Jallianwala Bagh

जलियांवाला बाग हत्याकांड क्या है, जनरल डायर कौन था?

Explainer

जलियांवाला बाग हत्याकांड भारत के पंजाब प्रान्त के अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर के निकट जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 यानी की बैसाखी के दिन हुआ था. रौलेट एक्ट का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी. ये सभा पंजाब के दो लोकप्रिय नेताओं की गिरफ्तारी और रोलेट एक्ट के विरोध में रखी गई थी. जनरल डायर नामक एक अँग्रेज ऑफिसर ने बिना किसी वजह के उस सभा में मौजूद लोगों पर गोलियां चलवा दीं. 

गोली से बचने के लिए बहुत से लोगों ने कुएं में छलांग लगा दी थी. गोलीबारी के बाद कुएं से 200 से ज्यादा शव बरामद हुए थे. वहीं निकास का रास्ता संकरा होने की वजह से बहुत से लोग भगदड़ में कुचले गए थे.

अंग्रेज सरकार द्वारा जारी किये गये आंकड़ों से पता चलता है कि जलियांवाला बाग कांड में 379 लोग मारे गए थे. हालांकि, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अनुसार, उस दिन एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे और करीब दो हजार गोलियों से जख्मी हुए थे.

इस घटना का बदला लेने के लिए ही सरदार उधमसिंह ने 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में इस घटना के समय ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर रहे मायकल ओ ड्वायर को गोली चला कर मार डाला. उधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को फांसी पर चढ़ा दिया गया था.

अंग्रेजों का गढ़ था पंजाब

पंजाब को अंग्रेजी हुकूमत का गढ़ माना जाता था, जो इस बात पर गर्व करता था कि उसने राज्य में कॉलोनियों और रेलवे का विकास कर वहां समृद्धि लाई. भारतीय सेना में यहां के लोगों का योगदान भी महत्वपूर्ण था.

हालांकि एक तरफ विकास था तो दूसरी तरफ अंग्रेजी हुकूमत विद्रोह में उठने वाली आवाजों को कुचल रही थी. ऐसा 1857 के विद्रोह, 1870 के दशक के कूका आंदोलन और साथ ही 1914-15 के ग़दर आंदोन के दौरान देखने को भी मिला.

गवर्नर ओडायर का प्रशासन

लेफ्टिनेंट गवर्नर ओडायर का पंजाब प्रशासन 1919 से पहले ही भर्ती में सख्ती बरतने की वजह से काफी चर्चा में था. 1915 के गदर विद्रोह के बाद गंभीर दमनकारी नीतियां देखने को मिली. शिक्षित समूहों की आवाज दबाई जाने लगीं.

लेफ्टिनेंट गवर्नर ओडायर ब्रिटेन के आयरलैंड का जमींदार था. वो ब्रितानी औपनिवेश के अधिकारी वर्ग से जुड़े शिक्षित, लोगों, व्यापारियों और साहूकारों के ख़िलाफ़ सोच रखता था. और वो किसी भी राजनीतिक असंतोष को पहले ही अवसर में कुचल देते थे.

पीपुल्स बैंक की बर्बादी

जनरल ओ डायर को साल 1913 में पंजाब के लाला हरकिशन लाल के पीपुल्स बैंक की बर्बादी के लिए भी दोषी माना गया. इसके चलते लाहौर के व्यापारियों और ख़ासतौर पर शहरी इलाके में रहने वाले लोगों का सबकुछ लुट गया. उनकी सारी बचत पानी फिर गया. साल 1917-1919 के दरम्यान क़ीमतो में भारी उछाल आया. मज़दूरी के मानकों में गिरावट आ गई, निचले पायदान पर खड़े मज़दूर और पीछे धकेल दिये गए और इसका नतीजा ये हुआ कि कामगार और कारीगर घोर तंगी में घिर गए.

अमृतसर में तो मुस्लिम कश्मीरी कारीगरों के मुख्य आहार, चावल की क़ीमत तीन गुनी बढ़ गई. इन सारी बातों का असर ये हुआ कि धीरे-धीरे ही सही पर लोग लामबंध होने लगे. इन लोगों में युवा मुसलमानों के साथ-साथ ब्रिटिश विरोधी मध्यमवर्गीय मुस्लिम वर्ग भी था. व्यापार और उद्योग तितर-बितर हो रहे थे. 

राम सरन दत्त, गोकुल चंद नारंग, सैफ़ुद्दीन किचलू, अली ख़ान जैसे बहुत से राजनीतिक विचारक सामने आए, जिन्होंने ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की. लेकिन इसी दौरान साल 1918 में वो समय भी आया जब एंफ़्लुएंज़ा और मलेरिया जैसी महामारी ने हज़ारों लोगों की जान ले ली.

रॉलेट बिल का विरोध

फरवरी साल 1919 के अंत में जब रॉलेट बिल आया तो उसका व्यापक विरोध हुआ और इन सभी घटनाक्रमों की वजह से पंजाब इस विरोध में सबसे आगे था. रॉलेट एक्ट के ख़िलाफ़ हुआ आंदोलन भारत का पहला अख़िल भारतीय आंदोलन था और इसी आंदोलन ने महात्मा गांधी को राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया. इसके बाद ही महात्मा गांधी ने एक सत्याग्रह सभा का गठन किया और ख़ुद पूरे देश के दौरे पर निकल गए ताकि लोगों को एकजुट कर सकें.

हालांकि महात्मा गांधी ने कभी पंजाब का दौरा नहीं किया. वो पंजाब प्रांत में प्रवेश करने ही जा रहे थे लेकिन इसके ठीक पहले नौ अप्रैल को उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और वापस भेज दिया गया. 

हालांकि इससे पहले फरवरी महीने की शुरुआत में भी अमृतसर और लाहौर शहरों में सरकार विरोधी सभाएं हुई थीं. लेकिन ये सभाएं बेहद स्थानीय मुद्दों जैसे प्लेटफ़ॉर्म टिकट, चुनाव को लेकर थीं. इनमें रॉलेट एक्ट और ख़िलाफ़त के बारे में कोई चर्चा नहीं की गई थी.

देश के अधिकांश शहरों में 30 मार्च और 6 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया गया. हालांकि इस हड़ताल का सबसे ज़्यादा असर पंजाब के ही अमृतसर, लाहौर, गुजरांवाला और जालंधर शहर में देखने को मिला. लाहौर और अमृतसर में हुई जन-सभाओं में तो पच्चीस से तीस हज़ार तक लोग शामिल हुए.

9 अप्रैल को राम नवमी के दिन लोगों ने एक मार्च निकाला. राम नवमी के मौक़े पर निकले इस मार्च में हिंदू तो थे ही मुस्लिम भी शामिल हुए. मुस्लिमों ने तुर्की सैनिकों जैसे लिबास पहन रखे थे. बड़ी संख्या में लोग तो जमा हुए ही थे लेकिन जनरल डायर और उनके प्रशासन को सबसे अधिक चिंता हिंदू-मुस्लिम एकता देखकर हुई.

किसी भी विरोध को कुचलने के लिए हमेशा आतुर रहने वाले पंजाब के गवर्नर डायर ने उसी दिन अमृतसर के लोकप्रिय नेताओं डॉ. सत्यपाल और सैफ़ुद्दीन को अमृतसर से निर्वासित करने का फ़ैसला किया और ठीक उसी दिन गांधी को भी पंजाब में घुसने नहीं दिया गया और पलवल वापस भेज दिया गया.

अमृतसर में गुस्सा

अपने नेताओं के निर्वासन की ख़बर ने अमृतसर के लोगों को गुस्से से भर दिया. क़रीब पचास हज़ार की संख्या में लोग जुटे और दस अप्रैल को अपने नेताओं की रिहाई की मांग करते हुए उन्होंने सिविल लाइन्स तक मार्च निकाला. इस मार्च के दौरान सैनिकों से उनकी मुठभेड़ भी हुई. 

पथराव और गोलीबारी हुई जिसमें कई लोगों की मौत भी हो गई. गुस्साई भीड़ शहर वापस तो आ गई लेकिन उनके अंदर हलचल मची हुई थी. उन्होंने ब्रिटिश अथॉरिटी से संबद्ध प्रतीकों मसलन बैंक, रेलवे स्टेशन और चर्च में तोड़फोड़ शुरू कर दी.

पांच गोरे जिनमें से तीन बैंक कर्मचारी थे और एक रेलवे गार्ड था, मारे भी गए. इस हिंसक आंदोलन का नेतृत्व मुख्य तौर पर हिंदू, सिख खत्री और कश्मीरी मुसलमान कर रहे थे.

ठीक उसी दिन जालंधर के ब्रिगेडियर जनरल रेगिनाल्ड डायर को आदेश दिया गया कि वो इन हिंसक घटनाओं को संभालने के लिए फ़ौरन अमृतसर पहुंचें. नागरिक प्रशासन ढह चुका था और ऐसे में संभवत: डायर को परिस्थितियों को नियंत्रण में करने के लिए बुलाया गया था.

13 अप्रैल को लगभग शाम के साढ़े चार बज रहे थे, जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में मौजूद क़रीब 25 से 30 हज़ार लोगों पर गोलियां बरसाने का आदेश दे दिया. वो भी बिना किसी पूर्व चेतावनी के. ये गोलीबारी क़रीब दस मिनट तक बिना सेकंड रुके होती रही. जनरल डायर के आदेश के बाद सैनिकों ने क़रीब 1650 राउंड गोलियां चलाईं. गोलियां चलाते-चलाते चलाने वाले थक चुके थे और 379 ज़िंदा लोग लाश बन चुके थे.

जनरल डायर कौन था

डायर का जन्म भारत में ही हुआ था और डायर का पिता शराब बनाने का काम करता था. डायर को उर्दू और हिंदुस्तानी दोनों ही भाषाएं बहुत अच्छे से आती थीं. 

हंटर कमीशन

आधिकारिक हंटर कमीशन की जांच और अनाधिकारिक तौर पर हुई कांग्रेस की जांच में पाया गया कि जनरल डायर इस तरह की सोच रखने और सोच को अंजाम देने वाला अपने ही तरह का अकेला शख़्स था. हंटर कमीशन के सामने डायर ने माना था कि उन्होंने लोगों पर मशीन गन का इस्तेमाल किया.