COVID-19 : क्या है Delta वैरिएंट जिसे कोरोना की दूसरी लहर के लिए माना जा रहा है जिम्मेदार

इस साल के शुरुआत में भारत में मिले कोरोना का नया वैरिएंट डेल्टा से तकरीबन 1.80 लाख लोगों की जान चली गयी. भारत में कोरोना की दूसरी लहर 11 फरवरी से शुरू हुई थी और अप्रैल में स्थिति और खराब हो गई थी. जिसके चलते अधिकांश राज्यों को लॉकडाउन लगाना पड़ा.

भारत में मिले कोरोना के नए वेरिएंट पर जीनोमिक कंसोर्टिया और नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के वैज्ञानिकों ने स्टडी की. उनका दावा है कि कोरोना का डबल म्यूटेंट वाला डेल्टा वैरिएंट अल्फा वैरिएंट से ज्यादा घाताक है. पिछले साल ब्रिटेन में कोरोना का अल्फा वैरिएंट मिला था.

अनेक राज्यों ने कोरोना के इस नए वैरिएंट से बचने के लिए सतर्कता बढ़ा दी है. बाहर से आने वाले यात्रियों का कोरोना टेस्ट किया जा रहा है और उनके सेंपल से जीनोम सिक्वेंसिंग कर नए वैरिएंट्स ऑफ कंसर्न का पता लगाया जा रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के सभी राज्यों में डेल्टा वैरिएंट से संक्रमित मरीज हैं. इस वैरिएंट ने सबसे ज्यादा दिल्ली, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना राज्य को प्रभावित किया हुआ है.

Source- The Scootsman

कोरोना के बढ़ते मामलों के लिए B.1.617 जिम्मेदार-

तकरीबन 14 दिन पहले भारत नें कोरोना के कई वैरिएंट मौजूद थे. जीनोमिक डेटा बताता है कि ब्रिटेन में मौजूद B.1.1.7 वैरिएंट सबसे पहले दिल्ली और पंजाब सें मिला था. वहीं B.1.618 पश्चिम बंगाल और B.1.617 वैरिएंट का कोरोना महाराष्ट्र में एक्टिव था. नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के डायरेक्टर सुजीत सिंह के अनुसार कोरोना के अप्रैल में लागातार बढ़ते कोरोना के मामले के लिए B.1.617 जिम्मेदार है. WHO के मुताबिक अप्रैल के बाद पॉजिटिव सैंपल की जीनोम सीक्वेंसिंग की गई तो 21 प्रतिशत केसेज B.1.617 और 7 प्रतिशत केसेज B.1.617.2 वैरिएंट के थे.

Source- Business Today

कोरोना का डेल्टा वैरिएंट सबसे पहले पिछले साल अक्टूबर में पाया गया था. 3 मई को NIV वैज्ञानिकों ने बताया कि डेल्टा वैरिएंट ने स्पाइक प्रोटीन में आठ म्यूटेशन होते हैं. इनमें से दो म्यूटेशन ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रिका के वैरिएंट जैसा ही था. वहीं एक म्यूटेशन ब्राजील के म्यूटेशन से मैच कर रहा था. ये म्यूटेशम इम्यूनिटी और एंटीबॉडी को चकमा देने में वारयस की मदद करता है.

क्या वैक्सीन नए वैरिएंट पर कारगार है-

WHO का मानना है कि साफ तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि वैक्सीन इस पर कारगर है या नहीं. यह भी साफ तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इससे पुनः संक्रमण का खतरा कितना है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) का मानना है कि भारत में बनी कोवैक्सिन वैक्सीन इस वैरिएंट पर कारगर है. वहीं भारत में बन रही दूसरी वैक्सीनों की प्रभावकारिता पर काम चल रहा है. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के रिसर्च के अनुसार इस नए वैरिएंट पर फाइजर वैक्सीन कारगर है. यानी इसका अगर किसी को पहले से कोरोना हुआ है तो नया वैरिएंट एक बार फिर से संक्रमित कर सकता है. लेकिन वैक्सीन लगी हो तो गंभीर लक्षण होने का खतरा कम है.

नए वैरिएंट से खतरा-

वायरस लंबे समय तक जीवित रहने के लिए अपने अंदर बदलाव करते रहते हैं. इसी के कारण कोरोना के नए-नए वैरिएंट उभर के सामने आ रहे हैं. डॉ चंद्रकांत लहारिया के अनुसार वायरस जितने बढ़ते जाएगे उसमें म्यूटेशन की भी संख्या बढ़ती जाएगी. जीनोंम में होने वाले बदलाव ही म्यूटेशन कहलाते हैं. वायरस जब तक रहेगा खतरा तब तक बना रहेगा. अगर यह वायरस जानवरों को अपने चपेट में ले लिया तो और खतरनाक वैरिएंट्स देखने का सामने आएंगे और तब हालात और बद से बत्तर हो जाएंगे.