेकर बैंगलोर पहुंचे. जहां उन्हें HF-24 बनाना था. इंडियन एयर फोर्सट एक ऐसा सुपरसोनिक फाइटर प्लेन चाहता था जो मॉक २ जैसा हो. यानी की ध्वनि की गति से भी दो गुना तेज़. कुर्ट टैंक की टीम और हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड को सब कुछ नये सिरे से शुरू करना था. करीब दो साल की कड़ी मेहनत के बाद अप्रैल 1959 में ट्रायल के लिए लकड़ी का बना फाइटर प्लेन तैयार हुआ.

जब पहली बार उड़ान भरी

1961 में लकड़ी से बने ग्लाइडर के साथ इसने पहली बार उड़ान भरी. उड़ान के नतीजे मिले जुले रहे. उड़ान के लिए इसे डकोटा के साथ रखा गया था क्योंकि इसमें इंजन नहीं था.

उस समय भारत अपना फाइटर इंजन बनाने से कोसो दूर था. हालांकि अब भी भारत अपना खुद का फाइटर प्लेन का इंजन नहीं बना पाया है. टैंक की टीम और भारत के वैज्ञानिकों ने जिसमें होमी जहांगीर भाभा भी थे, ने तय किया कि वो ब्रिटिश ऑरफेयस इंजन का उपयोग करेंगे. जिसे बनाने का लाइसेंस उस समय हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड के पास था.

हालांकि इसके पहले सोवियत यूनियन, यूरोप और अमेरिका से कई इंजन लिये लेकिन सभी फेल रहे. 1 अप्रैल साल 1967 को दो ऑरफेयस इंजन वाला HAL HF-24 मारुत फाइटर प्लेन भारतीय एयर फोर्स को सौंपा गया. हालांकि यह उम्मीदों के मुताबिक नहीं था और ना ही इसकी गति, ध्वनि की गति के बराबर थी.

हालांकि एक कहानी ये भी कि जून 1966 में, HF-24 मारुत को, जब उसका निर्माण अभी चल ही रहा था तब इंडियन एयर फोर्स के पायलटों ने मिस्र के हेलवन में EL-300 इंजन के साथ ट्रायल के लिए ले गये. लेकिन वहां इसने काम ही नहीं किया. 1967 में छह दिन तक चले युद्ध के बाद रणनीतिक स्थितियां बदल गईं. भारतीय वायु सेना की टीम 1969 में देश लौट आई और प्लेन को वहीं छोड़ दिया.

क्यों फेल हुआ मारुत

मारुत के फेल होने की सबसे बड़ी वजह इसका इंजन थी. मारुत कभी भी मिग 21 या पाकिस्तान के  F-104 जैसे स्टार फाइटर्स की बराबरी नहीं कर पाया. यह कभी भी भारतीय वायु सेना के एयर टू एयर यानी की हवा से हवा में मार करने वाली फाइटर प्लेन की लिस्ट में नहीं था.

यह लाइट ग्राउंड अटैक तक ही सीमित था. यह 1800 किलो ग्राम बम, 100 रॉकेट और चार कैनन्स ले जा सकता था. लेकिन इसकी डिजाइन ऐसी थी कि यह एक साथ चारों कैनन्स को लॉन्च नहीं कर सकता था. जिस पहले पायलट ने यह कोशिश की थी उसका मारुत फाइटर प्लेन अरब सागर के ऊपर क्रैश हो गया और उसकी मौत हो गई.

जब मारुत चर्चा में आया

ऐसा नहीं है कि मारुत को सिर्फ नाकामियों की वजह से ही जाना गया. यह पहली बार चर्चा में तब आया जब बांग्लादेश साल 1971 में आजादी की लड़ाई लड़ रहा था. इसने लोंगेवाला में शानदार काम किया.

1971 के भारत पाक युद्ध के दौरान जब लौंगेवाला पोस्ट पर पाकिस्तानी सेना आगे बढ़ रही थी, तब मारूत के इस्तेमाल के साथ भारतीय वायुसेना के जवानों ने कारनामे दिखाए. पा​क फौज के कई टैंक ध्वस्त किए गए. 220 स्क्वाड्रन के मेजर बख्शी इकलौते रहे, जिन्होंने मारूत के ज़रिए हवा से हवा में एक घातक हमले को अंजाम देकर कोरियन लड़ाकू विमान तकनीक से बने पाकिस्तानी विमान F-86 सैबर को मार गिराया था.

जब रिटायर हुआ मारुत

युद्ध में मारुत की परफॉर्मेंस को देखते हुए इसके इंजन को कई बार अपग्रेड करने की बात कही गई, लेकिन भारतीय एयरफोर्स ने इसमें निवेश करने को लेकर रुचि नहीं दिखाई. उसके पास विदेश से सुखोई और मिग जैसे बेहतर फाइटर प्लेन खरीदने का विकल्प था.

31 मार्च साल 1990 में आखिरी मारुत फाइटर प्लेन वायुसेना से रिटायर हो गया. अब मारुत को सिर्फ एग्ज़िबिशन में ही देखा जा सकता है.