तीस्ता जल विवाद क्या है? – Teesta Jal Vivad Kya Hai

तीस्सा नदी भारत के पूर्वी हिमालयी राज्य सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल पहुंचती है, इसके बाद असम में ब्रह्मपुत्र से मिलती है. इसके बाद बांग्लादेश पहुंचती है. बांग्लादेश में इसे जमुना नदी कहा जाता है. तीस्ता नदी की लंबाई 414 किलो मीटर है. जिसमें से 150  किलो मीटर सिक्किम में, 123 किलो मीटर पश्चिम बंगाल में और 140 किलो मीटर बांग्लादेश में बहती है. इस नदी का 83 फीसदी हिस्सा भारत में और 17 फीसदी हिस्सा बांग्लादेश में है.

तीस्ता नदी पर दो बैराज हैं, पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी के गोजोलदोबा में और बांग्लादेश के लालमोनिरहट के डलिया में. साल 2017 में हुए एक सर्वे से पता चला कि गर्मियों में नदी का पानी १०० क्यूमेक लेवल तक कम हो जाता है.

कई दौर की बातचीत

फ्रेंडली रिलेशन वाले दो देशों के बीच तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे को लेकर अब तक कई दौर की बातचीत हो चुकी है. दरअसल दोनों देशों की बड़ी आबादी का जीवन तीस्ता के जल पर निर्भर है.

बांग्लादेश के पाकिस्तान से आजाद होने के बाद साल 1972 में दोनों देशों ने नदी संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए एक संयुक्त जल आयोग का गठन किया था. इस आयोग ने अपनी पहली रिपोर्ट नौ साल बाद 1983 में सौंपी. इसके मुताबिक तीस्ता नदी के पानी का 39 फीसदी भारत और 36 फीसदी हिस्सा बांग्लादेश को देने पर अंतरिम समझौता हुआ. बाकी 25 फीसदी पानी को नदी में प्रवाह बनाए रखने के लिए छोड़ दिया गया.

हालांकि, इससे पहले भारत ने बांग्लादेश को विश्वास में लिए बिना ही पश्चिम बंगाल के न्यू जलपाईगुड़ी जिले में गाजलडोबा बांध बना दिया था. इसका उद्देश्य तीस्ता के पानी को नियंत्रित कर इसका इस्तेमाल बिजली उत्पादन और सिंचाई के लिए करना था. फिलहाल भारत में इस नदी के पानी का इस्तेमाल एक सिंचाई और दो पनबिजली परियोजनाओं के लिए किया जा रहा है. 1983 के समझौते के प्रावधान नदी प्रवाह के सही आंकड़े नहीं मिलने की वजह से लागू नहीं हो पाए थे.

दोनों देशों के बीच तीस्ता नदी पर किसी संधि को लेकर उस वक्त उम्मीद जगी, जब 20 साल की लंबी बातचीत और संयुक्त राष्ट्र के दखल के बाद 1996 में गंगा जल संधि हुई. बांग्लादेश ने इस संधि की तर्ज पर ही चार साल बाद तीस्ता नदी पर समझौते से संबंधित एक ड्राफ्ट तैयार किया.

इसके मुताबिक बांग्लादेश ने भारत से नदी का 48 फीसदी हिस्सा अपने लिए छोड़ने की बात कही.

समझौते के करीब थे मनमोहन सिंह

साल 2011 में भारत और बांग्लादेश के बीच कुछ उम्मीद जगी. जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ढाका दौरे में इस समझौते पर कुछ सहमति बनती दिख रही थी. भारत और बांग्लादेश एक अंतरिम समझौते पर पहुंच गये थे. जिसके मुताबिक अगले 15 साल तक के लिए 42.5 फीसदी पानी भारत को और 37.5 फीसदी पानी बांग्लादेश को मिलेगा. लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आखिरी समय में पीछे हटने की वजह से यह समझौता नहीं हो पाया.

तीस्ता विवाद में ममता बनर्जी की भूमिका

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 253 के मुताबिक केंद्र सरकार को बांग्लादेश के साथ तीस्ता जल संधि पर अपनी मुहर लगाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार को विश्वास में लेना जरूरी है. इस प्रस्तावित संधि के बारे में उनका मानना है कि बरसात के बाद के दिनों में नदी में पानी इतना कम होता है कि इसे बांग्लादेश के लिए नहीं छोड़ा जा सकता.

2011 में तृणमूल कांग्रेस यूपीए-2 सरकार में साझेदार पार्टी थी. इसके बावजूद ममता बनर्जी ने आखिरी वक्त में इस संधि से अपने पैर खींच लिए थे. इसके बाद 2015 में उन्होंने दोनों देशों के बीच जमीन की अदला-बदली पर तो अपनी सहमति दे दी लेकिन, तीस्ता संधि पर अपना रुख वही रखा. इस बार भी उनके रूख में कोई बदलाव आने के संकेत नजर नहीं आ रहे हैं. इसके कई कारण हैं.

बांग्लादेश को पानी की जरूरत

बांग्लादेश का शुरू से रुख रहा है कि वो भारत की समस्याओं को समझ रहा है लेकिन उसे पानी की जरूरत है. बांग्लादेश का उत्तर पश्चिम इलाका पूरी तरह से तीस्ता नदी के पानी पर ही निर्भर है. यहां के लोग कृषि और मतस्य व्यापार के लिए तीस्ता पर निर्भर हैं. भारत और बांग्लादेश के बीच ५४ नदियां बहती हैं लेकिन तीस्ता नदी बांग्लादेश की १४ फीसदी कृषि क्षेत्र को सिंचित करती है.

शेख हसीना को मोदी से उम्मीद

2014 में जब नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने तब बांग्लादेश को मोदी से उम्मीद थी. जून २०१५ में जब नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश का दौरा किया तब भी बांग्लादेश ने इस मुद्दे को जोरशोर से उठाया लेकिन ममता बनर्जी के प्रत्यक्ष विरोध की वजह से नरेंद्र मोदी, बांग्लादेश को कोई आश्वासन नहीं दे पाए.