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history : क्या आप जानते हैं ऋग्वेद की देन है लोकतंत्र का सिद्धांत?

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हमारा देश लोकतंत्र के आधार पर चलता है. लोकतंत्र को अगर एक शब्द में समझे तो इसे जनता का राज कह सकते हैं. यह एक ऐसी जीवन पद्धति है, जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुता सामाजिक जीवन का आधार होती हैं. अंग्रेजी में लोकतंत्र को Democracy कहते हैं. इस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द ‘डेमोस’ से हुई है.

डेमोस का शाब्दिक अर्थ होता है ‘जन साधारण’ और क्रेसी का अर्थ होता है ‘शासन’. इन्हीं दोनों से मिलकर बना है डेमोक्रेसी. प्राचीनकाल से ही भारत में सुदृढ़ लोकतांत्रिक व्यवस्था विद्यमान थी. इसके साक्ष्य प्राचीन साहित्य, सिक्कों और अभिलेखों में देखने को मिलते हैं. हम ऐसा कह सकते हैं कि लोकतंत्र का सिद्धांत वेदों की ही देन है.

लोकतंत्र
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जानकारों की मानें तो सभा और समिति का वर्णन ऋग्वेद और अथर्ववेद में देखने को मिलता है. इसमें ये साफ है कि उस समय राजा, मंत्री और विद्वान मिलकर विचार विमर्श करते थे और कोई भी फैसला लेते थे. इससे पता चलता है कि उस समय में भी समितियां बनाई जाती थीं.

अब आपने आज की संसद के झगड़े तो देखे ही होंगे, इसी तरह से उस वक्त भी द्विसदस्यीय संसद हुआ करती थी, जिसमें कभी-कभी लोगों के बीच मतभेद हो जाते थे और किसी बात को लेकर झगड़े भी हो जाते थे. देवताओं के राजा इंद्र को भी इन्हीं समितियों के निर्णय के आधार पर स्वर्ग लोक का राजा बनाया गया था.

जानकारों के अनुसार गणतंत्र शब्द का इस्तेमाल ऋग्वेद में 40 बार, अथर्ववेद में 9 बार और ब्राम्हाण ग्रंथों में अनेक बार किया गया है. लोकतंत्र के कुछ तथ्य है जैसे बहुमत जो पुराने समय में भी प्रचलित थे. उस समय में भी बहुमत के आधार पर फैसले लिए जाते थे. वैदिक काल के बाद छोटे गणराज्यों का वर्णन मिलता है, जिसमें जनता एक साथ मिलकर शासन के फैसले लेती थी.

महाभारत में भी शांति पर्व में ‘संसद’ नामक सभा का भी वर्णन मिलता है, क्योंकि इसमें आम जनता के लोग हुआ करते थे. इसे सदन भी कहा जाता था. इसके अलावा बौद्धकाल में भी लोकतंत्र का व्यवस्था थी. जानकारों के अनुसार लिच्छवी, वैशाली, मल्लक, मदक, कम्बोज गणतंत्र संघ लोकतांत्रिक व्यवस्था के उदाहरण है.