Chipko Movement : पर्यावरण को लेकर अब तक का सबसे सफल आंदोलन

पर्यावरण की रक्षा के लिए चलाए जा रहे चिपको आंदोलन 70 के दशक की प्रभावी आंदोलनों में से एक था. यह आंदोलन उत्तराखंड के चमोली जिले के जंगलों से शुरू हुआ. 26 मार्च साल 1974 में पेड़ों की कटाई से बचाने के लिए गढ़वाल हिमालय स्थित लाता गांव की गौरा देवी ने 27 महिलाओं के साथ आंदोलन की शुरुआत की.

चिपको आंदोलन का उद्देश्य

चिपको आंदोलन का उद्देश्य तीव्रता से हो रही वनों की कटाई को रोकना था. जब व्यापारी पेड़ काटने आते थे. तब स्थानीय महिलाओं के समूह पेड़ों से लिपट कर अपना विरोध जताते हुए कहती थीं कि पेड़ काटने से पहले उन्हें काटा जाए.

Source- Medium

साल 1970 में चिपको आंदोलनक की पड़ी थी नींव

चिपको आंदोलन की शुरुआत साल 1970 में मशहूर पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, कामरेड गोविंद सिंह रावत, चंडीप्रसाद भट्ट और श्रीमती गौरा देवी के नेतृत्व में हुई थी. 26 मार्च साल 1974 में जब 2400 से ज्यादा पेड़ों की काटाई का टेंडर निकाला गया. तब गौरा देवी ने 27 महिलाओं के साथ पेड़ काटने आए लोगों को समझाने की कोशिश की लेकिन उन्होंने मानने से इंकार कर दिया. तब वे महिलाएं पेड़ों से चिपक गई. आखिरकार ठेकेदारों को खाली हाथ वापस जाना पड़ा.

इस घटना के बाद देशभर में चिपको आंदोलन चर्चा में आ गया. चिपको आंदोलन का प्रभाव राज्य उतर प्रदेश पर भी पड़ा. यूपी की तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने इस मामले के लिए एक कमेटी का गठन किया. जिसने गौरा देवी के हक में अपना फैसला दिया. इस फैसले को चिपको आंदोलन की जीत के रूप में देखा गया. वहीं देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हिमालय स्थित वनों की कटाई पर 15 साल के लिए रोक लगा दी. बाद में इस आंदोलन की लहर हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, राजस्थान तक फैली.