June Almeida

June Almeida : Coronavirus को पहली बार देखने और विजुअलाइज करने वाली जून अल्मेडा कौन थीं

Vyakti Vishesh

जून अलमेडा का जन्म स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में हुआ. जून अलमेडा की बेटी जॉस ने द ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में लिखे अपने एक लेख में बताया था कि जून अलमेडा बचपन में पढ़ने में तेज तर्रार थीं बावजूद इसके पैसे की तंगी की वजह से उन्हें 16 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़नी पड़ी. साल 1947 में पढ़ाई छोड़ने के बाद जून अलमेडा ने ग्लासगो रॉयल इन्फर्मेरी के हिस्टोपैथोलॉजी डिपार्टमेंट में लैबोरेटरी टेक्नीशियन का काम करना शुरू किया. जहां उन्हें हर हफ्ते 25 शिलिंग्स पगार के तौर पर मिलते थे. जून अलमेडा ने जो वहां सीखा, उससे उन्हें वायरोलॉजिस्ट बनने में मदद मिली. उन्होंने ना केवल ऐसे वायरसों की पहचान की जो पहले देखे नहीं गये थे बल्कि उन्होंने वायरल इन्फेक्शन के रोगजनन की भी पहचान की.

कुछ समय बाद वह वहां से लंदन चली गईं. इसी बीच उन्हें वेनेज़ुएला के कलाकार एनरीके अलमेडा से प्यार हुआ और उन्होंने साल 1954 में उससे शादी कर ली. जब उनकी बेटी हुई तो उन्होंने कनाडा के टोरंटो शहर का रुख किया. जहां उन्हें ओनतेरियो कैंसर इंस्टीट्यूट में बतौर इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी टेक्नीशियन की नौकरी मिली.

जेई बैनेटवाला ने नेशनल बायोग्राफी की ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में लिखे अपने नोट में लिखा है कि यह सिर्फ जून अलमेडा के लिए संभव था कि बिना किसी फॉर्मल पढ़ाई और ट्रेनिंग के उन्हें काम मिला. बैनेटवाला कहते हैं कि कनाडा में अलमेडा के काम को नोटिस किया जाने लगा. उन्हें वहां के न्यूमरस साइंटिफिक पब्लिकेशन में जगह मिलने लगी, खास तौर पर वायरल स्ट्रक्चर में…

जून अलमेडा उन लोगों में शामिल थीं जिन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन के 1979 के रैपिड लैबोरेटरी वायरल डायग्नोसिस के मैनुअल को तैयार किया. अलमेडा ने एक तकनीक विकसित की जिसे इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी कहा गया. जून अलमेडा ने तकनीक की मदद से वायरस को एंटीबॉडीज़ से मिलाया गया. जून ने वायरस को एंटीबॉडीज़ के साथ मिलते हुए देखा और उसका विजुअल स्ट्रक्चर तैयार किया.

1984 में लिखे अपने रिसर्च पेपर में अल्मेडा ने बताया कि ये वायरल डायग्नोस्टिक फील्ड में बहुत ही उपयोगी टूल था. जून अलमेडा ने इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी की मदद से ही रुबेला वायरस को पहली बार विजुअलाइज किया. जून अलमेडा ने ही बताया कि हेपेटाइटिस बी वायरस में कम्पोनेंट हैं एक जो सरफेस पर है और दूसरा इंटरनली.

कोरोना वायरस की खोज

पहली बार इंसानी कोरोना वायरस की खोज साल 1965 में वैज्ञानिक डीजे टेयरेल और एमएल बेयोन ने किया. हालांकि इससे पहले ये बीमारी जानवरों में मिल चुकी थी. उन्होंने इस वायरस का सैंपल एक बच्चे की नाक से निकाला था जिसे सामान्य सर्दी जुकाम के लक्षण थे.

दोनों ने वायरस को B814 नाम दिया. साल 1965 में लिखे अपने रिसर्च पेपर में टेयरेल और बेयोन ने लिखा कि शुरुआती संदेह के बाद हममें विश्वास हो गया कि B 814 वायरस किसी भी इंसान में पाये गये वायरस से अलग है.  इसके दो साल बाद साल 1967 में अलमेडा ने इसका सैम्पल लिया और उसे अपनी इजाद की गई तकनीक इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी की मदद से इसका विजुअलाइजेशन किया.

साल 1967 में जर्नल वायरोलोजी में छपे लेख The Morphology of Three Previously Uncharacterized Human Respiratory Viruses that Grow in Organ Culture” में उन्होंने लिखा कि इस खोज की सबसे खास बात ये थी कि वायरस 229E और B814 एक समान थे जो इंसान की सांस लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करते थे. उन्होंने इसे कोरोना वायरस नाम दिया. जो साल 1968 में  स्वीकार्य हो गया.

रिटायर होने के बाद योगा टीचर

करियर के अंतिम दिनों में डॉक्टर जून अलमेडा वैलकॉम इंस्टिट्यूट में थीं जहाँ उन्होंने इमेजिंग के ज़रिए कई नए वायरसों की पहचान की और उनके पेटेंट अपने नाम करवाए. बाद में रिटायर होने के बाद वो योगा टीचर बन गईं थीं. 2007 में 77 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था.