Brajesh Singh

हिस्ट्रीशीटर बृजेश सिंह ने अपराध की दुनिया में कैसे कदम रखा

Vyakti Vishesh

बृजेश सिंह फ़िलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट वाराणसी से विधान परिषद के निर्दलीय सदस्य यानी की MLC हैं और उनके भतीजे बाहुबली नेता सुशील सिंह चंदौली की सैयदराजा सीट से बीजेपी के विधायक हैं.

2012 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में बृजेश भारतीय समाज पार्टी से सैयदराजा विधानसभा से चुनावी समर में उतरे थे, लेकिन तब उन्हें हार का सामना करना पड़ा था

बृजेश सिंह उर्फ अरुण कुमार सिंह का जन्म वाराणसी में हुआ था. उनके पिता रविन्द्र सिंह इलाके के रसूखदार लोगों में गिने जाते थे. सियासीतौर पर भी उनका रुतबा कम नहीं था. बृजेश सिंह बचपन से ही पढ़ाई लिखाई में काफी होनहार थे. 1984 में इंटर की परीक्षा में उन्होंने बहुत अच्छे अंक हासिल किए थे. उसके बाद बृजेश ने वाराणसी के यूपी कॉलेज से बीएससी की पढाई की. 

बृजेश सिंह ने अपराध की दुनिया में कैसे कदम रखा

वाराणसी के धरहरा गांव के रहने वाले बृजेश सिंह ने साल 1984 में हुई अपने पिता रवींद्र नाथ सिंह की हत्या का बदला लेने के लिए अपराध की दुनिया में कदम रखा. उस वक़्त वह स्कूल अच्छे नंबरों से पास कर बनारस में बीएससी की पढ़ाई कर रहे थे. लेकिन तभी ज़मीन के एक विवाद से जुड़ी रंजिश में स्थानीय राजनीति में सक्रिय उनके पिता रवींद्र नाथ सिंह की 27 अगस्त 1984 को हत्या कर दी गई.

इसके बाद बृजेश ने घर छोड़ दिया और एक साल के भीतर ही अपने पिता के तथाकथित हत्यारे हरिहर सिंह की हत्या कर दी. उस दिन तारीख थी 27 मई 1985. इस तरह बृजेश सिंह पर पहला मुक़दमा साल 1985 में दर्ज हुआ, लेकिन वह पुलिस की पकड़ से बाहर रहे. बृजेश सिंह का गुस्सा इतने से शांत नहीं हुआ. बृजेश को उन सभी लोगों की तलाश थी जो उनके पिता की हत्या में शामिल थे.

अप्रैल साल 1986 में यूपी के चंदौली ज़िले के सिकरौरा गांव में हुए हत्याकांड में उनका नाम आया. 

इस मामले में बृजेश पर 32 साल तक मुक़दमा चला. उन पर अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए इस गांव के पूर्व प्रधान रामचंद्र यादव सहित उनके परिवार के 6 लोगों की हत्या में शामिल होने का आरोप था.

घटना में चश्मदीद गवाह होने के बावजूद, गवाहों के बयानों को विरोधाभासी बताते हुए 32 साल बाद 2018 में स्थानीय अदालत ने बृजेश को इस मामले में बरी कर दिया.

लेकिन जेल में बंद रहने के दौरान ही बृजेश सिंह की पहली बार मुलाकात ग़ाज़ीपुर के पुराने हिस्ट्रीशीटर त्रिभुवन सिंह से हुई थी. इसके बाद पूर्वांचल में इन दोनों के गैंगों ने कई बड़े अपराध किए. फिर रेलवे और बिजली के ठेकों पर वर्चस्व के सिलसिले में इनकी मुख़्तार अंसारी और उनके गैंग के साथ लंबी ऐतिहासिक दुश्मनी शुरू हुई जो आज तक जारी है.

बृजेश सिंह पर कितने और किन मामलों में मुकदमें चल रहे हैं.

बृजेश सिंह पर पिछले तीन दशक में 30 से ज्यादा संगीन आपराधिक मुक़दमें दर्ज हुए हैं. बृजेश सिंह पर मकोका यानी महाराष्ट्र कंट्रोल ओफ़ ऑर्गनाइज्ड क्राइम ऐक्ट, टाडा यानी टेररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज एक्ट और गैंगस्टर एक्ट के तहत हत्या, अपहरण, हत्या का प्रयास, हत्या की साजिश रचना, दंगा-बवाल भड़काने, सरकारी कर्मचारी को इरादतन चोट पहुंचाने, झूठे सरकारी काग़ज़ात बनवाने, जबरन वसूली करने और धोखाधड़ी से ज़मीन हड़पने तक के मुक़दमे लग चुके हैं.

2000 के दशक में कई सालों तक फ़रार रहे बृजेश का सुराग़ बताने वाले के लिए तब उत्तर प्रदेश पुलिस ने 5 लाख रुपए का इनाम भी घोषित किया था. साल 2008 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने भुवनेश्वर से उनको गिरफ़्तार किया. आगे चलकर गवाहों के पलट जाने, गवाहों के बयानों में विरोधाभास होने और विरोधी पक्ष के वकीलों की कमज़ोर पैरवी की वजह से कई बड़े मुक़दमों में वे बरी हो गए.

2016 में दिए गए अपने चुनावी शपथपत्र के अनुसार बृजेश सिंह पर अब भी 11 मुक़दमे चल रहे हैं.

बृजेश सिंह राजनीति में कैसे आये?

बृजेश उस परिवार से आते हैं जिनका राजनीतिक रसूख रहा है. वाराणसी की एमएलसी सीट पर बृजेश और उनका परिवार पिछले 4 बार से जीतता रहा है. पहले दो बार बृजेश के बड़े भाई उदयनाथ सिंह, उसके बाद बृजेश की पत्नी अन्नपूर्णा सिंह और उसके बाद मार्च 2016 में ख़ुद बृजेश वाराणसी से एमएलसी बनकार राज्य की विधानसभा में दख़िल हुए. आज भी क्षेत्र के आम मुलाकाती वाराणसी सेंट्रल जेल में उनसे मिलने आते रहते हैं

फ़िलहाल जेल में बंद बृजेश के परिवार के औपचारिक राजनीतिक चेहरे के तौर पर पहचाने जाने वाले उनके भतीजे सुशील सिंह लगातार तीसरी बार चंदौली से विधायक चुने गए हैं. कभी कृष्णानंद राय से लेकर राजनाथ सिंह जैसे भाजपा नेताओं के क़रीबी माने जाने वाले बृजेश के भतीजे सुशील भी अब औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो चुके हैं.

2017 के चुनाव में जमा किए गए सुशील के शपथपत्र के अनुसार उनके ऊपर भी हत्या के प्रयास और धमकी देने के 5 मुक़दमे दर्ज हैं.

वाराणसी का डॉन, देश का डॉन कैसे बना?

नब्बे के शुरुआती दशक तक बृजेश सिंह को सिर्फ पूर्वांचल के लोग जानते थे लेकिन 1992 वो साल था जब बृजेश सिंह की धमक मुंबई में खनकी. जेजे अस्पताल शूटआउट मुंबई के अंडरवर्ल्ड के इतिहास की सबसे सनसनीख़ेज़ घटनाओं में शामिल है. इस मामले में भी बृजेश सिंह को नामजद किया गया. 

सितंबर 1992 की एक रात बीस से ज़्यादा लोग अचानक बंबई (मुंबई) के जेजे अस्पताल के वार्ड नम्बर 18 में घुस आए और बिस्तर पर लेटे शैलेश हलदरकर को गोलियों से छलनी कर दिया. हलदरकर बंबई के अरुण गवली गैंग के सदस्य थे और उनकी हत्या दाऊद इब्राहिम के रिश्तेदार इस्माइल पारकर की हत्या का बदला लेने के लिए की गई थी.

इस घटना में वार्ड की पहरेदारी कर रहे मुंबई पुलिस के दो हवलदार भी मारे गए थे. जेजे अस्पताल शूट-आउट में पहली बार एके 47 का इस्तेमाल कर 500 से ज़्यादा गोलियां चलाई गई थीं. घटना के बाद बृजेश पर टाडा के तहत लंबा मुक़दमा चला और सितंबर 2008 में उन्हें सबूतों की कमी के वजह से छोड़ दिया गया, लेकिन इस मामले ने बृजेश को पूर्वांचल के एक गैंगस्टर से पूरे देश में एक बड़े डॉन के तौर पर स्थापित कर दिया.

इसी बीच, 1990 के दशक में बृजेश सिंह ने धनबाद के पास झरिया का रुख़ किया. वे वहां के बाहुबली विधायक और कोयला माफ़िया सूर्यदेव सिंह के कारोबार की देखभाल करने के लिए उनके शूटर की तरह काम करने लगे और 6 हत्याओं में नामजद भी हुए.

2003 में सूर्यदेव के ही बेटे राजीव रंजन सिंह के अपहरण और हत्याकांड में मास्टरमाइंड के तौर पर बृजेश का नाम आया.

उसरी चट्टी हत्याकांड क्या है?

बृजेश सिंह पर अब तक चल रहे बड़े मुक़दमों में 2001 का गाज़ीपुर का उसरी चट्टी कांड है. बृजेश और मुख़्तार की सीधी गैंगवार में 2 लोगों की हत्या हुई थी और मुख़्तार घायल हुए थे.

घटना के बाद बृजेश के ख़िलाफ़ मुक़दमा लिखवाते हुए मुख़्तार ने उनकी गाड़ियों के क़ाफ़िले पर अचानक हमला करने उनके गनर की हत्या करने का आरोप लगाया. इस घटना के बाद बृजेश काफ़ी साल तक फ़रार रहे.

इस बीच ,आम लोगों में उनकी हत्या की अफ़वाहें उड़ती रहीं और वह भुवनेश्वर में अरुण कुमार बनकर रहते रहे. 2008 में यहीं से दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उनको गिरफ़्तार किया और फिर उन पर इकट्ठा हो चुके बीसियों मुक़दमों की सुनवाई देश की अलग-अलग अदालतों में शुरू हुई.

बृजेश सिंह ने व्यापार में क्या किया?

रईस फिल्म में शाहरुख खान का एक डायलॉग है कि कोई धंधा छोटा या बड़ा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता. लोहे के स्क्रैप से अपना व्यापार शुरू करने वाले बृजेश सिंह, पहले कोयले के धंधे में उतरे और फिर आज़मगढ़ से शराब का व्यापार शुरू किया और बलिया, भदोही, बनारस से लेकर झारखंड-छत्तीसगढ़ तक काम फैलाया. फिर ज़मीन, रियल एस्टेट में आने के बाद अब रेत का व्यापार भी चल रहा है.