Omicron : Corona का ये वैरिएंट हो सकता है चिन्ता का अंतिम वैरिएंट, जानिए कारण

ओमिक्राॅन वैरिएंट ने एक बार फिर से कोरोना वायरस को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी है. कोरोना के अब तक सभी वैरिएंट में ये सबसे तेजी से फैलने वाला वैरिएंट है. पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत अभी कोरोना के सबसे भयानक प्रकोप और दूसरे लहर से उबरने की कोशिश ही कर रहा था कि इस वैरिएंट ने भारत में अपना कदम रख दिया.

हालाँकि अभी तक इसके लगभग 200 मामले ही मिले हैं. इसमें से 123 ही एक्टिव यानी 77 मरीजों को ठीक करके डिस्चार्ज कर दिया गया है. अब तक कोरोना के इतने वैरिएंट सामने आ चुके हैं कि इनमें से ज्यादातर के नाम हमें मालूम भी नहीं है. इस स्थिति से एक सवाल सामने निकल कर आ रहा है कि क्या कोरोना कभी खत्म भी होगा या नहीं?

इस सवाल का जवाब कुछ वैज्ञानिकों ने देने की कोशिश की है. उनका कहना है कि भविष्य में शायद कोरोना कभी न खत्म हो लेकिन ओमिक्राॅन चिन्ता करने का आखिरी वैरिएंट हो सकता है.  

किसी वायरस के तेजी से फैलने का कारण

वायरस भी जीवित होते हैं, वैज्ञानिक समुदाय में इस बात पर अभी तक विवाद है. लेकिन एक बात साफ है कि अन्य चीजों की ही तरह वे भी विकसित होते हैं. कोरोना महामारी ने तो इस तथ्य को पूरी तरह से साबित भी किया है. क्योंकि हर कुछ महीनों में कोरोना वायरस ने एक नए वैरिएंट के रूप में सामने आया.

इनमें से कुछ वैरिएंट ऐसे भी थे जो पर्सन टु पर्सन फैल सकते थे. इससे वे Covid-19 के SARS-CoV-2 के धीमे फैलने वाले वैरिएंट के मुकाबले अधिक प्रभावी और घातक वैरिएंट साबित हुए. वैज्ञानिकों ने इसका मुख्य कारण इनमें पाया जाने वाला स्पाइक प्रोटीन को बताया. स्पाइक प्रोटीन मशरूम के आकार का होता है, जो ACE2 रिसेप्सटर्स को मजबूती प्रदान करता है.

ACE2 रिसेप्टर्स हमारी कोशिकाओं की सतह पर होते हैं, जिनके जरिए वायरस हमारे शरीर में प्रवेश करता है. इन्हीं की मदद से वायरस हमारे शरीर में तेजी से म्युटेट करता है.

यही कारण है पहले अल्फा और बाद में डेल्टा वैरिएंट ने तेजी से अपना म्युटेशन किया और विश्व स्तर पर सबसे प्रभावी वैरिएंट में से रहे. वैज्ञानिकों को उम्मीद कर रहें हैं कि ओमिक्राॅन वैरिएंट के साथ भी कुछ ऐसा ही होगा.

कब एक वायरस अपने चरम पर होता है?

हालाँकि, वायरस कभी भी अनिश्चित समय के लिए अपना विकास नहीं कर सकता. जैव रसायन के नियमों के अनुसार, SARS-CoV-2 भी अंततः एक ऐसा स्पाइक प्रोटीन विकसित करेगा जो ACE2 रिसेप्टर्स के साथ हमेशा के लिए मजबूती से बंध जाएगा.

उस समय तक इसके फैलने की संभावना इस बात तक सीमित नहीं होगी कि वो ACE2 रिसेप्टर्स के सहारे कोशिकाओं से कितनी मजबूती से चिपकता है. कुछ दूसरे फैक्टर SARS-CoV-2 के प्रसार को सीमित कर देंगे.

जैसे कि यह कितनी तेजी से जीनोम की काॅपी कर सकता है, कितनी जल्दी वायरस प्रोटीन TMPRSS2 के माध्यम से कोशिका में प्रवेश कर सकता है, और इससे संक्रमित व्यक्ति इस वायरस को कितना झेल सकता है. जब ये सारे फैक्टर SARS-CoV-2 के ऊपर काम करने लगेंगे तब माना जाएगा ये वायरस अपने चरम पर है.

क्या ओमिक्राॅन अपने चरम पर पहुँच गया है?

ओमिक्राॅन के चरम पर होने का अभी तक पर्याप्त सबूत नहीं है. “गेन-ऑफ-फंक्शन” SARS-CoV-2 को आसानी से फैलने के लिए आवश्यक म्युटेशन की पहचान करता है. इस अध्ययन ने बहुत से म्युटेशन की पहचान की है, जिससे पता चला है कि ओमिक्राॅन में अभी तक ऐसी स्पाइक प्रोटीन नहीं पाई गई है, जो वायरस को मानव कोशिकाओं से बांधने की क्षमता में सुधार करता है. इसके अलावा, वायरस जीवन चक्र में जीनोम रेप्लिकेशन जैसे सुधारअभी भी हो सकते हैं.

कैसे काम करता है इम्यून सिस्टम और एंटीबाॅडी?

किसी भी वायरस से संक्रमण के बाद इम्यून सिस्टम एंटीबाॅडी बनाता है. ये एंटीबाॅडी वायरस से चिपककर वायरस और T-Cells को बेअसर कर देती है. बता दें कि ये T-Cells संक्रमित कोशिकाओं को नष्ट करते हैं.

एंटीबॉडी प्रोटीन के टुकड़े होते हैं जो वायरस के विशेष और मॉलिक्यूलर आकार से चिपके रहते हैं. किलर T-Cells संक्रमित कोशिकाओं को इन्ही मॉलिक्यूलर आकार के माध्यम से पहचानती हैं. इसलिए SARS-CoV-2 म्युटेशन करके हमारे इम्यून सिस्टम से बच सकता है. इस कारण हमारा इम्यून सिस्टम इस वायरस को पहचान नहीं पाता.

यही कारण है कि ओमिक्रॉन संक्रमण या वैक्सीन के जरिए विकसीत एंटीबाॅडी से बच निकलने और तेजी से लोगों को संक्रमित करने में सफल रहा है. जो म्युटेशन स्पाइक को ACE2 के साथ मजबूती से बाँधे रखने में मदद करते हैं, वही म्युटेशन वायरस को बेअसर करने वाली एंटीबाॅडी की क्षमता को भी कम करते हैं.

फाइजर के डेटा से पता चलता है कि T-Cells को को ओमिक्रॉन पर भी उसी तरह से काम करना चाहिए जैसा वे पिछले वैरिएंट पर करती रही हैं. दक्षिण अफ्रीका में ओमिक्रॉन की मृत्यु दर कम है क्योंकि वहां ज़्यादातर लोगों में इम्यूनिटी विकसीत हो चुकी है.

हमारे लिए सबसे अच्छी बात यह है कि इस वायरस के चपेट में आ जाने कारण यह हमें गंभीर बीमारी और मृत्यु के खतरों से बचाने में सक्षम है. हम फिर से इस वायरस से संक्रमित हो सकते हैं लेकिन गंभीर रूप से बीमार होने की संभावना बहुत कम है.

इस वायरस का भविष्य

हालाँकि यह वायरस अभी तक कई वैरिएंट के रूप में हमार सामने आ चुका है लेकिन ये कोई चिन्ता की बात नहीं है. भविष्य में हमारा इम्यून सिस्टम इस वायरस को आसानी से नियंत्रित करने में सक्षम होगा. जो म्युटेशन अपने फैलने की क्षमता को विकसीत करने में सक्षम होते है, उनसे मौत होने सम्भावनाएँ नहीं रहती हैं.

आती रहेंगी नई लहरें

समय के साथ यह वायरस नए वैरिएंट के रूप में अपना म्युटेशन जारी रखेगा. ये हमारे इम्यून सिस्टम से बचने के लिए भी अपना विकास करता रहेगा. इससे भविष्य में इसकी नई लहरें देखने को मिल सकती है. सर्दियों में हमें फ्लू की तरह ही कोविड का भी सीजन देखने को मिल सकता है.

जरूरी नहीं है कि हर साल होने वाले नए फ्लू वायरस, पिछले साल से बेहतर ही हों, वो अलग ज़रूर हो सकते हैं. 229E वायरस के कारण होने वाला सामान्य सर्दी SARS-CoV-2 के इस घटनाक्रम के लिए सबसे उचित उदाहरण है.

इसलिए कहा जा सकता है कि ओमिक्राॅन कोरोना वायरस का अंतिम संस्करण नहीं होगा, लेकिन इस वायरस के चिंता का अंतिम रूप जरूर हो सकता है. अगर हम भाग्यशाली रहें तो SARS-CoV-2 संभवतः एक स्थानिक वायरस बन जाएगा जो समय के साथ धीरे-धीरे म्यूटेट होता है.

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