क्या है UAPA और क्यों इसे ‘लोकतंत्र-विरोधी’ कहा जाता है?

Explainer

पिछले कुछ दिनों से UAPA कानून चर्चा में है.  इस कानून पर हमेशा से विवाद रहा है. एक्टिविस्ट इसे सरकार का एक ‘क्रूर हथियार’ बताते हैं.

आइये जानते हैं, UAPA क्या है, इस पर विवाद क्यों है और क्यों इसे ‘लोकतंत्र-विरोधी’ कहा जाता है?

UAPA यानी गैर कानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम यहां पर गैर-कानूनी गतिविधियों से तात्पर्य उन कार्यवाहियों से है जो किसी व्यक्ति/संगठन द्वारा देश की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता को भंग करने वाली गतिविधियों को बढ़ावा देता हो.

आज पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है.जहां एक ओर पूरे देश में लॉकडाउन है तो वहीं दूसरी ओर पत्रकारों एक्टिविस्टों पर इस कठोर कानून UAPA के तहत गिरफ्तारी हो रही है.  फ़रवरी में हुए दिल्ली दंगों के मामले में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की एम-फ़िल की छात्रा और जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी की सदस्य सफ़ूरा ज़रगर, जमिया के पीएचडी छात्र मीरान हैदर, जामिया एल्युमनाइ एसोसिएशन के अध्यक्ष शिफ़ा-उर रहमान के अलावा 10 और लोगों को  देश के सबसे कठोर क़ानून UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया है.पत्रकारों के खिलाफ लगातार होती कारवाईयों के बीच, अभी कुछ दिनों पहले कश्मीरी फोटो जर्नलिस्ट मसरत जहरा पर भी  UAPA के तहत मामले दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया गया था.

जम्मू कश्मीर पुलिस ने  मसर्रत ज़हरा के खिलाफ, सोशल मीडिया पर “राष्ट्र-विरोधी” तस्वीरें अपलोड करने के लिए  गैर-कानूनी गतिविधि यानी यूएपीए के तहत केस दर्ज किया. जहरा कश्मीर की दूसरी पत्रकार हैं जिनके खिलाफ कठोर यूएपीए कानून के तहत केस दर्ज किया गया है, इस कानून के तहत सरकार किसी भी व्यक्ति के खिलाफ जांच के आधार पर उसे आतंकवादी घोषित कर मुकदमा चला सकती है. इस कानून के तहत आरोपित व्यक्ति को सात साल तक की जेल हो सकती है. इससे पहले सितंबर 2018 में, कश्मीर नैरेटर के पत्रकार आसिफ सुल्तान को कथित रूप से एक प्रतिबंधित आतंकवादी समूह की मदद करने के आरोप में यूएपीए कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था. उन्हें अभी भी हिरासत में रखा गया है.अक्सर कर हमें देखने को मिलता रहता है कि आए दिन एक्टिविस्टों, पत्रकारों पर सरकार UAPA के तहत केस दर्ज कर देती है इस कानून के प्रावधानों का दायरा बहुत बड़ा है. इसी वजह से इसका इस्तेमाल अपराधियों के साथ-साथ लेखकों, आतंक संबंधी मामलों के वकील और एक्टिविस्ट्स पर भी हो सकता है.

क्या है UAPA कानून? (unlawful activities prevention amendment act) 1962 में भारत-चीन युद्ध में जब भारत की पराजय हुई और तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने तमिलनाडु राज्य के भारत से अलग होने के मुद्दे को लेकर चुनाव लड़ा था, तब केंद्र सरकार ने 1967 में इस कानून का गठन किया, जिसके तहत ऐसे किसी भी संगठन को सरकार गैर-कानूनी करार दे सकती है, जो भारत से अलग होने की बात करता हो और ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों को अंजाम देता हो. इसका मुख्य उद्देश्य भारत की अखंडता और संप्रभुता को चुनौती देने वाली गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए सरकार को ज़्यादा अधिकार देना था.

हालांकि पिछले कुछ सालों में आतंकी गतिवधियों से संबंधी TADA और POTA जैसे कानून खत्म कर दिए गए,लेकिन UAPA मौजूद रहा.साल 1995 में टाडा और 2004 में पोटा के ख़त्म होने के बाद उसी साल यूएपीए क़ानून में महत्वपूर्ण संशोधन किया गया. पोटा के कुछ प्रावधान (जैसे चार्जशीट दायर किए बिना 180 दिनों तक हिरासत में रखने का प्रावधान) शब्दशः यूएपीए में जोड़ दिया गया. इसके बाद साल 2008 में यूएपीए में संशोधन किया गया जिसमें आतंकवादी गतिविधि की परिभाषा का दायरा बढ़ा दिया गया. फिर 2012 में हुए संशोधन ने भारत की आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालने को भी इस कानून के दायरे में ला दिया.

संशोधित UAPA, 2019-  इसमें संशोधन करने के लिए 24 जुलाई  2019  को इसे लोकसभा में लाया गया फिर राज्यसभा में दो अगस्त 2019 को यह पास हुआ. जिसके बाद से ये एक्ट कानून बन गया. सरकार मूल रूप से आतंकवाद निरोध में ये कानून लाई थी. इस कानून में संशोधन के बाद  व्यक्तियों को भी आतंकवादी घोषित किया जा सकता है.सरकार को यह ताक़त मिल गई है  वो संस्थाओं ही नहीं अब किसी व्यक्ति को भी मात्र  जाँच के आधार पर आतंकवादी घोषित कर सकता है.इतना ही नहीं किसी पर शक होने से ही उसे आतंकवादी घोषित किया जा सकता है. फिलहाल सिर्फ संगठनों को ही आतंकवादी संगठन घोषित किया जा सकता था. खास बात ये है कि इसके लिए उस व्यक्ति का किसी आतंकी संगठन से जुड़े होना भी जरूरी नहीं है.यूएपीए के अनुसार पुलिस किसी संदिग्ध को बिना चार्जशीट कोर्ट में दाखिल किये 180 तक दिन कैद में रख सकती है.इसके साथ साथ आतंकी का टैग हटवाने के लिए भी कोर्ट के बजाय सरकार की बनाई रिव्यू कमेटी के पास जाना होगा. हालांकि बाद में कोर्ट में अपील की जा सकती है.

कानून के दोष:- इस कानून को संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत दी गई बुनियादी आजादी पर तर्कसंगत सीमाएं लगाने के लिए लाया गया था इसके साथ ही शस्त्रों के बिना एकत्र होने के अधिकार और संघ बनाने के अधिकार पर भी प्रतिबंध लगाता है.यह क़ानून संविधान के संघीय ढांचे की भावना के ख़िलाफ़ है.  यूएपीए में नए बदलाव के तहत एनआईए के पास असीमित अधिकार आ जाएंगे. एनआईए को किसी भी राज्य में जाकर अपनी मर्ज़ी से जाकर काम करने की छूट देता है जिससे केंद्र और राज्य के पुलिस बलों के बीच टकराव होगा.अगर एनआईए का कोई अफसर आतंकवाद से जुड़े किसी मामले की जाँच करता है तो उसे इसके लिए सिर्फ एनआईए के महानिदेशक से अनुमति लेनी होगी जिसमें काफी चुनौती है क्योंकि महानिदेशक जल्दबाजी में निर्णय या पक्षपातपूर्ण निर्णय ले सकता है.जिससे किसी बेगुनाह के भी आतंकवादी क़रार दिए जाने का जोखिम हो सकता है और इससे बचने के लिए एक्ट में कोई एहतियाती उपाय नहीं किया गया है. इस संशोधन में आतंकवाद की निश्चित परिभाषा नहीं है,  जिसका सरकार फायदा उठाते हुए, अपने राजनैतिक-वैचारिक विरोधियों को निशाना बना सकती है. जिसका खामियाजा हम अक्सर पत्रकारों एक्टिविस्टों को भुकतते देख ही रहे हैं.
जिसका एक उदाहरण अरुण फरेरा हैं जिन्हें साल 2007 में इस कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था और शहरी माओवादी बताया गया था. बाद में वे सभी मामलों में निर्दोष पाए  गये लेकिन इस कानून के कारण उन्हें पांच साल तक जेल में रहना पड़ा था.

क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के तहत कोई अभियुक्त तब तक बेक़सूर है जब तक कि उसके ख़िलाफ़ दोष साबित न हो जाए लेकिन इस एक्ट के मामले में सरकार किसी व्यक्ति की सुनवाई के नतीजे आने से पहले ही उसे आतंकवादी क़रार दे देती है. ये संविधान से मिले बुनियादी अधिकारों के भी ख़िलाफ़ है.

यूएपीए की धारा 36(4) में प्रक्रियात्मक गड़बड़ियां हैं. जैसे अभियुक्त को किसी भी तरह की सूचना देने का प्रावधान नहीं है. उसे किस आधार पर आतंकवादी घोषित किया गया है,यह बताना जरूरी नहीं है.

राज्य सरकारें और एनआईए दोनों ही इस क़ानून का इस्तेमाल करती हैं. एनआईए ने इस क़ानून के तहत 2078 मामले दर्ज किए हैं और इनमें 204 मामलों चार्जशीट दायर की है. अभी तक 54 मामलों में फ़ैसला आया है और इनमें 48 मामलों में सज़ा सुनाई गई है. एनआईए के पास दर्ज मामलों में दोषी ठहराये जाने की दर 91 फीसदी है.
एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार साल 2016 में इस एक्ट के तहत दर्ज हुए 33 मामलों में से 22 मामलों में अभियुक्तों को बरी कर दिया गया जबकि 2015 में दर्ज हुए 76 मामलों में से 65 मामलों में आरोप साबित नहीं किए जा सके. साल 2014 से 2016 तक के आंकड़ें बताते हैं कि 75 फ़ीसदी मामलों में रिहाई या बरी किए जाने का फ़ैसला आया. टेरर ग्लोबल इंडेक्स, 2018 के अनुसार पश्चिमी देश आतंकवाद विरोधी क़ानूनों के ज़रिए अपने यहां आतंकवाद पर काफ़ी हद तक क़ाबू पाने में कामयाब रहे हैं लेकिन भारत में नतीजे इसके उलट रहे हैं.