Makar Sankranti Special : क्यों मनाते हैं मकर संक्रांति ?

प्रति वर्ष 14 जनवरी को पूरे देश में मकर-संक्रांति का त्यौहार बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है. भिन्न-भिन्न राज्यों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है. वास्तव में सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को संक्रांति कहते हैं. ब्रह्माण्ड में अनगिनत तारे और उनके समूह होते हैं; इनको 27 भागों में विभाजित किया गया है जिनको नक्षत्र कहते हैं. इन 27 नक्षत्रों को 12 भागों में बांटा गया है जो राशि कहलाते हैं. इस प्रकार, कुल 12 राशियाँ हैं और इसलिए बारह सूर्य-संक्रांतियां होती हैं, लेकिन इनमें सबसे महत्वपूर्ण मकर-संक्रांति है.

शास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन ही सूर्य-देव धनु-राशि से निकल कर मकर-राशि में प्रवेश करते हैं. मकर-राशि के स्वामी शनि-देव हैं जो सूर्य-देव के पुत्र होते हुए भी पिता से शत्रु-भाव रखते हैं. शनि-देव जब अपनी माता ‘छाया’ (सूर्य-देव की द्वितीय पत्नी) के गर्भ में थे तब वे शिव जी की साधना में इतनी लीन थीं कि उन्होंने कुछ भी खाया-पीया नहीं जिससे जन्म के समय शनि-देव अत्यंत श्याम-वर्ण के पैदा हुए.

source-the indian express

उनके रंग को देखकर सूर्य देव ने अपनी पत्नी ‘छाया’ पर आरोप लगाया कि शनि उनका पुत्र नहीं हो सकता. तबसे शनि-देव अपने पिता सूर्य-देव से शत्रु भाव रखते हैं. अतः मकर-संक्रांति में प्रवेश कर सूर्य-देव पूरा एक महीना शनि-देव के घर सुख-शांति और बिना कष्ट के रहें इसलिए तिल का दान और सेवन मकर-संक्रांति पर किया जाता है क्योंकि तिल आदि के दान से शनि-देव प्रसन्न होते हैं.

सूर्य-देव के मकर-राशि में प्रवेश करते ही देवताओं के दिन और पितरों की रात्रि का शुभारम्भ हो जाता है. इसी के साथ सभी प्रकार के मांगलिक कार्य जैसे शादी-विवाह, यज्ञोपवीत, गृह-प्रवेश आदि शुरू हो जाते हैं. सूर्य का मकर-राशि में प्रवेश पृथ्वी-वासियों के लिए एक वरदान जैसा है. पुराणों में यह दिन पिता-पुत्र संबंधों में निकटता की शुरुआत के रूप में देखा जाता है जो सामाजिक दृष्टिकोण से बहुत ही महत्वपूर्ण है.

सूर्य की मकर-संक्रांति को महापर्व का दर्ज़ा दिया गया है. इसी दिन से सूर्य की उत्तरायण गति भी प्रारंभ होती है. इसलिए इस पर्व को कहीं–कहीं ‘उत्तरायणी’ भी कहते हैं. संक्रांति एक विशेष त्यौहार के रूप में देश के विभिन्न अंचलों में विविध प्रकार से मनाई जाती है. उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति के दिन ‘खिचड़ी’ बना कर खाने तथा खिचड़ी की सामग्रियों को दान देने की प्रथा होने से यह पर्व खिचड़ी के नाम से प्रसिद्ध हो गया.

बिहार एवं झारखण्ड में यह धारण है कि मकर-संक्रांति से सूर्य का स्वरुप तिल-तिल बढ़ता है इसीलिए वहां इसे तिल-संक्रांति कहा जाता है. हरियाणा व पंजाब में इसे लोढ़ी के रूप में मनाया जाता है. असम में इसी दिन बीहू त्यौहार मनाया जाता है. दक्षिण भारत में पोंगल का पर्व भी सूर्य के मकर राशि में प्रवेश  पर होता है तथा वहां यह पर्व चार दिन तक चलता है.

source-geamixe

ज्योतिष के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य की पूजा-उपासना करना परम फलदायक मन जाता है. सूर्य साक्षात प्रकृति की उर्जा का प्रतीक है. सूर्य आत्मा का कारक है और आत्मा में परमात्मा अर्थात परम-उर्जा का निवास होता है. सूर्य की उपासना से आध्यात्मिक उर्जा का संचरण होता है. सकारात्मक उर्जा से तन-मन में विशुध्त्ता, आत्मबल में वृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति के मार्ग प्रशस्त होते हैं.

जो मनुष्य प्रातः काल स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देते हैं उन्हें किसी भी प्रकार का ग्रह-दोष नहीं लगता क्योंकि सूर्य की सहस्त्र किरणों में से प्रमुख सात सुषुम्ना, हरिकेश, विश्वकर्मा, सूर्य, रश्मि, विष्णु और सर्व-बन्धु (जिनका रंग बैगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी और लाल है) हमारे शरीर को नई उर्जा और आत्म-बल प्रदान करते हुए हमारे पापों का शमन कर देती हैं.

source-chezshuchi

भारत कृषि प्रधान देश रहा है. मकर-संक्रांति पर्व का सम्बन्ध नई फसल से भी है. उत्तर-भारत में नई फसल का चावल और उर्द की डाल की खिचड़ी के साथ देशी घी का सेवन करने की प्रथा है जिससे सर्दी के मौसम में शरीर को गर्मी प्राप्त होती है. तिल-गुड़ का सेवन भी स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत लाभदायक है. खिचड़ी बनाने की परंपरा को शुरू करने वाले गोरखपुर के बाबा गोरखनाथ थे जिनको भगवान् शिव का अंश माना जाता है.

ऐसा कहा जाता है कि खिलजी के आक्रमण के समय नाथ-योगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था जिससे योगी अक्सर भूखे रह जाते थे और कमज़ोर हो रहे थे. इस समस्या का हल निकलने के लिए बाबा गोरखनाथ ने दाल-चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी. यह व्यंजन अत्यधिक पौष्टिक, स्वादिष्ट तथा तुरंत उर्जा देने वाला था. बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा.

मकर संक्रांति-पर्व पर गंगा-स्नान, दान, तप व जप का विशेष महत्त्व है. ऐसी मान्यता है कि इस दिन दिया गया दान विशेष फलदायक होता है. प्रत्येक वर्ष के प्रारंभ में इस त्योहार को मना कर सभी भारतीय उर्जा से परिपूर्ण हो जाते हैं जिससे पूरे वर्ष वे उत्साह से जीवन जीते हैं.

(लेखिका एस एन सेन कॉलेज, कानपुर में हिंदी की प्रोफेसर रह चुकी हैं.)