Raja Ravi Verma

उर्वशी, रंभा जैसी अप्सराओं की तस्वीरें बनाने वाले राजा रवि वर्मा कौन थे?

Vyakti Vishesh

राजा रवि वर्मा ऐसे पहले चित्रकार थे जिन्होंने हिंदू देवी-देवताओं को आम इंसान जैसा दिखाया. आज हम फोटो, पोस्टर, कैलेंडर आदि में सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, राधा या कृष्ण की जो तस्वीरें देखते हैं वे ज्यादातर राजा रवि वर्मा की कल्पनाशक्ति की ही उपज हैं. उनके सबसे मशहूर चित्रों में ‘सरस्वती’ और ‘लक्ष्मी’ के चित्र भी शामिल हैं.

उनके कई चित्र बड़ौदा के लक्ष्मी विलास पैलेस में आज तक सुरक्षित हैं. कइयों का मानना है कि उनके सभी चित्रों की बाजार कीमत देश के उस सबसे बड़े महल से भी ज्यादा हो सकती है. विचारमग्न युवती, दमयंती-हंसा संभाषण, संगीत सभा, अर्जुन और सुभद्रा, विरह व्याकुल युवती, शकुंतला, रावण द्वारा जटायु वध, इंद्रजीत-विजय, नायर जाति की स्त्री, द्रौपदी कीचक, राजा शांतनु और मत्स्यगंधा, शकुंतला और राजा दुष्यंता आदि उनके प्रसिद्ध चित्र हैं.

राजा रवि वर्मा आज से 169 साल पहले 29 अप्रैल 1848 को केरल के किलिमानूर में पैदा हुए. उनके चाचा भी कुशल चित्रकार थे. कहते हैं कि चाचा से ही उन्हें पेंटिंग का चस्का लगा. रवि वर्मा करीब 14 साल के थे तब उनके चाचा ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें त्रावणकोर के राजमहल पेटिंग सिखाने ले गए. उस समय त्रावणकोर महाराज के दरबार में वाटर पेंटिंग के महारथी रामास्वामी नायडू से उन्होंने चित्रकारी के गुर सीखे. जल्द ही रवि वर्मा वाटर पेंटिंग के उस्ताद बन गए.

ऑयल पेंटिंग्स

विदेशी लोग ‘आइल पें​टिंग’ करते थे यानी लकड़ी के तिपाए पर ‘कैनवास’ रखकर पेंट किया करते थे. कैनवास सूत या जूट का बना होता था. भारत इस तकनीक से पूरी तरह अनजान था. राजा रवि वर्मा ने इस शैली को यूरोपीय चित्रकारों से अपनाया और भारत में मशहूर कराया. ऑयल पेंटिंग्स की वजह से ही राजा रवि वर्मा की रचनाएं मशहूर हुईं.

चित्रकला की इस शैली में रंग निखर कर आता है और इसे सालों तक सुरक्षित रखना संभव होता है. आलोचक भी मानते हैं कि उनके जैसी ऑयल पेंटिंग बनाने वाला दूसरा चित्रकार इस देश में आज तक नहीं हुआ.

रवि वर्मा करीब 20 साल के रहे होंगे तब नीदरलैंड के मशहूर चित्रकार थियोडोर जेनसन भारत आए थे. विदेशी पेंटर ऑयल पेंटिंग किया करते थे. भारत इस तकनीक से लगभग अनजान ही था. हालांकि माना जाता है कि ऑयल पेंटिंग की शुरुआत भारत और चीन के पेंटरों ने ही की थी लेकिन यह शैली यहां उतनी प्रचलित नहीं हो सकी.

किसी तरह यह ग्रीस पहुंची और ​पुनर्जागरण के बाद 15वीं सदी में इसका यूरोप में विस्तार हुआ. यूरोपीय पेंटरों में आॅयल पेंटिंग की तकनीक बहुत मशहूर हो गई थी. इसे फिर भारत पहुंचते-पहुंचते 19वीं सदी आ गई. तब तक यहां ज्यादातर पेंटिंग्स वाटर कलर से ही बनती थी. राजा रवि वर्मा ने थियोडोर जेनसन से आॅयल पेंटिंग की तकनीक न सिर्फ सीखी बल्कि उसमें महारत हासिल की. भारत में ऑयल पेंटिंग को मशहूर करने में उनका योगदान अतुलनीय माना जाता है.

थियोडोर जेनसन से पोर्ट्रेट बनाना सीखा

रवि वर्मा ने पोर्ट्रेट बनाने की कला भी थियोडोर जेनसन से ही सीखी. पोर्ट्रेट यानी प्रतिकृति किसी को सामने बिठा कर या उसकी फोटो देखकर बनाई जाती थी. जेनसन उस समय पोर्ट्रेट बनाने के लिए पूरी दुनिया में मशहूर थे. बाद में राजा रवि वर्मा को इसमें खूब मकबूलियत हासिल हुई.

उनके इस हुनर की लोकप्रियता ऐसी थी कि उस समय के तमाम राजा-महाराजा रवि वर्मा से अपना पोर्ट्रेट बनवाने के लिए लाइन लगाए रहते थे. कहते हैं राजा साहब इसके लिए तगड़ी फीस वसूलते थे जो आज के लिहाज से करोड़ों के बराबर थी.

महाराणा प्रताप का बनाया पोर्ट्रेट रवि वर्मा के हुनर का बेमिसााल नमूना माना जाता है. जानकार उनके बनाए बड़ौदा के महाराज और महारानी के पोर्ट्रेट को भी लाजवाब मानते हैं.

देवी-देवताओं की पेंटिंग्स

प्रशिक्षण पूरा करने के बाद रवि वर्मा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि उनकी पेंटिंग का विषय क्या हो. वे महीनों तक इधर से उधर घूमते रहे और भारत की आत्मा को समझने की कोशिश करते रहे. काफी घूमने के बाद इनकी कल्पनाशक्ति ने समझ लिया कि धार्मिक ग्रंथों और महाकाव्यों में भारत की आत्मा बसी है. उन्होंने फैसला लिया कि वे इन ग्रंथों के चरित्रों की पेंटिंग बनाएंगे. रवि वर्मा ने कई पौराणिक कथाओं और उनके पात्रों के जीवन को अपने कैनवास पर उतारा. वे हिंदू देवियों के चित्रों को अक्सर सुन्दर दक्षिण भारतीय महिलाओं के ऊपर दर्शाते थे.

पेंटिंग्स के प्रेस

रवि वर्मा के ऑयल पेंटिंग्स की बहुत मांग थी. उन्होंने सोचा कि यदि इन चित्रों को आमजन तक पहुंचना है तो प्रेस खोलना होगा. इसलिए उन्होंने 1894 में विदेश से कलर लिथोग्राफिक प्रेस खरीदकर मुम्बई में लगाई और अपने चित्रों की नकल बनाकर बेचना शुरू किया.

इनसे पहले किसी भी चित्रकार ने ऐसा नहीं किया था. हालांकि इस कारोबार में उन्हें ज्यादा मुनाफा नहीं हु​आ लेकिन आमजन​ विशेषकर उन तक तक देवी-देवताओं की पहुंच हो गई जिनका मंदिरों में प्रवेश वर्जित था. कट्टरपंथियों ने इसका भी विरोध किया लेकिन आलोचकों ने इसके लिए राजा रवि वर्मा के प्रयास की खूब प्रशंसा की.

दादा साहब फाल्के को प्रोत्साहन

दादा साहब फाल्के ने गुजरात के गोधरा से फोटोग्राफर के तौर पर शुरुआत की थी. बाद में वे बड़ौदा आ गए. वहां उन्होंने पेंटिंग और फोटोग्राफी की शिक्षा हासिल की. बाद में जब राजा रवि वर्मा ने अपनी प्रेस खोली तो फाल्के को वहां नौकरी मिल गई. उनका रवि वर्मा से परिचय इसी दौरान हुआ.

धीरे-धीरे वे इस महान हस्ती के करीब आते गए. रवि वर्मा ने भी उनकी प्रतिभा को पहचाना और प्रोत्साहित किया. कई यह भी मानते हैं कि रवि वर्मा ने वह पैसा दादा साहब फाल्के को दे दिया था जो उनके पास अपनी प्रेस बेचने के बाद आया था और फाल्के ने इसी पैसे से अपने काम को आगे बढ़ाया.

विवादों से लंबा नाता

राजा रवि वर्मा पर आरोप लगे थे कि उन्होंने उर्वशी, रंभा जैसी अप्सराओं की अर्द्धनग्न तस्वीरें बनाईं. कई लोगों ने इसे हिंदू धर्म का अपमान माना. उन पर देश में कई जगह सालों तक मुकदमे चले. इसमें रवि वर्मा का काफी आर्थिक नुकसान हुआ और उन्हें काफी मानसिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी.

उनसे नाराज लोगों ने उनकी मुंबई स्थित प्रेस को जला दिया था. इस अग्निकांड में न केवल मशीन बल्कि उनके कई बहुमूल्य चित्र भी जल गए. हालांकि कई इस बात को सच नहीं मानते. उनके मुताबिक प्रेस में घाटा होने पर उन्होंने उसे किसी जर्मन चित्रकार को ​बेच दिया था.

राजा रवि वर्मा पर एक और आरोप लगाया गया कि सरस्वती और लक्ष्मी जैसे कई हिंदू देवियों का चेहरा उनकी प्रेमिका सुगंधा से मिलता है. लोग कहते हैं कि रवि वर्मा अपने चित्र और पोर्ट्रेट के लिए सुगंधा की ही सहायता लिया करते थे.

सुगंधा नामक यह लड़की किसी वेश्या की बेटी भी बताई गई. कट्टरपंथियों ने इसे लेकर उन पर हिंदू धर्म को अपवित्र करने का आरोप लगाया. इस मामले को लेकर भी काफी दिनों तक उन्हें मुसीबतें झेलनी पड़ी.

रवि वर्मा का निधन

रवि वर्मा दो अक्टूबर, 1906 को दुनिया से चल बसे. उनके जाने के करीब सात साल बाद दादा साहब फाल्के ने भारत की पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई. तब से भारतीय फिल्म ​उद्योग की शुरुआत हो गई.

सम्मान

राजा रवि वर्मा को 56 साल की उम्र में 1904 में तब देश का शीर्ष सम्मान ‘केसर-ए-हिंद’ दिया गया था. यह सम्मान आज के भारत-रत्न की तरह माना जाता था. यह सम्मान पाने वाले राजा रवि वर्मा पहले कलाकार थे.