Satyajit Ray

सत्यजीत रे (Satyajit Ray) की जां रेनोआ से मुलाकात और सिनेमा में योगदान

Vyakti Vishesh

सत्यजीत रे 20वीं सदी के सबसे महान भारतीय फिल्म निर्माता थे. वो स्क्रीन राइटरम्यूजिक कंपोज़रग्रैफिक्स आर्टिस्टगीतकारलेखक और निर्देशक थे. सत्यजीत रे का जन्म 2 मई साल 1921 में कलकत्ता में हुआ. सत्यजीत रे जब सिर्फ तीन साल के थे तब ही उनके पिता सुकमार रे का निधन हो गया. सत्यजीत रे का पालन पोषण उनकी मां ने ही किया.

सत्यजीत रे ने कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की और फिर बाद में आगे की पढ़ाई के लिए रे शांति निकेतन गए और अगले पांच साल वहीं रहे.

इसके बाद 1943 वे फिर कलकत्ता आ गए और बतौर ग्राफिक डिजाइनर काम करने लगे. इस दौरान उन्होंने कई मशहूर किताबों के आवरण यानी कवर डिजाइन किए जिनमें जिम कॉर्बेट कीमैन ईटर्स ऑफ कुमाऊंऔर जवाहर लाल नेहरू कीडिस्कवरी ऑफ इंडियाशामिल है.

पांथेर पांचाली का बाल संस्करण

1928 में छपे विभूतिभूषण बंधोपाध्याय के मशहूर उपन्यास पाथेर पांचाली का बाल संस्करण तैयार करने में सत्यजीत रे ने अहम भूमिका निभाई थी. इसका नाम था अम अंतिर भेपू यानी की आम के बीज की सीटी. सत्यजीत रे इस किताब से बहुत प्रभावित भी हुए थे.

उन्होंने इस किताब का कवर तो बनाया ही इसके लिए कई रेखाचित्र भी तैयार किए जो बाद में उनकी पहली फिल्म पाथेर पांचाली के खूबसूरत और मशहूर शॉट्स बने.

जां रेनोआ से मुलाकात

साल 1949 में सत्यजीत रे की मुलाकात फ्रांसीसी निर्देशक जां रेनोआ से हुई जो उन दिनों अपनी फिल्म द रिवर की शूटिंग के लिए लोकेशन की तलाश में कलकत्ता आए थे. रे ने लोकेशन तलाशने में रेनोआ की मदद की. इसी दौरान रेनोआ को लगा कि रे में बढ़िया फिल्मकार बनने की भी प्रतिभा है. उन्होंने यह बात कही भी. यहीं से रे के मन में फिल्म निर्माण का विचार उमड़नाघुमड़ना शुरू हुआ.

सिनेमा में सत्यजीत रे

साल 1950 में सत्य रे को अपनी कंपनी के काम से लंदन जाने का मौका मिला. यहां उन्होंने ताबड़तोड़ फिल्में देखीं. इनमें एक अंग्रेजी फिल्मबाइसकिल थीव्सभी थी जिसकी कहानी से सत्यजीत रे काफी प्रभावित हुए. भारत वापस लौटते हुए सफर के दौरान ही उनके दिमाग में पाथेर पांचाली का खाका खिंच चुका था.

साल 1952 में सत्यजीत रे ने फिल्म की शूटिंग शुरू की. एक नए फिल्मकार पर कोई दांव लगाने को तैयार नहीं था तो पैसा उन्हें अपने पल्ले से ही लगाना पड़ा. लेकिन यह जल्द ही खत्म हो गया और शूटिंग रुक गई. सत्यजीत रे ने कुछ लोगों से मदद लेने की कोशिश की. लेकिन वे फिल्म में अपने हिसाब से कुछ बदलाव चाहते थे जिसके लिए रे तैयार नहीं थे.

आखिर में पश्चिम बंगाल सरकार ने उनकी मदद की और 1955 में पाथेर पांचाली परदे पर आई. इस फिल्म ने समीक्षकों और दर्शकोंदोनों का दिल खुश कर दिया. कोलकाता में कई हफ्ते हाउसफुल चली इस फिल्म को कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले. इनमें फ्रांस के कांस फिल्म फेस्टिवल में मिला विशेष पुरस्कार बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट भी शामिल है.

कैलीग्राफी में भी सत्यजीत रे बहुत अच्छे थे. बंगाली और अंग्रेजी उन्होंने कई टाइपफेस डिजाइन किए थे. रे रोमन और रे बिजार नाम के उनके दो अंग्रेजी टाइपफेसों ने तो 1971 में एक अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता था.

तीन दर्जन फिल्मों का निर्देशन

इसके बाद तीन दशक से भी लंबे समय के दौरान सत्यजीत रे ने करीब तीन दर्जन फिल्मों का निर्देशन किया. इनमें पारस पत्थरकंचनजंघामहापुरुषअपूर संसारमहानगरचारूलताअपराजितोगूपी गायनबाघा बायन शामिल हैं. 1977 में उनकी एकमात्र फिल्म शतरंज के खिलाड़ी आई. साल 1991 में प्रदर्शित आंगतुक सत्यजीत रे के सिने करियर की अंतिम फिल्म थी.

सम्मान

सिनेमा में अतुलनीय योगदान के लिए सत्यजीत रे को कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले. साल 1978 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल की संचालक समिति ने उन्हें विश्व के तीन सर्वकालिक निर्देशकों में से एक के रूप में सम्मानित किया.

भारत सरकार की ओर से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में विभिन्न विधाओं के लिए उन्हें 32 राष्ट्रीय पुरस्कार मिले. सत्यजीत रे दूसरे फिल्मकार थे जिन्हें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया.

साल 1985 में उन्हें हिंदी फिल्म उद्योग के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 1992 में उन्हें भारत रत्न भी मिला और ऑस्कर (ऑनरेरी अवॉर्ड फॉर लाइफटाइम अचीवमेंट) भी. हालांकि काफी बीमार होने की वजह से वे इसे लेने खुद नहीं जा सके थे.

इसके करीब एक महीने के भीतर ही 23 अप्रैल 1992 को दिल का दौरा पड़ने की वजह से उनका निधन हो गया.