Sam Manekshaw

सैम होरमूज़जी फ़्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ कौन थे, चीन और पाकिस्तान युद्ध में भूमिका

Vyakti Vishesh

मानेकशॉ का पूरा नाम सैम होरमूज़जी फ़्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ था. तीन अप्रैल साल 1913 में सैम मानेकशॉ का जन्म एक पारसी परिवार में हुआ. मानेकशॉ बचपन से ही डॉक्टर बनना चाहते थे लेकिन पिता के मना करने के बाद उन्होंने घर में ही बगावत की और सेना में शामिल हो गये.

दूसरे विश्वयुद्ध में बतौर कप्तान उनकी तैनाती बर्मा फ्रंट पर हुई. उन्हें सित्तंग पुल को जापानियों से बचाने की ज़िम्मेदारी दी गयी थी. उन्होंने वहां बड़ी बहादुरी से अपनी कंपनी का नेतृत्व किया था. उस लड़ाई में उनके पेट में सात गोलियां लगी थीं और वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

सैम के बचने की संभावना कम ही थी. उनकी बहादुरी से प्रभावित होकर डिवीज़न के कमांडर मेजर जनरल डीटी कवन ने अपना मिलिट्री क्रॉस उन्हें दे दिया.

सैम बहादुर

आज़ादी के बाद सैम मानिकशॉ पंजाब रेजिमेंट में शामिल हुए और बाद में गोरखा राइफल्स में कर्नल बने. इस दौरान एक बार जब वे गोरखा टुकड़ी की सलामी ले रहे थे तब उसके हवलदार से उन्होंने पुछा, ‘तेरो नाम के छाहे (है)‘ उसने कहा, ‘हरका बहादुर गुरुंग’. सैम ने फिर पूछा, ‘मेरो नाम के छाहे ?’ उसने कुछ देर सोचा और कहा, ‘सैम बहादुर!’ तबसे वे सैमबहादुरके नाम से प्रसिद्ध हो गए.

कोर्ट ऑफ इंक्वायरी

1961 में वीके कृष्ण मेनन ने उनके ख़िलाफ़ यह कहकर कोर्ट ऑफ़ इंक्वायरी बिठा दी थी कि उनकी कार्यशैली में अंग्रेजों का प्रभाव दिखता है (उस समय मानेकशॉ स्टाफ कॉलेज में कमांडेंट के पद पर तैनात थे) मेनन ज़ाहिर तौर पर समाजवादी थे. संभव है कि वो उन्हें पसंद ना करते हों. पर मामले की गहराई में जाने पर कुछ और भी समझ आता है. सैम के समकालीन लेफ्टिनेंट जनरल बृजमोहन कौल नेहरू के करीबी थे और कौल साहब को कई बार इस बात का फायदा मिला.

चीन से लड़ाई

1962 की लड़ाई में कौल चीफ ऑफ़ जनरल स्टाफ नियुक्त थे और उन्हें 4 कोरमुख्यालय तेजपुर असम का कमांडर बनाया गया. सेना में यह पदचीफ ऑफ़ जनरल स्टाफसेनाध्यक्ष से एक पोस्ट नीचे होता थी. इसलिए मुमकिन हैै कि कौल साहब को सैम पर तरजीह देने के लिए यह जांच बिठाई गयी होखैरलेफ्टिनेंट जनरल बृजमोहन कौल बतौर कमांडर कोई तीर नहीं मार पाए थे. चीन भारत की पूर्वी सीमा पर हावी होता जा रहा था तब नेहरू ने कौल को हटाकर सैम मानेकशॉ को 4 कोर का जनरल ऑफिसर कमांडिंग बनाकर भेजा. चार्ज लेते ही जवानों को उनका पहला ऑर्डर था, ‘जब तक कमांड से ऑर्डर न मिले मैदान ए जंग से कोई भी पीछे नहीं हटेगा और मैं सुनिश्चित करूंगा कि ऐसा कोई आदेश न आए.’ उसके बाद चीनी सैनिक एक इंच ज़मीन भी अपने कब्ज़े में नहीं ले पाए और आखिरकार युद्ध विराम की घोषणा हो गयी.

पाकिस्तान युद्ध

1965 की लड़ाई में भी उन्होंने काफी अहम भूमिका निभाई थी. आठ जून, 1969 को गोरखा रायफल्स का पहला अफ़सर देश का सातवां सेनाध्यक्ष (4 स्टार) बना. 1973 में वे फ़ील्ड मर्शाल (5 स्टार) जनरल बना दिए गए. फ़ील्ड मार्शल कभी रिटायर नहीं होतेउनकी गाड़ी पर 5 स्टार लगे रहते हैं. वे ताज़िन्दगी फौज की वर्दी पहन सकते हैं और फौज की सलामी ले सकते हैं.

इंदिरा को स्वीटी

सैम का सेंस ऑफ़ ह्यूमर बहुत कमाल का था. वे इंदिरा गांधी कोस्वीटी’, ‘डार्लिंगकहकर बुलाते थे. सरकारों को फौजी जनरलों से बहुत डर लगता है और जब जनरल मानेकशॉ सरीखे का बहादुर और बेबाक होतो यह डर कई गुना बढ़ जाता है. 1971 के बाद आये दिन यह अफवाह उड़ने लगी थी कि वे सरकार का तख्ता पलट करने वाले हैं. इससे आजिज़ आकरइंदिरा ने उन्हें एक दिन फ़ोन किया. यह किस्सा खुद मानेकशॉ ने एक इंटरव्यू में बताया था