Israel and Palestine conflict : इजरायल और फिलिस्तीन विवाद का मुख्य कारण धर्म है या जमीन?

कुछ दिनों से फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारी और इजरायली पुलिस के बीच रोज संघर्ष की खबरें आ रही थी. यह संघर्ष येरुशलम के पुराने शहर में हो रहा था. येरुशलम यहूदी, ईसाई और मुसलमानों का पवित्र स्थल है. रमजान के महीने में जब फिलिस्तीनी लोगों ने प्रदर्शन करते हुए दुनिया में अपनी मौजूदगी की मांग करने लगे तब इजरायल की पुलिस इस प्रदर्शन को दबाने के लिए एक्शन लेना शुरू किया. इजरायल का मानना है कि फिलीस्तीन की ओर से आंतकी संगठन हमास ने येरुशलम के शहरी इलाकों पर रॉकेट दागे हैं. इसके जवाब में इजरायल ने कार्यवाही की है. खैर मिस्त्र की मध्यस्थता के बाद दोनों देशों ने संघर्षविराम की घोषणा कर दी है. लेकिन 11 दिनों के इस संघर्ष में 232 फिलीस्तीनी बमबारी से मारे गए हैं जिसमें से 65 बच्चे थे. वहीं इजरायल में 2 बच्चों समेत 12 लोगों की मारे जाने की खबर है.

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रमजान के पवित्र महीने में दो देशों के बीच जंग एक बार फिर शुरू हो गया. ये देश इजरायल और फिलीस्तीन हैं. रमजान के वक्त फिलीस्तीनी अपनी आवाज बुलंद करते हैं तो वहीं इजरायल अपनी आजादी का जश्न मनाते हैं. इजरायल और फिलीस्तीन के बीच क्यों संघर्ष है और यह जंग कितनी पुरानी है. ये जानने के लिए इतिहास के पन्नों को खंगालना पड़ेगा.

जमीन और पहचान की जंग-

भूमध्य सागर के किनारे बसे इजरायल और फ्लीस्तीन की जंग धार्मिक के साथ साथ जमीन और पहचान की भी है. मशहूर इतिहासकार बेनी मॉरिस की किताब The Birth of the Palestinian Refugee Problem Revisited में लिखा है कि पहले विश्व युद्ध जिसे ओटोमन साम्राज्य को पूरी तरह खत्म कर दिया जिससे मध्य- पूर्व की पूरी तस्वीर बदल गया. क्योंकि युद्ध के बाद लोगों के मन राष्ट्रवाद की भावना पनपने लगी. तब यहां के निवासियों ने अन्य देश की तरह अपने लिए एक अलग देश की मांग करना शुरू कर दिया.

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पहले विश्व युद्ध के बाद से मध्य-पूर्व का ज्यादात्तर हिस्सा ब्रिटेन के कब्जे में चला गया लेकिन उन्होंने स्वतंत्र देश की मांग जारी रखी. उनकी मांग थी कि येरुशलम में यहूदियों के लिए एक स्थान दिया जाए जहां सिर्फ यहूदी रहें. वर्तमान में इजरायल और फिलीस्तीन दो अलग-अलग देश हैं. लेकिन ये दोनों ही देश एक- दूसरे का वजूद मानने से इंकार करते हैं. दूसरे विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसे साल 1947 में 181 मतों से पारित किया गया जिसके परिणामस्वरुप इजरायल और फिलीस्तीन दो देश बने.

इस प्रस्ताव के तहत इलाके को दो हिस्सों में बांटा गया जिसमें एक को अरब और दूसरे को यहूदियों का स्थान माना गया. इस तरह 14 मई साल 1948 को इजरायल दुनिया के सामने आया. तब से इजरायल 14 मई को अपना राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाता है.

अरब-इजरायल की पहली लड़ाई भी इसी दिन से शुरू हो गई. ये लड़ाई एक साल बाद साल 1949 को खत्म हुई. अंत में इसका परिणाम यह हुआ कि सात लाख से ज्यादा फिलीस्तीनों को अपना घर छोड़ना पड़ा. ब्रिटिश आधिपत्य वाले स्थानों को तीन भागों में बाटा गया जिसे इजरायल, वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी कहा गया. इजरायल के गठन के बाद से ही दोनों देश अपने वजूद को स्थापित करने के लिए संघर्ष कर कहे थे. करीब डेढ़ दशक बाद एक बार फिर इजरायल और अरब देश आमने-सामने थे. इस बार ये जंग 6 दिन चली. अंत में एक बार फिर जंग में इजरायल की जीत हुई. इस लड़ाई की मुख्य वजह यह थी कि साल 1948 में अरब देशों ने इजरायल के कुछ जमीन छीन लिया था. इजरायल को बदला लेने का मौका 1966-67 में मिला. इस जंग में इजरायल के सामने सीरिया था. लेकिन सीरिया के साथ लेबनान, मिस्त्र, जॉर्डन, ईराक भी थे. इजरायल के आक्रामक युद्ध के सामने ये 5 देश 6 दिनों से ज्यादा नहीं टिक पाए.

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जंग खत्म होने के बाद इजरायल ने एक बार फिर गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक पर कब्जा कर लिया. और इन स्थानों पर यहूदियों को बसाना शुरू किया और फिलीस्तीनियों पर नजर रखने के लिए खुफिया एजेंसी मोसाद को तैनात कर दिया.

कौन लड़ रहा जंग-

दोनो देशों के संगठन की बात करें तो इजरायल की खुफिया एंजेसी मोसाद लड़ रही है तो वहीं फिलीस्तीन राजनीतिक तौर के अलावा हर मौर्चे पर मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार है. वहीं फिलीस्तीनी संगठन हमास भी एक तरफ से मौर्च संभाले हुए है. इजरायल हमास को आंतकी संगठन मानता है. इसके अलावा फिलीस्तीन का एक और संगठन है तो मौर्चे पर डटा हुआ है ये संगठन है लिबरेशन ऑफ फिलील्कीन ऑर्गेनाइजेशन (PLO) जिसे यासीर अराफात द्वारा चलाया जाता है. यह संगठन इजरायली गतिविधियों का समय-समय पर विरोध करता है.

तीन धर्मो का पवित्रस्थल येरूशलम-

तमाम लड़ाईयों का असल कारण येरूशलम है. दोनों देश इसे अपनी राजधानी बताते हैं. हाल ही में अमेरिका और कई अन्य देशों ने येरूशलम को इजरायल की मान्यता दे दी है. हिब्रू भाषा में यरूशलम को यरूशलाइम और अरबी में अल-कुद्स कहा जाता है. यरूशलम तीन धर्मों का प्रमुख स्थान है, ईसाई, यहूदी और इस्लाम. तीनों धर्मों के लोग यरूशलम को अपने धर्म से जोड़ कर अलग-अलग कहानियां बताते हैं.

ईसाईयों के लिए ये शहर महत्वपूर्ण है. इस पुराने शहर में प्राचीन पवित्र चर्च है. ईसाई धर्म के अनुसार यहां ईसा मसीह का मकबरा ‘चर्च ऑफ द होली स्पेलकर’ है. यहीं पर प्रभु यीशु के सूली पर चढ़ने और पुनर्जीवन की कहानी केन्द्र में है. यहां पर पत्थर के तीन स्लेब हैं. पहला जहां उन्हें दफनाया गया, दूसरा जहां वह जीवित हुए और तीसरा वह जहां उन्हें पुनः दफनाया गया.

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यहूदी धर्म के अनुसार यह शहर यहूदियों का केन्द्र और राजधानी थी. यहां पर यहूदियों का पवित्र मंदिर सोलोमन मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी ईसा पूर्व में हुआ था. जिसे रोमन साम्राज्य आने के बाद नष्ट कर दिया गया. यहां एक हिस्से में वेस्टर्न वॉल है, ये दीवार मंदिर का अवशेष है. यहूदी समुदाय का मानना है कि यही वो स्थान है जहां से दुनिया का निर्माण हुआ और अब्राहम ने अपने बेटे आईजेक की कुर्बानी दी थी. इनके अनुसार मुसलमानों का ‘डोम ऑफ द रॉक’ मस्जिद ‘होली ऑफ होलीज़’ की जगह पर बनी हुई है.

मुसलमानों की पवित्र जगह ‘डोम ऑफ रॉक’ और ‘अल-अक्सा मस्जिद’ यरूशलम में ही स्थिति है. मुस्लिम क्वार्टर चारों में से सबसे बड़ा है. इस्लाम धर्म में ये मस्जिद तीसरी पवित्र जगह है. वर्तमान में वक्फ इस्लामिक ट्रस्ट इसकी देख-रेख कर रहा है. मुसलमानों का मानना है कि पैगंबर मुहम्मद ने मक्का से यहां तक का सफर एक दिन में पूरा किया था और यहीं से वो जन्नत गए थे.