Muthuvel Karunanidhi Stalin

मुथुवेल करुणानिधि स्टालिन कौन है, द्रविड़ मुन्नेड़ कड़गम क्या है?

Vyakti Vishesh

एमके स्टालिन का पूरा नाम मुथुवेल करुणानिधि स्टालिन है. वो द्रविड़ मुन्नेड़ कड़गम यानी की डीएमके के संस्थापक एम करुणानिधि के तीसरे बेटे हैं. डीएमके पार्टी ने 1967 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को राज्य की सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया थाउस वक्त सीएन अन्नदुरै ने सत्ता संभाली और प्रदेश के मुख्यमंत्री बने लेकिन साल 1967 में उनकी मौत हो गई.

इसके बाद 1969 में यानी से आज से पचास साल पहलेकरुणानिधि ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थीसाथ ही वे डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) के अध्यक्ष भी बने. करुणानिधि के निधन के बाद स्टालिन ने उनकी जगह ली है. 28 अगस्त, 2018 को स्टालिन डीएमके काउंसिल की बैठक में निर्विरोध पार्टी अध्यक्ष चुन लिए गए. वे अब उस शख्स की जगह ले चुके थेजो ना केवल उनके पिता थे बल्कि ऐसे नेता थे जिन्होंने अपनी पार्टी का तमाम उतार चढ़ाव के बीच 50 सालों तक नेतृत्व किया था.

एमके स्टालिन की शुरुआत

1970 के दशक के शुरुआती सालों में स्टालिन ने पार्टी में अपनी शुरुआत की. लेकिन तब उनकी पहचान मुख्यमंत्री करुणानिधि के बेटे भर की थी. मीसा (एमआईएसए) आंदोलन के 1975 में वे गिरफ्तार भी हुए और जेल के अंदर उनको प्रताड़ित किए जाने की ख़बरें भी आईं. इनसे पार्टी कैडरों में उनका सम्मान बढ़ालोगों की संवेदना भी उनसे जुड़ीं.

इसके बाद स्टालिन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. स्टालिन अगस्त, 2018 में पार्टी के अध्यक्ष बने. लेकिन यहां तक पहुंचना उनके लिए आसान नहीं रहा. उन्हें तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा. उन्होंने अपने स्कूली दिनों से ही राजनीति शुरू कर दी थी. उन्होंने चेन्नई के गोपालापुरम में पार्टी के यूथ विंग का निर्माण किया और पार्टी के सिद्धांतों से उन्हें जोड़ा.

1970 के शुरुआती सालों में स्टालिन युवाओं को अपनी पार्टी की बैठकों में आने के लिए प्रोत्साहित करते और अपनी पार्टी का चुनाव प्रचार भी करते. 1980 में करुणानिधि ने पार्टी के यूथ विंग की शुरुआत मदुरै में की थी. स्टालिन इसके शुरुआती संयोजक थे. 1984 में उन्हें यूथ विंग का सचिव बनाया गया. स्टालिन लंबे समय तक इस पद पर बने रहे.

थोड़े समय तक के लिए वे पार्टी के उप महासचिव भी बनाए गए, 2008 में वे पार्टी के कोषाध्यक्ष बनेजनवरी, 2017 में वे पार्टी के पहले कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए.

स्टालिन का चुनावी प्रदर्शन

1984 में पहली बार स्टालिन विधानसभा का चुनाव लड़ेहालांकि थाउजेंड लाइट्स क्षेत्र से वे एडीएमके के एक वरिष्ठ नेता के हाथों मामूली अंतर से चुनाव हार गए थे. हालांकि बाद में वे उसी विधानसभा क्षेत्र से 1989, 1996, 2001 और 2006 का चुनाव जीतने में कामयाब रहे. इस बीच 1991 का चुनाव वे हार भी गए थे.

2011 और 2016 में वे कोलाथुर विधानसभा से चुनाव मैदान में उतरे और दोनों बार जीतने में कामयाब रहेफिलहाल राज्य विधानसभा उनकी मौजूदा भूमिका प्रतिपक्ष के नेता की है.

स्टालिन की प्रशासनिक क्षमता

2006 में जब डीएमके सत्ता में आई तो स्टालिन को राज्य के स्थानीय प्रशासनिक मामलों का मंत्री बनाया गया. वे पांच साल तक इस महकमे के मंत्री रहे और इस दौरान उनकी प्रशासनिक क्षमता की काफी तारीफें हुईं.

इससे पहले 1996 से 2000 के बीच वे चेन्नई के मेयर भी रहे और इस दौरान उनके किए कामों के चलते उन्हें प्रशंसा भी मिली. उन्होंने न केवल शहर के सड़कों की स्थिति में सुधार किया बल्कि आधारभूत ढांचों को भी बढ़ाया जिसके चलते पार्टी के कैडर और आम लोग उन्हें आज भी याद करते हैं.

2001 में स्टालिनकरुणानिधि और कुछ अन्य लोगों को चेन्नई में ओवरपुल निर्माण में हुई धांधली के चलते गिरफ्तार होना पड़ा था. लेकिन बाद में सरकार ने इस बात पर कोई चार्जशीट दाखिल नहीं है.

राज्य के पहले उपमुख्यमंत्री

2009 में स्टालिन ने राज्य के उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर इतिहास बना दियाकुछ रिपोर्टों में ये भी दावा किया गया कि स्टालिन ही 2014 के लोकसभा चुनाव और 2016 के राज्य विधानसभा चुनाव के मुख्य रणनीतिकार थे. उम्मीदवारों के चयन से लेकर सहयोगियों पर फैसला लेने में उनकी अहम भूमिका रही थी.

आलोचना

स्टालिन की तुलना अमूमन उनके अपने ही पिता से होती है. करुणानिधि ना केवल एक शानदार लेखक थे बल्कि उनमें भाषण देने की अद्भुत काबिलियत भी थीजब भी कभी स्टालिन से कोई मुहावरा या फिर नाम गलत निकलता है तो लोग पकड़ लेते हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल करते हैं.

एमके स्टालिन की इस बात के लिए भी आलोचना होने लगी है कि इन दिनों पार्टी में उनके बेटे उदयनिती स्टालिन की अहमयित बढ़ती जा रही है. उदयनिती तमिल सिनेमा के अभिनेता हैं और 2019 के चुनाव में डीएमके प्रत्याशियों के लिए प्रचार करेंगे.

उदयनिती पार्टी में किसी वरिष्ठ पद पर नहीं हैं लेकिन डीएमके के पोस्टरबैनर और होर्डिंग में उनकी तस्वीर धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रही है.

स्टालिन की अगली चुनौती

करुणानिधि के निधन के साथ हीस्टालिन को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं. डीएमके पार्टी और राजनीतिक परिदृश्य पर उनके पास समय भी काफी है. 2016 में जब जयललिता का निधन हुआ था तो एआईडीमके में असंतोष देखने को मिला और पार्टी दो गुटों में बंट भी गई थी. ऐसे में स्टालिन के लिए सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि वे किस तरह से अपनी पार्टी को एकजुट रखते हैं.

स्टालिन और उनके भाई एमके अलागिरी के बीच के मतभेद को राजनीतिक विश्लेषक गंभीरता से देख रहे हैं. अलगिरी को पार्टी से हटाए जाने के बाद दोनों के समर्थकों के बीच खाई के बढ़ने की आशंका भी है.

बहरहाल ये भी माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में पार्टी के अंदर या बाहर में सहयोगी पार्टियों के साथ मित्रवत व्यवहार के साथ स्टालिन अपने डायनामिक अप्रोच के साथ काम करते नजर आएंगे.