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मात्र 23 वर्ष में सब कुछ त्याग क्यों साध्वी बनीं SIMRAN JAIN

इंसान भोग विलास के जीवन को त्यागकर अध्यात्मिक जीवन अपनाकर वैरागी हो जाता है. ऐसे में उसके बारे में जानने की जिज्ञासा हो जाती है. हरियाणा के पानीपत की मुमुक्षु SIMRAN JAIN उन्हीं में से एक हैं. उन्होंने संन्यास दीक्षा लिया और साध्वी बन गईं.

23 बरस की सिमरन जैन ने जीवन को भोगने के दिनों में वानप्रस्थ जीवन अपना लिया. जिस उम्र में आकर्षण स्वाभाविक रुप से हो जाता है. उस उम्र में सिर्फ वैरागी बनने का ये गंभीर फैसला. आइए बताते हैं आपको सिमरन ने कैसे किया होगा संसार को सिरे से छोड़ देने का फैसला सिर्फ घर नहीं, केवल रिश्ते नहीं. ये चंद किलोमीटर का फासला नहीं था. सिमरन बढ़ते कदमों के साथ जो फासला तय कर रही हैं वो कोई मामूली दूरी भी नहीं है.

SIMRAN JAIN SADHVI
VAIRAGI

वो जानती है कि उसके ये कदम संसार से वैराग्य का फासला तय कर जाएंगे. उस दुनिया में ले जाएंगे जहां आसक्ति के लिए मोह के लिए, कोई जगह नहीं, जहां जीवन जल की तरह पारदर्शी है और मोम की तरह उसे अब अपने शरीर को साधना में तपाना है. दुनियावी चकाचौंध, एशोआराम, घर नाते रिश्ते सब एक लम्हें में छोड़ना है.

बीएससी कम्प्यूटर्स सिमरन का नाम अब साध्वी गौतमी श्री. दीक्षा के साथ बदल गया है. सिमरन ने पूरा जीवन जिन हाथों से कॉपी किताबें, संभाली थी. उन हाथों में अब पिच्छिका है और जिस्म पर रंगीन लिबास नहीं सफेद कपड़ा है.

बास्केटबॉल एरिना परिसर में सोमवार को श्री वर्धमान श्वेतांबर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ट्रस्ट के तत्वावधान में जैन भगवती दीक्षा महोत्सव आयोजित हुआ.

SIMRAN JAIN

 

दीक्षा से पहले मुमुक्षु सिमरन ने कहा, “दुनिया देखी और शिक्षा ग्रहण की लेकिन मुझे संतों का सान्निाध्य और दीक्षा का मार्ग ही रास आया. सांसारिक बुआ डॉ. मुक्ताश्री की राह पर ही आत्मिक सुकून और परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है, इसलिए वैराग्य धारण कर रही हूं.”

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