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दो भारत बंद : आंदोलन या सिर्फ उन्माद की पराकाष्ठा

2 अप्रैल के दिन फिर से वो दिन आया जब आंदोलन के नाम पर लोगों को परेशान किया गया. कहीं किसी एंबुलेंस में पड़ा बीमार बच्चा हक मांगने वाली भीड़ की चपेट में आकर दुनिया छोड़ गया तो कहीं एक आम दुकानदार रोज की तरह अपनी एक छोटी सी दुकान न खोल पाया. और जो खोल पाया उसने अपना शायद हजारों का सामान इस हंसी और लालच भरी गुस्सा दिखाती भीड़ के सामने टूटते-फूटते देखा.

पहला भारत बंद-

कुछ ने कहा कि ये सुप्रीम कोर्ट द्वारा किये जा रहे एससी/एसटी एक्ट में बदलाव को एक षड्यंत्र की तरह देखते हैं. इसके खत्म हो जाने के बाद देश में दलित वर्ग पर अत्याचार और बढ़ जायेगा. इसलिये उन्होंने ये आंदोलन किया है.

भारत बंद
भारत बंद

लेकिन इस भीड़ में शामिल ज्यादातर लोगों को ये बात पता भी थी? इस बात पर गौर फरमाना जरूरी है क्योंकि कुछ लोग तो इस भीड़ का हिस्सा इसलिये बन बैठे क्योंकि उन्होंने उस अफवाह पर विश्वास कर लिया है जिसमें कहा गया था कि देश में उन्हें मिलने वाला आरक्षण खत्म किया जा रहा है.

नतीजा आपके सामने है. लोग परेशान हुये, मरे और अपने रोजगार का नुकसान करा बैठे. पर ये सब नतीजे तो गौण हो गये. प्रमुखता तो इस बात को दी गयी कि सरकार ने फिर से इस मसले पर रिव्यू करने के लिये एक पेटीशन दायर कर दी. और सभी पार्टीज अपने-अपने हिसाब से इस खास वर्ग पर केंद्रित हो गयीं. सबने एक स्वर में दलित समाज के हित की बात की(समझने वाली बात ये है कि सिर्फ बात की). भीड़ शांत हो गयी.

लेकिन इस भीड़ के इस आंदोलन से फायदा किसका हुआ? यहां पर ये भी सोचने वाला विषय है. फायदा हुआ उस भीड़ का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ ही लोगों का. क्योंकि उन्हें अपने समुदाय के बीच पहचान बनाने का मौका मिल गया. फायदा हुआ कुछ फेसबुक में प्रो दलित ज्ञान परोसने वालों का.

भारत बंद
Courtesy-Nedrick News

दूसरा भारत बंद-

बात अभी यहीं पर आकर नहीं रुकी. जहां 2 अप्रैल का भारत बंद एक संगठित तरीके से किया गया. तो वहीं 10 अप्रैल का भारत बंद भी हुआ लेकिन असंगठित तरीके से. या यूं कहें कि इंटेलीजेंस और पुलिस पिछले भारत बंद का बुरा स्वरूप देखकर ज्यादा सख्त हो गयी इसलिये असंगठित रह गया. लेकिन हुआ इस बार भी.

ये सवर्णों और पिछड़ों द्वारा किया गया भारत बंद था. नतीजे उतने बुरे नहीं हुये( 2 अप्रैल के भारत बंद से तुलना करने पर). लेकिन बिहार और कुछ और जगहों में भी तोड-फोड़ हुयी. कुल मिलाकर बात ये है कि इस भारत बंद के दौरान भी लोग परेशान हुये. लेकिन क्या इस भारत बंद में शामिल हुयी भीड़ को भी कुछ फायदा हुआ? नहीं. क्योंकि यहां पर भी वही कहानी फिर से दोहराती हुयी नज़र आयी. इस भारत बंद में भी इस भीड़ का प्रतिनिधित्व करने वालों का ही फायदा हुआ.

लेकिन नुकसान की बात करें तो आम जनता हर बार की तरह पीसी गयी. माना कि 2 अप्रैल वाले भारत बंद से दलितों के हित की बात पर हर एक पार्टी एकसुर नज़र आयी. और देश के 20 प्रतिशत दलित वोटर का खौफ उनके भाषणों में दिखा.

कुछ सवाल उभरे –

लेकिन यहां पर कुछ सवाल उभर कर सामने आये जो इस प्रकार हैं- क्या वो भीड़ जो दलित हितों की बात करते हुये या फिर वो भीड़ जो सवर्णों और पिछड़ों के हितों की बात करते हुये नुकसान करती हुयी नज़र आयी, उन्हें इस आंदोलन में आंदोलन जैसा कुछ लगा? मेरी नज़र में तो ये एक उन्माद था. दूसरा सवाल ये कि क्या देश का प्रशासन और इंटेलिजेंस इतना सुस्त हो गया है कि वो ऐसी घटनाओं को होने दे?

तीसरा सवाल ये कि क्या कोई आंदोलन (मैने सिर्फ आंदोलन की बात की है, किसी उन्माद की नहीं क्योंकि आंदोलन शब्द अपने आप में व्यापक है) आसिफा और कुलदीप सिंह सेंगर वाले मुद्दों पर भी होगा?

सवाल और भी बहुत सारे हैं. जो यहीं से निकलेंगे. और आपको पता भी हैं.

 

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