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नवरात्र में मां के मंदिर बिना चप्पल-जूता पहने जाते हैं, जानिये इसका वैज्ञानिक पक्ष

10 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक नवरात्र है नवरात्र में लोग मां दुर्गा कि आराधना करते है. नवरात्र में लोग देवी मां की अपने – अपने तरीके से आराधना करते हैं. जहां लोग उपवास मे केवल जल पीकर रहते हैं तो कुछ लोग फलाहार उपवास रहते हैं.

कुछ लोग केवल नवरात्र के पहले और अंतिम दिन में ही उपवास रखते हैं. मांस और शराब खाने पीने वाले लोग भी इन नौ दिनों में इन चीजों को नहीं ग्रहण करते हैं. बहुत  लोग तो नवरात्रों में जूते चप्पल तक नहीं पहनते हैं. इसके पीछे आस्था का भाव तो है ही लेकिन वैज्ञानिक पक्ष भी है.

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नवरात्र से पहले बरसात का मौसम समाप्त हो जाता है. शरद ऋतु प्रारम्भ हो जाती है. शरद ऋतु में ना ज्यादा गर्मी होती है और ना सर्दी. इस मौसम में लोग विटामिन डी सूर्य के किरणों से सबसे ज्यादा प्राप्त करते है.

इस मौसम में धरती हल्की गर्म होती है और नंगे पैर चलने से इसकी गर्मी शरीर को आसानी से दे सकते हैं. बरसात के मौसम में शीत और कफ कि समस्या होने कि अधिक आशंका होती है लेकिन इस मौसम में पैरों के जरिये गर्मी अच्छे से शरीर के तापमान को सामान्य करती है और शरीर कि ठंडक को कमकर उष्मा बढाती है.

नंगे पैर चलने से पैरों के माध्यम से एक्यूप्रेशर थैरेपी होती है. नंगे पैर चलने से पैरों के पंजों पर दबाव पडता है, जिससे उनमें खून का प्रवाह तेज हो जाता है जो रक्त के छिद्र बंद होते है वह खुल जाते है.

शरीर के सारे अंग हमारे हाथ और पैरों के पंजों से जुडे होते हैं. इन्हे एक्यूप्रेशर प्वाइंटस कहा जाता है. जिन पर दबाव पडने से शरीर के सारे अंगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. नौ दिन लगातार नगें पैर रहने से सम्पूर्ण एक्यूप्रेशर थैरेपी शरीर को मिल जाती है जिससे शरीर लंबे समय तक स्वस्थय रहता है.