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मशहूर शायर निदा फाजली ने क्यों लिखी दुख भरी खूबसूरत नज्में.

‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता,
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता.’

आपने शायद इन लाइनों को सुना होगा. ये गजल के बोल मशहूर शायर निदा फाजली के द्वारा लिखे गए थे. सिर्फ यही नहीं निदा फाजली ने कई खूबसूरत गजल, शेर और शायरी लिखी हैं, जिनको आज भी लोग बेहद पसंद करते हैं. निदा फाजली को आसान भाषा में लिखेी शायरियों के लिए खास तौर पर याद किया जाएगा. निदा फाजली का असली नाम मुक्तदा हसन था. उनकी लिखी गजलों को जगजीत सिंह की आवाज ने लाखों-लाख लोगों तक पहुंचाया.

निदा फाजली
Image: Indian Express
तो आइए जानते हैं निदा फाजली के बारे में कुछ बातें…

1. निदा का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली के कश्मीरी परिवार में हुआ था. उन्होंने ग्वालियर में रहकर स्कूल की पढ़ाई की और ग्वालियर के ही विक्टोरिया कॉलेज से स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई भी पूरी की.

‘अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला
हम ने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला’ – निदा फाजली

2. उन्होंने छोटी उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था. इनके नाम में निदा का अर्थ है स्वर यानी आवाज और फाजली कश्मीर के एक इलाके का नाम है, जहां से निदा के पुरखे आकर दिल्ली में बस गए थे, इसलिए उन्होंने अपने उपनाम में फाजली जोड़ा.

3. जब वह पढ़ते थे तो उनके सामने की लाइन में एक लड़की बैठती थी, वो उससे एक अनजाना, अनबोला रिश्ता महसूस करते थे. लेकिन एक दिन जब वो कॉलेज आए तो उन्हें पता चला कि उस लड़की का एक्सीडेंट हो गया और मौत हो गई. वो बेहद दुखी हुए, लेकिन उन्होंने पाया कि जो कुछ भी अब तक लिखा है वो उनके दर्द को व्यक्त नहीं कर सकता, जिसके बाद वो ऐसा लिखने की कोशिश करते थे, कि उनका दुख बाहर आ सके.

‘अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं’

4. हिन्दू-मुस्लिम कौमी दंगों से परेशान होकर उनके माता-पिता पाकिस्तान में जाकर बस गए, लेकिन निदा नहीं गए. उस समय बम्बई हिन्दी/ उर्दू साहित्य का केन्द्र था और यहां कई लोकप्रिय और सम्मानित पत्रिकाएं छपती थीं. इस लिए साल 1964 में निदा काम की तलाश में यहां आ गए और धर्मयुग, Blitz जैसी पत्रिकाओं, समाचार पत्रों के लिए लिखने लगे.

5. बॉलीवुड में लिखने का पहला मौका उन्हें जांनिसार अख्तर के कारण मिला, जो खुद भी ग्वालियर के रहनेवाले थे. दरअसल कमाल अमरोही की फिल्म रजिया सुल्तान, जिसमें हेमामालिनी और धर्मेंद्र ने प्रमुख किरदार निभाया था, उसके लिए गीत लिखने का काम जांनिसार अख्तर ही कर रहे थे. जांनिसार अख्तर निदा फाजली के उर्दू लेखन से काफी प्रभावित थे, और उन्होंने कमाल अमरोही को भी इस बारे में बताया हुआ था.

‘एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा’

6. निदा फाजली ने अपने जीवन में कई रचनाएं लिखीं जिनमें गीत, दोहे, कविता, शायरी, नज्म, गजल, आत्मकथा, संस्मरण आदि शामिल हैं. फिल्मी दुनिया की जानी पहचानी फिल्मों के लिए उन्होंने काम किया, जिनमें रजिया सुल्तान के अलावा तमन्ना, इस रात की सुबह नहीं, हरजाई, नाखुदा, आप तो ऐसे नहीं थे, यात्रा, सरफरोश, और सुर जैसी फिल्में शामिल हैं.

7. निदा को साहित्य अकादमी पुरस्कार, नेशनल हारमनी अवॉर्ड फॉर राइटिंग ऑन कम्युनल हारमनी, स्टार स्क्रीन पुरस्कार, बॉलीवुड मूवी पुरस्कार, म.प्र. सरकार द्वारा मीर तकी मीर पुरस्कार, खुसरो पुरस्कार, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी का श्रेष्ठतम कवि‍ता पुरस्कार, बिहार उर्दू पुरस्कार, उ.प्र. उर्दू अकादमी पुरस्कार, हिन्दी उर्दू संगम पुरस्कार, मारवाड़ कला संगम, पंजाब एसोसिएशन, कला संगम के साथ-साथ 2013 में पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था.

‘इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी
रात जंगल में कोई शम्अ जलाने से रही’

8. इस बेहतरीन शायर की 8 फरवरी 2016 को मुम्बई में मौत हो गई.

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