3 हजार साल पुरानी है आयुर्वेद चिकित्सा, आयुर्वेद के द्वारा प्लास्टिक सर्जरी भी संभव

इस वक्त देश में आयुर्वेद और एलौपेथिक दवाओं में से कौन सा बेहतर है इस बात को लेकर डिबेट चल रही है. आयुर्वेद दवा तकरीबन 3 हजार साल पुरानी पद्धति पर आधारित होती है.

ब्रिटानिक वेबसाइट के मुताबिक आयुर्वेद चिकित्सा प्रणाली से चिकित्सक 500 मिलियन लोगों का वैकल्पिक इलाज करते हैं. वैकल्पिक इलाज उस इलाज को कहते हैं जो बीमारी के मुख्य इलाज के अलावा की जाती है. उदाहरण के तौर पर किसी व्यक्ति को चोट लग जाने पर एलोपैथ की दवा दी जाती है लेकिन इसके साथ-साथ में हल्दी लगाया जाता है, ताकि जल्दी से जल्दी राहत मिल सके.

आयुर्वेद के द्वारा प्लास्टिक सर्जरी भी संभव-

वैसे तो प्लास्टिक सर्जरी पश्चिमी देशों की देन है. लेकिन भारत में करीब 2500 साल पहले प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत कर चुकी थी. प्राचीन भारत के चिकित्सक सुश्रुत को सर्जरी का जनक माना जाता है. उन्होंने अपनी किताब सुश्रुत में इसका जिक्र किया है. इस बारे में विस्तृत जानकारी कोलंबिया सर्जरी नामक वेबसाइट पर मिलती है.

Source- Navbharat Times

प्राचीन भारत में गंभीर अपराधों में सजा के तौर पर उनकी नाक और कान काट दी जाती थी. जिसके बाद अपराधी अपनी नाक और कान को सही कराने के लिए आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का सहारा लेते थे. सर्जरी के दौरान गाल और माथे से त्वचा काटकर नाक जोड़ने का प्रयास किया जाता था. सर्जरी खत्म होने के बाद संक्रमण को रोकने के लिए आयुर्वेदिक दवाएं दी जाती थी. इसके अलावा रुई में औषधियां लपेटकर नाक को ढक दिया जाता था.

प्रचलित कथाओं के मुताबिक सुश्रुत नाक को वापस जोड़ने की सर्जरी सफलतापूर्वक करते थे. सुश्रुत संहिता में 300 तरह की सर्जरी की प्रक्रियाओं के बारे में लिखा है. इसमें ब्लैडर स्टोन, हर्निया से लेकर सर्जरी के द्वारा प्रसव करवाने के बारे में भी दिया है.

आयुर्वेद चिकित्सा अपने आप में एक संपूर्ण चिकित्सा है. यहां तक कि प्लास्टिक सर्जरी भी आयुर्वेद के द्वारा संभव है. 8वीं शताब्दी में सुश्रुत संहिता का अरबी अनुवाद किया गया, जिसके बाद यह धीरे- धीरे पश्चिमी देशों तक पहुंचा, 14वीं और 15वीं शताब्दी में सुश्रुत संहिता की जानकारी इटली को हुई.

साल 1793 में दो अंग्रेज सर्जनों ने भारत में नाक की सर्जरी की आयुर्वेदिक विधि देखी. इसके अगले साल लंदन की ‘जैटलमैन’ मैगजीन ने आयुर्वेदिक सर्जरी के बारें में विस्तार से छापा. साल 1814 में एक ब्रिटिश सर्जन जोसेफ कॉन्सटेन्टिन ने आयुर्वेद पद्धति को पढ़ने के बाद 20 सालों तक लाशों के साथ इस प्रक्रिया की प्रैक्टिस शुरू की और वह इसमें सफल भी  रहें.

Source- The Wire

सर्जरी के जनक सुश्रुत-

एसोसिएशन ऑफ प्लास्टिक सर्जन्स ऑफ इंडिया की मुहर पर सुश्रुत की तस्वीर बनी होती है. दुनियाभर में नाक की सर्जरी सुश्रुत के तरीके का ही संशोधित रूप है जिसे इंडियन मैथड भी कहा जाता है.

Source- wikipedia

सर्जरी के बाद सिलाई में चिटियों का प्रयोग-

आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली में सर्जरी के बाद कटे हुए स्थान की सिलाई का तरीका अनोखा था. उस समय सिलाई का काम चिटियां करती थी. चिटियों को क्रम से घाव के उपर रख दिया जाता था. इनके जबड़े क्लिप का काम करते थे. प्राचीन भारत में टांको के लिए चिटियों का उपयोग करना आम बात थी.

एलोपैथ का इस्तेमाल-

एलोपैथ का सबसे पहले इस्तेमैाल साल 1810 में शुरू किया गया. जर्मन डॉक्टर सैमुअल हेनिमैन ने ही एलोपैथ का नाम सुझाया था. शुरुआत में एलौपेथ को विरोध का सामना करना पड़ा लेकिन जल्द इसने मुख्य चिकित्सा प्रणाली की जगह ले ली. एलोपैथ के तहत डॉक्टर, नर्स, फार्मासिस्ट, या दूसरे हेल्थकेयर प्रोफेशनल डिग्री और लाइसेंस लेकर प्रैक्टिस करते हैं.