Jivatram Bhagwandas Kripalani

शादी के लिए महात्मा गांधी से लड़ने वाले जेबी कृपलानी कौन थे

Vyakti Vishesh

जेबी कृपलानी का पूरा नाम जीवटराम भगवानदास कृपलानी था. उनका जन्म साल 1888 में हैदराबाद के एक सिंध परिवार में हुआ था. कृपलानी की शुरुआती पढ़ाई लिखाई हैदराबाद में ही हुई.

पढ़ाई के लिए मुंबई आए

जेबी कृपलानी ने आगे की पढ़ाई के लिए मुंबई का रुख किया और विल्सन कॉलेज में एडमिशन लिया. कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही बंगाल का विभाजन हुआ. इस घटना के बाद जेबी कृपलानी का गुस्सा अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ बढ़ता गया. उनके गुस्सैल स्वभाव को देखते हुए कॉलेज ने उन्हें कराची के डी जे सिंध कॉलेज में जबरदस्ती भेज दिया था ताकी वे वहां पर शांत रहकर पढाई कर सकें.

बाद में उन्होंने पूना के फर्ग्युसन कॉलेज से साल 1908 में ग्रेजुएट हुए. आगे उन्होंने इतिहास और अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री हासिल की.

 एक कुशल अध्यापक

स्वतंत्रता सेनानी के अलावा जेबी की पहचान एक कुशल अध्यापक के तौर पर भी है‌. जेबी कृपलानी स्वतंत्रता संग्राम में आने से पहले एक अध्यापक थे. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने बिहार के मुजफ्फरपुर कॉलेज में अंग्रेजी और इतिहास के प्रोफ़ेसर पद पर काम किया. साल  1912 से लेकर 1917 तक वे वहां कार्यरत रहे. बाद में महात्मा गांधी से मुलाकात के बाद उन्होंने इस काम से छुट्टी ले ली.

साल 1919 में महात्मा गांधी द्वारा स्थापित किये गए गुजरात विद्यापीठ में प्रिंसिपल के रूप में काम करने से पहले कुछ समय के लिए उन्होंने बनारस हिन्दू कॉलेज में भी शिक्षक पद पर काम किया. गुजरात विद्यापीठ में वो साल 1920 से 1927 तक प्रिंसिपल के पद पर रहे.

आजादी के बाद आचार्य कृपलानी की लोकप्रियता पं. जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल से कम नहीं थी. तब पहले प्रधानमंत्री पं. नेहरू से कुछ मतभेद के चलते उन्होंने पार्टी छोड़ दी और किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाकर विपक्ष में चले गए.

इसके बाद उन्होंने कभी कांग्रेस की ओर मुड़कर नहीं देखा. उनकी पत्नी सुचेता कृपलानी कांग्रेस में रहते हुए मंत्री और बाद में देश की पहली महिला मुख्यमंत्री भी बनीं.

जॉइंट किलर साबित हुए

साल 1962 का लोकसभा चुनाव. मुंबई लोकसभा सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन थे. कृष्णा मेनन नेहरू के बेहद करीब थे. जेबी ने अपने सुरक्षित सीट सीतामढ़ी को छोड़कर मुंबई से चुनाव लड़ने की घोषणा की।

जेबी के इस घोषणा के बाद नेहरू और मेनन चिंता में आ गए‌. जेबी ने अपना पूरा चुनाव चीन युद्ध में रक्षामंत्री की असफलता को मुद्दा बनाकर लड़ा और आखिर वही हुआ जिसकी चिंता नेहरू को सता रही थी.

जेबी कृपलानी ने कृष्णा मेनन को चुनाव में हरा दिया.

नेहरू ने जेबी के खिलाफ कांग्रेस का प्रत्याशी हटा लिया

बात 1957 की है. जेबी कृपलानी कांग्रेस छोड़कर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बना चुके थे. कृपालनी ने यह चुनाव बिहार के सीतामढ़ी से लड़ने का फैसला किया. नेहरू को जब इस बात की जानकारी मिली तो उन्होंने पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी को वापस ले लिया. नेहरू चाहते थे कि कृपालनी जैसे नेता संसद पहुंचे.

कांग्रेस के प्रत्याशी हटने के बाद उनके सामने अब निर्दलीय उम्मीदवार बुझावन सिंह बच गये थे, जिनको आचार्य कृपलानी ने आसानी से हरा दिया.

शादी के लिए गांधी से लड़ गये

आचार्य जेबी कृपलानी कांग्रेस के दिग्गज नेता थे. कांग्रेस में ही एक दिग्गज नेता थी, सुचिता कृपलानी‌. दोनों के बीच प्रेम हुआ और दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन उस समय महात्मा गांधी दोनों की शादी के लिए राजी नहीं हुए.

सुचेता ने अपनी किताब सुचेता एन अनफिनिश्ड ऑटोबॉयोग्राफी में लिखा,

गांधी ने उनके विवाह का विरोध किया था, उन्हें लगता था कि पारिवारिक जिम्मेदारियां उन्हें आजादी की लड़ाई से विमुख कर देंगी.

गांधी ने कृपलानी से कहा,

अगर तुम उससे शादी करोगे तो मेरा दायां हाथ तोड़ दोगे.

तब सुचेता ने उनसे कहा, वह ऐसा क्यों सोचते हैं बल्कि उन्हें तो ये सोचना चाहिए कि उन्हें आजादी की लड़ाई में एक की बजाए दो कार्यकर्ता मिल जाएंगे.

कांग्रेस अध्यक्ष से पार्टी में बगावत तक

जेपी कृपलानी आजादी के बाद देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष थे. उस समय सत्ता और संगठन को समानांतर माना जाता था. जेबी कृपलानी, महात्मा गांधी के खास माने जाते थे, लेकिन उनकी नेहरू से नहीं बनती थी और यह धीरे-धीरे बगावत में बदल गई. साल 1948 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने पट्टाभी सितरमैया‌. इसके बाद जेबी कांग्रेस से साइड लाइन किए जाने लगे.

राष्ट्रपति चुनाव में भी जेबी की पसंद को तरजीह नहीं दी गई, स्थिति ऐसी हो गई कि जेबी ने कांग्रेस छोड़ दिया. बाद में उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनाई.

आपातकाल के मुखर विरोधी

साल 1972 में वे इंदिरा सरकार के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले पहले नेता थे. उन्होंने इंदिरा का पुरजोर विरोध किया. बाद में जब आपातकाल लगा तो उन्हें जेल में डाल दिया गया.

आपातकाल खत्म होने के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी. जेबी कृपलानी सरकार के मंत्रिमंडल से दूर रहे. उन्होंने उम्र और स्वास्थ का कारण बताकर अध्यात्म और अध्यापन काम में लग गए.

आचार्य कृपलानी ने अपने जीवन पर एक किताब लिखी थी, जो उनके मृत्यु के 22 साल बाद छपी. उन्होंने माय टाइम्स नामक किताब लिखी थी. जेबी कृपलानी का निधन ९४ साल की उम्र में साल 1982 में हुआ.