Home Ehsas लव शायरी : दिल को सुकून देने वाली लव शायरियां पढ़िये

लव शायरी : दिल को सुकून देने वाली लव शायरियां पढ़िये

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अंधेरा है कैसे तिरा ख़त पढ़ूँ
लिफ़ाफ़े में कुछ रौशनी भेज दे

मोहम्मद अल्वी

आदमी जान के खाता है मोहब्बत में फ़रेब
ख़ुद-फ़रेबी ही मोहब्बत का सिला हो जैसे

इक़बाल अज़ीम

आज देखा है तुझ को देर के बअ’द
आज का दिन गुज़र न जाए कहीं

नासिर काज़मी

आख़री हिचकी तिरे ज़ानूँ पे आए
मौत भी मैं शाइराना चाहता हूँ

क़तील शिफ़ाई

आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं

साहिर लुधियानवी

आरज़ू है कि तू यहाँ आए
और फिर उम्र भर न जाए कहीं

नासिर काज़मी

आशिक़ी में बहुत ज़रूरी है
बेवफ़ाई कभी कभी करना

बशीर बद्र

आते आते मिरा नाम सा रह गया
उस के होंटों पे कुछ काँपता रह गया

वसीम बरेलवी

अब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करो
तुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो

मुनव्वर राना

अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम को तुझ से हैं उमीदें
ये आख़िरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ

अहमद फ़राज़

अब तो मिल जाओ हमें तुम कि तुम्हारी ख़ातिर
इतनी दूर आ गए दुनिया से किनारा करते

उबैदुल्लाह अलीम

अभी आए अभी जाते हो जल्दी क्या है दम ले लो
न छोड़ूँगा मैं जैसी चाहे तुम मुझ से क़सम ले लो

अमीर मीनाई

अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ऐ मुतरिब
अभी हयात का माहौल ख़ुश-गवार नहीं

साहिर लुधियानवी

अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा
तुम्हें जिस ने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो

बशीर बद्र

अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैं ने

साहिर लुधियानवी

अहल-ए-हवस तो ख़ैर हवस में हुए ज़लील
वो भी हुए ख़राब, मोहब्बत जिन्हों ने की

अहमद मुश्ताक़

अजीब रात थी कल तुम भी आ के लौट गए
जब आ गए थे तो पल भर ठहर गए होते

बशीर बद्र

अपनी तबाहियों का मुझे कोई ग़म नहीं
तुम ने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी

साहिर लुधियानवी

अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए
अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए

उबैदुल्लाह अलीम

इक खिलौना टूट जाएगा नया मिल जाएगा
मैं नहीं तो कोई तुझ को दूसरा मिल जाएगा

अदीम हाशमी

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है

जिगर मुरादाबादी

इक मोहब्बत ही पे मौक़ूफ़ नहीं है ‘ताबिश’
कुछ बड़े फ़ैसले हो जाते हैं नादानी में

अब्बास ताबिश

इक सफ़र में कोई दो बार नहीं लुट सकता
अब दोबारा तिरी चाहत नहीं की जा सकती

जमाल एहसानी

इधर आ रक़ीब मेरे मैं तुझे गले लगा लूँ
मिरा इश्क़ बे-मज़ा था तिरी दुश्मनी से पहले

कैफ़ भोपाली

इलाही एक ग़म-ए-रोज़गार क्या कम था
कि इश्क़ भेज दिया जान-ए-मुब्तला के लिए

शायरी

हफ़ीज़ जालंधरी

इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से
मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँ नहीं करते

फ़रहत एहसास

इन्हीं पत्थरों पे चल कर अगर आ सको तो आओ
मिरे घर के रास्ते में कोई कहकशाँ नहीं है

मुस्तफ़ा ज़ैदी

इस जुदाई में तुम अंदर से बिखर जाओगे
किसी मा’ज़ूर को देखोगे तो याद आऊँगा

वसी शाह

इस क़दर भी तो न जज़्बात पे क़ाबू रक्खो
थक गए हो तो मिरे काँधे पे बाज़ू रक्खो

इफ़्तिख़ार नसीम

इस तअल्लुक़ में नहीं मुमकिन तलाक़
ये मोहब्बत है कोई शादी नहीं

अनवर शऊर

इश्क़ कर के भी खुल नहीं पाया
तेरा मेरा मुआमला क्या है

अब्बास ताबिश

इश्क़ करता है तो फिर इश्क़ की तौहीन न कर
या तो बेहोश न हो हो तो न फिर होश में आ

आनंद नारायण मुल्ला

इश्क़ के शोले को भड़काओ कि कुछ रात कटे
दिल के अंगारे को दहकाओ कि कुछ रात कटे

मख़दूम मुहिउद्दीन

इश्क़ को एक उम्र चाहिए और
उम्र का कोई ए’तिबार नहीं

जिगर बरेलवी

इश्क़ में कौन बता सकता है
किस ने किस से सच बोला है

अहमद मुश्ताक़

इश्क़ में कुछ नज़र नहीं आया
जिस तरफ़ देखिए अँधेरा है

नूह नारवी

इश्क़ में मौत का नाम है ज़िंदगी
जिस को जीना हो मरना गवारा करे

कलीम आजिज़

इश्क़ फिर इश्क़ है जिस रूप में जिस भेस में हो
इशरत-ए-वस्ल बने या ग़म-ए-हिज्राँ हो जाए

फ़िराक़ गोरखपुरी

इश्क़ तो हर शख़्स करता है ‘शुऊर’
तुम ने अपना हाल ये क्या कर लिया

अनवर शऊर

इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे

बशीर बद्र

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

बशीर बद्र

उन का ग़म उन का तसव्वुर उन के शिकवे अब कहाँ
अब तो ये बातें भी ऐ दिल हो गईं आई गई

साहिर लुधियानवी

उन का ज़िक्र उन की तमन्ना उन की याद
वक़्त कितना क़ीमती है आज कल

शकील बदायुनी

उन को भूले हुए अपने ही सितम याद आए
जब किसी ग़ैर ने तड़पाया तो हम याद आए

अज्ञात

उन से हम लौ लगाए बैठे हैं
आग दिल में दबाए बैठे हैं

अनवर देहलवी

उन्हें अपने दिल की ख़बरें मिरे दिल से मिल रही हैं
मैं जो उन से रूठ जाऊँ तो पयाम तक न पहुँचे

शकील बदायुनी

उन्हीं रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे
मुझे रोक रोक पूछा तिरा हम-सफ़र कहाँ है

बशीर बद्र

उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से
तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिए बनाया है

बशीर बद्र

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