Home History इंदिरा गांधी : देश की पहली महिला पीएम के सबसे बड़े फैसले

इंदिरा गांधी : देश की पहली महिला पीएम के सबसे बड़े फैसले

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31 अक्टूबर 1984 के दिन देश ने एक शक्तिशाली महिला नेता को खो दिया. स्वर्गीय इंदिरा गांधी भारत की पहली और इकलौती महिला प्रधामंत्री रही.

एक ऐसे दौर में जब राजनीति में पुरुषों का वर्चस्व था, इंदिरा गांधी ने अपने फैसलों से जता दिया कि कोई महिला भी पुरुषसत्तात्मक सोच वाले देश, समाज, राजनीतिक गलियारे की कमान संभाल सकती है.

जानिए कुछ ऐसे फैसलों के बारे में जो देश की इस कड़क पीएम ने लिए –

1. अमेरिका से अनाज के रूप में मदद लेना  – 24 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी देश की पहली महिला पीएम बनी. उस समय देश की अर्थव्यवस्था काफी खराब थी, गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई चरम पर थी, सूखे की वजह से अनाज की कमी थी. ऐसे में पीएम गांधी ने अमेरिका से आर्थिक रूप में और PL 480 अनाज के रूप में मदद ली.

2. रूपए का अवमूल्यन यानि devaluation करना ( डॉलर के मुकाबले कीमत गिराना) – अमेरिका ने 1966 में मदद के बदले भारत को अपनी करेंसी रुपए का अवमूल्यन यानि devaluation करने को कहा. जून 1966 में कड़ी आलोचनाओं के बीच इंदिरा गांधी ने रूपए का अवमूल्यन करने का फैसला किया. इसका मतलब डॉलर रुपए के मुकाबले और महंगा हो गया. लोगों ने इस फैसले की काफी आलोचना की, लेकिन धीरे-धीरे इस कदम का अच्छा असर दिखने लगा. भूखमरी कम हुई, वित्तीय घाटा कम हुआ, आयात-निर्यात घाटा 930 करोड़ से करीब 100 करोड़ पर आ गया.

3. 1969 बैंको का राष्ट्रीयकरण – इंदिरा गांधी सरकार ने 1969 में बड़ा फैसला लेते हुए 14 बड़े बैंको पर लगाम लगाने का फैसला किया और इनका राष्ट्रीयकरण कर दिया. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि बैंक अपने हिसाब से नीतियां बनाते थे और फायदे के मुताबिक ग्राहक चुनते और उन्हें सेवा देते थे. कई मौकों पर बैंक बड़े उद्योगपतियों को कर्जा देने के लिए राजी हो जाते थे, लेकिन गरीब किसानों, छोटे व्यापारियों को मामूली कर्ज देने में आनाकानी करते थे. ऐसे में राष्ट्रीयकरण से सरकार ने बैंकों के लिए नियम बनाए जिनके तहत एक निश्चित राशि उन्हें गरीब किसानों को बतौर कर्ज देनी ही पड़ती थी, इस तरह की नीतियां लाने का मकसद था कि बैंकिंग की सेवा सभी तक पहुंचे.

4. प्रिवी पर्स की समाप्ति 1971 – इंदिरा गांधी का एक बेहद अहम फैसला था राजघरानों को मिलने वाले प्रिवी पर्स को खत्म करना. 1946-47 के दौरान जो रजवाड़े भारत में शामिल हुए थे उन्हें लुभाने के लिए सरकार ने एक तरह की पेंशन यानि प्रिवी पर्स देने की घोषणा की थी. राज्य के पुराने आकार, जनसंख्या के आधार पर पूर्व शासकों के परिवार को एक निश्चित राशि मिलती थी.

इंदिरा गांधी इस पूरी प्रक्रिया के खिलाफ थीं. उन्होंने 1969 में संविधान संशोधन के जरिए ये फैसला हटाने की कोशिश की लेकिन बिल पास नहीं हुआ. 1971 में इंदिरा गांधी सरकार बहुमत से संविधान संशोधन कर प्रिवी पर्स हटाने में कामयाब हुईं.

5. बांग्लादेश की आजादी 1971 – 1971 के युद्ध में भारत के हाथों पाकिस्तान की हार को इंदिरा गांधी की बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता था. मार्च 1971 में पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान यानि आज के बांग्लादेश में मौजूद राष्ट्रवादी बंगालियों, समाजवादी नेताओं, छात्रों का कत्लेआम शुरु किया. पाकिस्तानी सेना ने 1970 में हुए आम चुनाव को नकार दिया और पीएम मुजिबुर्र रहमान को गिरफ्तार कर लिया . जब हालात बिगड़े और हजारों-लाखों शरणार्थी भारत आने लगे. भारत ने वैचारिक स्तर पर बांग्लादेश का साथ दिया. लेकिन दिसंबर 1971 में जब पाकिस्तान ने भारत पर हवाई हमले शुरु किए तो इंदिरा गांधी ने तत्कालीन सेना प्रमुख फील्ड मार्शल स्वर्गीय जनरल सैम मानेकशॉ से बातचीत की. भारत युद्ध में शामिल हुआ और 16 दिसंबर 1971 को भारत की मदद से बांग्लादेश आजाद हुआ.

पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने तब इंदिरा गांधी के फैसले की तारीफ की और उन्हें दुर्गा माता का रूप कहा था.

6. 1975 आपातकाल की घोषणा  – भारत के इतिहास में आपातकाल और इंदिरा गांधी का नाम साथ लिया जाता है. दरअसल 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला दिया औऱ 1971 आम चुनाव में इंदिरा गांधी के निर्वाचन को ये कहते हुए गलत बताया कि उन्होंने गलत तरीकों का इस्तेमाल किया था. राज नारायण ने गांधी के खिलाफ अर्जी दी थी. कोर्ट ने इंदिरा गांधी का चयन रद्द कर दिया और 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी. इंदिरा गांधी ने फैसले को चुनौती दी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसला कायम रखा, हालांकि उन्हें पीएम की गद्दी संभालने की अनुमित मिल गई.

गांधी ने फैसला मानने और पीएम की गद्दी छोड़ने से मना कर दिया. जेपी नारायण और मोरारजी देसाई जैसे के नेताओं ने देश भर में प्रदर्शन किया तो कई अहम नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू कर दिया गया. करीब 21 महीनों तक ये जारी रहा.

7. 1977 के आम चुनाव  – 23 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने देश में आम चुनाव का ऐलान करा दिया. उन्हें उम्मीद थी कि जनता उन्हें वापस सत्ता संभालने का मौका देगी. लेकिन ये फैसला उलटा पड़ गया. छठे आम चुनाव में 542 लोकसभा सीटों में से 298 सीटें नई-नवेली जनता पार्टी को मिली, तो कांग्रेस को 197 सीटों के नुकसान के साथ 153 सीट मिलीं.

इंदिरा और संजय गांधी से लोग इतने नाराज थे कि ये दोनों अपनी सीटों से चुनाव हार गए.

8. सत्ता में वापसी – 1978 में इंदिरा गांधी ने चिकमगलूर सीट से लोकसभा उप चुनाव लड़ने का फैसला किया और जीत गईं. तत्कालीन जनता पार्टी में गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह ने इंदिरा के खिलाफ आपातकाल में लिए गए फैसलों के तहत मामले दर्ज करवाए और गिरफ्तारी तय करवाई. धीरे-धीरे जनता पार्टी में भीतरी कलह फैली, इंदिरा गांधी ने इसका पूरा फायदा उठाया और चौधरी चरण सिंह को पीएम बनाने में समर्थन की बात कही.

जुलाई 1979 में चरण सिंह पीएम बने, इंदिरा गांधी ने समर्थन की बात शर्त के साथ कही. उनपर और बेटे संजय पर लगे सभी आरोप वापस लिए गए. इस तरह राजनीति पैठ साबित करते हुए इंदिरा ने सत्ता वापसी का रास्ता बना लिया.

1980 आम चुनाव में इंदिरा गांधी ने जीत के लिए हर जोड़-तोड़ किया. आखिरकार 353 सीटों के भारी बहुमत से इंदिरा गांधी सत्ता में वापस आई.

9. 1984 ऑपरेशन ब्लू स्टार – ये फैसला इंदिरा गांधी की मौत का सबब बना. पंजाब में 1977 विधानसभा चुनाव में अकाली दल की जीत हुई. अकाली दल का पलड़ा कमजोर करने के लिए तब कांग्रेस ने कट्टर सिख जरनैल सिंह भिंडरावाले को राजनीति में आगे बढ़ाया. कुछ साल बाद एक पत्रकार जगत सिंह की हत्या के आरोप में भिंडरावाले की गिरफ्तारी हुई और उसने अपने रिश्ते कांग्रेस से तोड़ लिए. 1982 में भिंडरावाले ने सिखों की बहुसंख्या वाले पंजाब में ज्यादा स्वायत्ता की मांग की. इसके बाद ये मांग हिंसा में बदल गई और पंजाब में आतंकवादी घटनाएं होने लगीं.

1983 में पंजाब पुलिस के DIG और फिर शिरोमणी दल के अध्यक्ष की हत्या का शक भिंडरावाले पर आया. 1984 में भिंडरावाले अपने समर्थकों के साथ 1982 की तरह अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में घुसा. उनके पास हथियार थे. आखिराकर इंदिरा गांधी ने बतौर पीएम सुरक्षा के लिहाज से फैसला लिया और भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर में मौजूद आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन ब्लू स्टार लॉन्च किया. भिंडरावाले की मौत हुई, स्वर्ण मंदिर को उनके कब्जे से छुड़ाया गया. लेकिन इस पूरे काम में स्वर्ण मंदिर को नुकसान पहुंचा.

31 अक्टूबर 1984 को सतवंत सिंह और बेंत सिंह नाम के इंदिरा गांधी के बॉडीगार्ड ने इंदिरा गांधी को गोलियों से भून दिया और उनकी हत्या कर दी.

कई लोग इंदिरा गांधी के फैसलों को गलत बताते हैं, उनकी राजनीती पर सवाल उठाते हैं. लेकिन ऐसा हर किसी के साथ होता है. आप कोई फैसला लेते हैं तो किसी वो पसंद आता है और किसी को नापसंद. लेकिन इंदिरा गांधी के मामले में ये कहना गलत नहीं होगा कि एक नेता के तौर पर वो काफी कड़क फैसले लेती थीं. विरोधी क्या सोचते हैं इसका फर्क उन्हें नहीं पड़ता था.