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उर्दू के मशहूर शायर मिर्जा गालिब की आज है पुण्य तिथि, जानें उनके बारे कुछ बातें

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

अपने दिल के अहसास को बयां करने का एक बेहद की आसान तरीका है शायरी. अपनी मोहब्बत को बयां करने का एक आसान तरीका है शायरी. यहां तक की अपने गम को भी बयां करने का आसान तरीका है शायरी. लेकिन ये शेरो-शायरी इतनी भी आसान नहीं. इसके लिए शायर को अपनी भावनाओं की सीमा तक पहुंचना होता है और सोच के उस सागर की गहराइयों को नापना पड़ता हैं, जहां से ये खूबसूरत अल्फाज निकलते हैं. आज ऐसे ही एक मशहूर शायर मिर्जा गालिब की पुण्य तिथि है.

मिर्जा गालिब
Image: Free Press Journal

तो आइए जानते हैं मिर्जा गालिब के बारे में कुछ रोचक बातें…

1. मिर्जा गालिब का पूरा नाम मिर्जा असल-उल्लाह बेग खां था. उनका जन्म 27 दिसंबर 1797 को हुआ था.

2. जब उनका जन्म हुआ उस समय भारत में मुगल शासक बहादुर शाह की हुकूमत थी और उनका जन्म आगरा के एक सैन्य परिवार में हुआ.

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

3. उनके परिवार ने उनकी शिक्षा के लिए उनको फारसी, उर्दू और अरबी भाषा सिखाई. उनके दादा मिर्जा कोबान बेग खान अहमद शाह के शासन काल में समरकंद से भारत आए थे.

4. भारत आने के बाद ही उनका परिवार पहले दिल्ली फिर लाहौर, जयपुर में काम करता था, लेकिन अंत में वो आगरा में जाकर बस गए.

Image: BGR

5. जानकारी के अनुसार जब गालिब 11 साल की उम्र के थे, तभी से उन्होंने उर्दू एवं फारसी में गद्य और पद्य की रचना करना शुरू कर दिया था. शायद इसी वजह से मिर्जा गालिब को उर्दू भाषा का सर्वकालिक महान शायर कहा जाता है.

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

6. कई इतिहासकारों के अनुसार गालिब के पिता की मौत तब ही हो गई थी, जब वो काफी कम उम्र के थे. इसके बाद उनके पालन-पोषण उनके चाचा ने किया, लेकिन वो भी जल्द ही मृत्यु को प्राप्त हो गए.

7. चाचा की मौत के बाद गालिब की परवरिश उनके नाना-नानी ने की और जब वो 13 साल के थे तभी उनका निकाह पढ़ा दिया गया. उनकी पत्नी का नाम उमराव बेगम था.

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Image: Siasat

8. मिर्जा गालिब को भारत और पाकिस्तान में एक बहुत ही अहम शायर के तौर पर जाना जाता है. उन्हें दबीर-उल-मुल्क और नज्म-उद-दौला का खिताब मिला है.

9. गालिब (और असद) नाम से लिखने वाले मिर्जा मुगल काल के आखिरी शासक बहादुर शाह जफर के दरबारी कवि भी रहे थे. इतिहासकारों की मानें तो 15 फरवरी 1869 को गालिब ने दुनिया रुख्सती ले ली.

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