Home Azab Gazab माउंट एवरेस्ट पर बिना ऑक्सिजन सिलिंडर के चढ़ गया ये भारतीय

माउंट एवरेस्ट पर बिना ऑक्सिजन सिलिंडर के चढ़ गया ये भारतीय

क्या आप माउंट एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ना पसंद करेंगे ? वो भी बिना ऑक्सीजन सिलेंडर ?

युवा पर्वतारोही अर्जुन वाजपेई ने अत्यंत उत्साह के साथ हाल ही में दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई कर अपना परचम जमाया है. अर्जुन के जस्बे और उत्साह ने उसे माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाला तीसरा भारतीय युवा बना दिया है.

बेशक यह अनेकों पर्वतारोहियों के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि क्यों न हो, लेकिन अर्जुन के लिए तो यह एक शुरुआत है.

अर्जुन वाजपेयी
Courtesy-ibc24

जानिए अर्जुन की माउंट एवरेस्ट यात्रा

माउंट एवरेस्ट का सारांश केवल अर्जुन की यात्रा की शुरुआत थी. वर्ष 2011 में एवरेस्ट पर चढ़ने के बाद, अर्जुन ने दुनिया के चौथे और आठंवे सबसे ऊंचे पहाड़, लोत्से और मानसलू पर चढ़ाई करने का फैसला किया. और सबसे कम उम्र के पर्वतारोही बन गए.

इन लंबी और खड़ी चोटियों पर चढ़ाई कर जीतने के बाद अर्जुन ने माउंट माकलू को जीतने का फैसला किया.  आपको बता दें, यह पहाड़ अपने खड़े पिचों और चाकू की धार जैसे बने किनारों के लिए कुख्यात है जिसने इस चोटी को माउंट एवरेस्ट के मुकाबलें मृत्यु दर को दोगुना कर दिया है.

माउंट मकालू और अर्जुन की दास्तां

यह कहानी एक सच्चे और अकांक्षी पर्वतारोहण प्रेमी की है जिससे हर पर्वतारोही को प्रेरणा लेनी चाहिए. बता दें कि अर्जुन ने माउंट मकालू पर साल 2013 में चढ़ाई करने की शुरुआत की. जिस पर वो और उसकी टीम चोटी से केवल 150 मीटर की दूरी पर ही छोटी रस्सी होने की वजह से चोटी पर पहुंच ना सके और उन सभी को वहां से वापिस लौटना पड़ा.

अर्जुन वाजपेयी
Courtesy-news1india

साल 2014 में माउंट मकालू पर परचम लहराने की अर्जुन और उसकी टीम की दूसरी कोशिश के दौरान उसके एक साथी की चढ़ाई के दौरान ही मृत्यु हो गई.  जिसकी वजह से उन सभी को वापिस लौटना पड़ा.

युवा पर्वतारोही अर्जुन और उसकी टीम ने फिर साल 2015 में माउंट मकालू पर परचम लहराने की कोशिश की.  इस बार यह तीसरी कोशिश थी.  इस दौरान नेपाल में आए जानलेवा भूकंप की वजह से सभी को हताश लौटना पड़ा.

लगातार तीन साल में तीन बार माउंट मकालू पर परचम लहराने की अर्जुन और उसकी टीम की कोशिश नाकाम रही. मौत को करीब से देखने के बाद, हिमस्खलन और  लगातार तीन बार की विफलता के बावजूद भी अभी हौसला नहीं टूटा था.

दुनिया की पांचवी सबसे ऊंची चोटी माउंट मकालू पर चढ़ाई करने की इच्छा की वजह से उन सभी ने 2016 में फिर कोशिश की. इस साल यह चौथी कोशिश थी माउंट मकालू पर अपना परचम स्थापित करने की.  और इस साल उसने और उसकी टीम ने सफलतापूर्वक माउंट मकालू पर विजय प्राप्त की.

एक के बाद एक कठिन चढ़ाई

माउंट एवरेस्ट, माउंट लोत्से, माउंट मानसलू और माउंट मकालू पर चढ़ने के अलावा, अर्जुन ने माउंट चो ओयू पर भी चढ़ाई की है. यह दुनिया का छठा ऊंचा पर्वत है. जिसे फ़िरोज़ा देवी के नाम से भी जाना जाता है. हिमाचल प्रदेश की स्पीति घाटी में उन्होंने अपने पर्वतारोहण साथी भूपेश कुमार के साथ एक अज्ञात चोटी पर भी चढ़ाई की उसे “वर्जिन पीक” भी कह सकते है क्यूंकि उस 6,180 मीटर ऊंची चोटी पर अभी तक किसी ने चढ़ाई नहीं की थी.  अर्जुन ने माउंट डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के सम्मान में उस चोटी का नाम माउंट कलाम रखा.

अर्जुन वाजपेयी
courtesy-naidunia

माउंट चो ओयू पर चढ़ाई करने के लिए अर्जुन को शिविर 2 से निकाला जाना था क्योंकि वहां ऑक्सीजन की आपूर्ति कम  होने के साथ एक बर्फबारी में फंस गया था और पूलमोनेरी ऐडेमा का भी सामना करना पड़ा था.

इस अभियान के दौरान, अर्जुन के शरीर का बाईं तरफ के हिस्से ने पूरी तरह से काम करना बंद कर दिया. उन सभी कठिनाइयों के बाद भी, अर्जुन की आत्मा के हौसले ने अभी दम नहीं भरा था. वह वर्ष 2016 में माउंट चो ओयू पर चढ़ाई करने वाले सबसे कम उम्र के भारतीय बने.

जोश और जज्बे से भरे-कभी ना रुकने वाले अर्जुन वाजपेई ने ‘ग्रैंड स्लैम’ पर अपना परचम जमाने के सपने के साथ अब वह विश्व की तीसरी सबसे ऊंची शक्तिशाली पहाड़ी कंचनजंघा पर चढ़ाई चढ़ने की ठानी है.

इस तरह की कठिन और कभी भी जान का धोखा देने वाली चढ़ाई करने के लिए बहुत साहस लगता है. यह उनका जुनून ही है जिसने उन्हें चुनौतियों भरे स्थानों पर ले जाने का साहस दिया है. हम उसे इस साहस के लिये शुभकामनाएं देते हैं. हमें उम्मीद है कि वह इसे आने वाले समय में नई ऊंचाईयों पर ले जाएंगे.

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