Ram Vilas Paswan

राम विलास पासवान कैसे बने राजनीति के मौसम वैज्ञानिक

Vyakti Vishesh

राम विलास पासवान का जन्म बिहार के खगड़िया जिले के शहरबन्नी गांव में 5 जुलाई साल 1946 को हुआ था. राम विलास पासवान ने खगड़िया के कोसी महाविद्लाय, पटना विश्वविद्यालय और बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से पढ़ाई की. उन्होंने एमए, एलएलबी, डी लिट किया. बिहार पुलिस की नौकरी छोड़कर राजनीति में आये राम विलास पासवान ने दो शादियां की हैं. पहली पत्नी राजकुमारी देवी से दो बेटियां हुई हैं जबकि दूसरी पत्नी रीना शर्मा से एक बेटा और एक बेटी हुई. चिराग पासवान, रीना शर्मा और राम विलास पासवान के बेटे हैं. शादी से पहले रीना शर्मा एयरहोस्टेस थीं.

राजनीति में एंट्री

साल 1969 में पहली बार राम विलास पासवान ने राजनीति में कदम रखा. बिहार विधानसभा का चुनाव लड़े और जीते. साल 1977 में हुए छठे लोकसभा चुनाव में राम विलास पासवान ने बिहार के हाजीपुर से रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की. इसके बाद उन्होंने साल 1980 में हुए लोकसभा चुनाव को भी जीता.

हालांकि जिस हाजीपुर से उन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की थी वहीं से आठवीं लोकसभा के लिए 1984 में हुए चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद नौवीं लोकसभा के लिए चुने गये. जिसके बाद वो केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बने. उन्हें श्रम एवं कल्याण मंत्रालय मिला. इसके बाद दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं, चौदहवीं लोकसा के लिए निर्वाचित हुए. लेकिन साल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

रामविलास पासवान का मुश्किल दौर

जब 2009 में उन्हें रामसुंदर दास जैसे बुज़ुर्ग समाजवादी ने हरा दिया तो उन्हें एक नया एहसास हुआ कि वे अपना दलित वोट तो ओबीसी की राजनीति करने वालों को दिला देते हैं, लेकिन उन्हें ओबीसी वोट नहीं मिलता.

उन्हें ओबीसी तो नहीं, लेकिन अक्सर अगड़ा वोट मिल जाता है. इस बार एससी/एसटी ऐक्ट पर उनके रुख के कारण अगड़ी जाति के लोग उनसे नाराज़ बताए जाते गये.

2005 से 2009 रामविलास के लिए बिहार की राजनीति के हिसाब से मुश्किल दौर था. ऐसा 1984 में चुनाव हारने पर भी हुआ था लेकिन तब उनका कद इतना बड़ा नहीं था और 1983 में बनी दलित सेना के सहारे वे उत्तर प्रदेश के कई उप-चुनावों में भी किस्मत आज़माने उतरे थे. हार तो मिली लेकिन दलित राजनीति में बसपा के समानांतर एक छावनी लगाने में सफल रहे.

2005 में वे बिहार विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने या लालू-नीतीश की लड़ाई के बीच सत्ता की कुंजी लेकर उतरने का दावा करते रहे. एक तो नीतीश कुमार ने उनके 12 विधायक तोड़कर उनको झटका दिया और राज्यपाल बूटा सिंह ने दोबारा चुनाव की स्थिति बनाकर उनकी राजनीति को और बड़ा झटका दिया.

नवंबर में हुए चुनाव में लालू प्रसाद का 15 साल का राज गया ही, रामविलास की पूरी सियासत बिखर गई. बिहार में सरकार बनाने की चाबी अपने पास होने का उनका दावा धरा रह गया. वे चुपचाप केंद्र की राजनीति में लौट आए. लालू की तरह वे भी केंद्र में मंत्री बने रहे. हालांकि 2009 में वे यूपीए से अलग हुए, लेकिन अपनी सीट भी बचा नहीं पाए. साल 2010 में वो राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए.

पाला बदला

रामविलास पासवान को मौसम वैज्ञानिक ऐसे ही नहीं कहा जाता है. वो सरकार बनने से पहले ही जान लेते हैं कि किसकी सरकार आने वाली है. जिन नरेंद्र मोदी के खिलाफ उन्होंने साल 2002 में मोर्चा खोला था और केंद्र की एनडीए सरकार से इस्तीफा दे दिया. उन्हीं नरेंद्र मोदी को जब बीजेपी ने आगे किया तो रामविलास पासवान ने बीजेपी के साथ मिलकर बिहार में चुनाव लड़ा और शानदार जीत हासिल की. 2014 में मोदी सरकार के मंत्रीमंडल में भी शामिल हुए.

संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में रहे

रामविलास पासवान साठ के दशक से ही संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) में सक्रिय थे, जब देश में आपातकाल लगा तब वो जेल भी गये. राजनारायण और चौधरी चरण सिंह के साथ रहे, साल 1977 में रिकॉर्ड वोटों से जीतकर लोकसभा में आए. मगर उनकी राजनीति चमकी वीपी सिंह के साथ ही जिन्हें मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने के बाद अपने आसपास एक ओबीसी और एक दलित को रखना था. शरद यादव ओबीसी थे और रामविलास पासवान दलित.

वीपी सिंह राज्यसभा के सदस्य थे इसलिए रामविलास ही लोकसभा में सत्ताधारी गठबंधन के नेता थे. उस दौर में भारी संख्या वाले ओबीसी और यादव वोट बैंक में शरद यादव तो कोई आधार नहीं बना पाए, पर रामविलास ने बिहार के दलितों, ख़ास तौर दुसाधों और मुसलमानों में एक आधार बनाया जो अब तक उनके साथ बना हुआ है.

लोकजन शक्ति पार्टी का निर्माण

रामविलास पासवान ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से की थी. इसके बाद लोकदल, जनता पार्टी-एस, समता दल और आखिर में जेडीयू में रहे. इसके बाद उन्होंने 28 नवंबर साल 2000 में दिल्ली में लोक जनशक्ति पार्टी के गठन की घोषणा की.