Ganesh Shankar Vidyarthi : एक ऐसा पत्रकार जो असहायों को बचाते हुए सांप्रदायिकता की भेट चढ़ गया

25 मार्च साल 1931 को कानपुर में दंगे हो रहे थे. मजहब के नाम पर हिंदूमुसलमान एकदूसरे से लड़ रहे थे. इस लड़ाई में निस्सहायों को बचाते हुए गणेश शंकर विद्यार्थी मारे गए. जब बाद में गणेश शंकर विद्यार्थी की खोज हुई थी तो उनका शव लाशों के ढेर में पड़ा मिला. शव इतना फुल गया था कि उसे पहचानना मुश्किल हो रहा था. 21 मार्च को उनका अंतिम संस्कार किया गया. गणेश शंकर विद्यार्थी की मौत को महात्मा गांधी ने शानदार मौत कहते हुए कहा कि काश मैं भी ऐसी मौत मर सकूं. भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के मित्र विद्यार्थी एक ऐसे पत्रकार और साहित्यकार थे जिन्होंने अपनी कलम से ही अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति उत्पन्न की थी.

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जीवन परिचय

गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर साल 1890 में इलाहाबाद में हुआ था. इनके पिता का नाम जयनरायण था जो पेशें से एक स्कूल अध्यापक थे. इनके पिता उर्दू और फारसी के अच्छे जानकार माने जाते थे. विद्यार्थी की पढ़ाई ग्वालियर के मुंगावली से संपन्न हुई. पढ़ाई के दौरान ही इनका झुकाव पत्रकारिता की तरफ था. विद्यार्थी एक ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया था. ये महात्मा गांधी की तरह ही अहिंसा के पुजारी थे.

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16 साल के उम्र में लिखी पहली किताब

गणेश शंकर विद्यार्थी महात्मा गांधी से प्रभावित होकर आत्मोसर्गता नामक किताब लिख डाली. साल 1911 में उनका एक लेख हंस पत्रिका में छप चुका था. इस लेख का शीषक भी आत्मोत्सर्ग था.

9 नवंबर साल 1913 में विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया. पत्रकारिता के क्षेत्र में क्रांति करने के कारण अंग्रेजी शासन उन्हें पांच बार सश्रम कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाए थे. उनके जेल जाने के बाद प्रताप समाचार पत्र का संपादन बालकृष्ण शर्मा और माखनलाल चतुर्वेदी करते थे. जेल में बंद होने के दौरान विद्यार्थी ने विक्टर ह्यूगो की दो उपन्यास, ला मिजरेबिल्स और नाइंटी थ्री का हिन्दी अनुवाद किया. हिंदी साहित्य सम्मेलन की 19वें अधिवेशन में इन्हें सभापति चुना गया. विद्यार्थी सुधारवादी, धर्मपरायण और ईश्वरभक्त प्रवृति के व्यक्ति थे. इसके अलावा ये उच्च कोटी के वक्ता भी थे. यह स्वभाव के अत्यंत सरल, किंतु क्रोधी और हठी भी थे.