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जानिए घड़ी की सुइयों के घूमने के कहानी, एक ही दीशा में क्यों घूमती है घड़ी की सुइयां ?

क्यों घड़ी की सुईयां हमेशा पश्चिम से पूरब की ओर घूमती है ?

समय किसी के लिए नहीं रुकता, ये बात सभी को पता है. सभी लोग हर काम समय के हिसाब से ही करते हैं. सभी लोग घड़ी भी देखते हैं, पर शायद ही किसी को पता हो कि घड़ी एक ही तरफ क्यों घूमती है? आखिर घड़ी की सुईयों का पश्चिम से पूरब की तरफ घूमने का राज क्या है? अगर नहीं जानते, तो आपको बताते हैं आखिर क्यों घड़ी की सुईयां पश्चिम से पूरब की और घूमती है.

1. समय की पहचान सालों पहले प्रहर के हिसाब से भारत भूमि में समय का पता लगता था. प्राचीन भारत में भी दिन को 8 प्रहर में गिनते थे. दिन-रात मिलाकर 24 घंटे में हिंदू धर्म के अनुसार आठ प्रहर होते हैं. औसतन एक प्रहर तीन घंटे का होता है जिसमें दो मुहूर्त होते हैं.

 

Clock

2. एक प्रहर तीन घंटे या साढ़े सात घंटे का होता है. एक घंटा24 मिनट का होता है. दिन के चार और रात के चार मिलाकर कुल आठ प्रहर. ये समय सूर्य की रोशनी और चांद की चाल पर निर्धारित था. आज भी उजले और अंधेरे पक्ष(पाख) के बारे में हम सभी जानते हैं. समय की ये गणना तो भारतीय हुई, जिसमें हमें किसी घड़ी की जरूरत ही नहीं थी. और फिर जब जरूरत पड़ी भी तो हमारे यहां सौर घड़ी आ गई.

3. सौर घड़ी के अलावा हमारे यहां चंद्रमा की चाल के हिसाब से भी समय देखा गया. अगर उजाले पक्ष की चौथ है, तो सूर्य ग्रहण के बाद चौथे घंटे में चांद दिखता था अष्टमी है तो पूरे 8 घंटे बाद. और एक बात, घंटों की गणना भी भारत की ही देन है, इसीलिए चंद्र पंचांगों की गणना सौर पंचांग से सटीक मानी जाती थी. खैर, सौर-चंद्र के बाद हम घड़ियों की दिशा की बात करते हैं.

clock made of metal

4. वैज्ञानिकों का मानना है कि प्राचीन समय में लोगों ने उत्तरी गोलार्ध में रहते हुए समय का अंदाजा लगाना शुरु किया था इसीलिए यह सारा सिस्टम क्लॉक वाइस बना. अगर वह लोग दक्षिणी गोलार्ध में रहते तो शायद यह चीज कुछ और होती और यही कारण है कि घड़ी की सुइयां भी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है.

5. बहरहाल, भारत देश में ज्योतिष का स्तर और समयानुमान काफी सटीकता से लगाया जाता था. इसकी वजह भारत की जलवायु भी है.भारत में मौसम समान समय में बदल जाते हैं. एक अंदाजे के मुताबिक तय समय पर सूर्य उत्तरायण और दक्षिणायन में कूच करता है तो भारत में मौसम की जानकारी मिलती जाती थी. फिर हमारे सहस्त्राब्दियों पुराने ग्रंथों में भी सूर्य की गति और दिशाओं में परिवर्तन की जानकारियां दी ही गई हैं.

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