Inder Kumar Gujral

इन्द्र कुमार गुजराल (I. K. Gujral) कैसे बने देश के प्रधानमंत्री

Vyakti Vishesh

पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल कि जन्म 4 दिसनबर 1919 को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में हुआ था. उनके पिता का नाम अवतार नारायण और माता का नाम पुष्प गुजराल था.

गुजराल की प्रारंभिक शिक्षा लाहौर के डीएवी कॉलेज, कॉमर्स कॉलेज और फॉर्मन क्रिश्चियन कॉलेज में हुई. राजनीति में आने से पहले गुजराल पत्रकार के रूप में बीबीसी में भी काम किया था.

आजादी आंदोलन में कूदे

आईके गुजराल छात्र जीवन में भारतीय कॉम्युनिष्ट पार्टी के छात्र इकाई ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के महासचिव थे. साल 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में गुजराल को जेल जाना पड़ा. जेल से निकलने के बाद गुजराल ने महात्मा गांधी का समर्थन किया. आजादी के बाद भारत-पाक विभाजन के कारण गुजराल अपने पूरे परिवार के साथ पाकिस्तान से भारत आ गए.

इंदिरा को प्रधानमंत्री बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका

साल 1965 में लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद कांग्रेस के भीतर प्रधानमंत्री पद को लेकर बवाल मचना शुरू हो गया. एकाएक कई दावेदारों ने प्रधानमंत्री पद के लिए दावा ठोक दिया. इसके बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज ने इंदिरा के क़रीबी उमाशंकर दीक्षित और आईके गुजराल को प्रधानमंत्री पद का मसौदा तैयार करने का काम सौंपा.

आईके गुजराल और उमाशंकर दीक्षित इंदिरा गांधी के करीबी थे. दोनों ने उन्हें प्रधानमंत्री बनने में काफी मदद किया और उसी अनुसार मसौदा तैयार किया.

संजय से लड़ाई और मंत्रालय छीना

आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के पुत्र और युवा कांग्रेस अध्यक्ष संजय गांधी ने गुजराल से आकाशवाणी और दूरदर्शन में पढ़े जाने वाली समाचारों पर सेंसर लगाने का आदेश दिया, लेकिन गुजराल इससे मानने से इनकार कर दिया. इसके बाद गुजराल और संजय गांधी में अनबन हुई और अगले दिन गुजराल के हाथ से सूचना और प्रसारण मंत्रालय छीन लिया गया.

कांग्रेस छोड़ जनता पार्टी से जुड़े

अस्सी का दशक शुरू होने से पहले ही गुजराल को लगने लगा था कि कांग्रेस पार्टी में उनका कोई सम्मान नहीं है, जिसके बाद 1980 में गुजराल कांग्रेस पार्टी छोड़कर जनता दल में शामिल हो गए. वीपी सिंह की सरकार में वे तक विदेश मंत्री बने. इसके बाद 1996 में एचडी देवगोड़ा सरकार में भी उन्हें यही जिम्मेदारी दी गई. इस दौरान भारत ने पड़ोसी देशों के साथ अपने रिश्ते बेहतर करने का प्रयास किया.

जब लोकसभा का चुनाव जाति का भ्रम बनाकर जीते

बात 1991 के लोकसभा चुनाव की है. आई.के गुजराल पटना से उम्मीदवार थे. उनके खिलाफ उम्मीदवार थे चंद्रशेखर की पार्टी से यशवंत सिन्हा. यशवंत सिन्हा ने इस चुनाव में बिहारी बनाम बाहरी बना दिया.

ऐसा कहा जाता है कि स्थिति को देखकर जनता पार्टी के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव ने गुजराल को यादव जाति का बताकर चुनाव में जातीय ध्रुवीकरण का खेल कर दिया. चुनाव के नतीजे आने पर गुजराल चुनाव जीत गए थे.

रात बारह बजे पता चला पीएम बन गए

देश में गठबंधन की सरकार चल रही थी. एचडी देवगौड़ा सरकार से कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया, इसके बाद फिर से गठबंधन दलों की बैठक आयोजित की गई. गठबंधन में फैसला किया गया कि ऐसे शख्स को प्रधानमंत्री बनाया जाए, जो बाहर से समर्थन देने वाली कांग्रेस से भी सहमति रखता हो.

इसके बाद सब एक-राय से इंदिरा सरकार में मंत्री रहे इंद्र कुमार गुजराल पर सहमत हुए. इस बैठक के दौरान गुजराल अपने घर पर सोए थे. बैठक के बाद गठबंधन के नेता उनके घर पहुंचे और गुजराल को जगाकर बोले कि आपको प्रधानमंत्री चुना गया है और कल शपथ लेनी है.

गुजरालडॉक्ट्रिननामक आत्मकथा

विदेश मंत्री के तौर पर गुजराल को उनकी विदेश नीतियों की वजह से खासतौर पर जाना जाता है. ‘गुजराल-डॉक्ट्रिन’ के नाम से प्रसिद्ध उनकी विदेश नीति भारत के पड़ोसी मुल्कों के साथ संबंधों को लेकर विदेशों में भी खासी चर्चा में रही. उन्होंने भारत के दो बार विदेश मंत्री के तौर अपने अनुभवों को इस किताब में लिखा है.

30 नवंबर 2012 को 92 वर्ष की उम्र में गुजराल का निधन दिल्ली मेंदाता अस्पताल में हो गया.