तालिबान का सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादर कौन है जिसके हाथों होगी अफगानिस्तान की सत्ता

पिछली बार साल 1996 में तालिबान (Taliban) ने जब अफगानिस्तान (Afghanistan) पर कब्जा किया तब उसके सामने यह सवाल नहीं था कि किस प्रकार की सरकार का गठन करे और कौन देश पर शासन करेगा. तब दो साल पहले से ही तालिबान (Taliban) का नेतृत्व कर रहे मौलवी मुल्ला मोहम्मद उमर ने कार्यभार संभाला था.

हालांकि आज परिस्थितियां पहले से अलग हैं. साल 2016 में अफगान-पाकिस्तान सीमा पर अमेरिकी ड्रोन हमले में अख्तर मंसूर के मारे जाने के बाद 60 वर्षीय इस्लामिक धार्मिक नेता हैबतुल्ला अखुंदजादा देश के सर्वोच्च नेता बनेंगे. तालिबान के सूत्रों ने पुष्टि की है कि नई अफगान सरकार का नेतृत्व मुल्ला अब्दुल गनी बरादर (Mullah Abdul Ghani Baradar) करेंगे.

तालिबान (Taliban) के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर रॉयटर्स को बताया कि सभी बड़े नेता काबुल पहुंच गए हैं. जहां नई सरकार की जल्द घोषणा की जा सकती है.

तालिबान का सह-संस्थापक है मुल्ला अब्दुल गनी बरादर

मुल्ला अब्दुल गनी बरादर तालिबान (Taliban) के राजनीतिक कार्यालय का प्रमुख और संगठन का सह-संस्थापक भी है, तालिबान (Taliban) के संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे मुल्ला मोहम्मद याकूब और शेर मोहम्मद अब्बास स्टेनकजई को तालिबान (Taliban) की नई सरकार में बड़ा पद मिल सकता है.

मुल्ला बरादर का संबंध पोपलजई पश्तून जनजाति से है. बरादर को मुल्ला मुहम्मद उमर के साथ तालिबान के सह-संस्थापक के रूप में जाना जाता है. वर्तमान में वह राजनीतिक कार्यालय का प्रमुख है.

मुल्ला अब्दुल गनी बरादर का जन्म साल 1968 में दक्षिणी अफगानिस्तान के उरुजगन प्रांत में एक प्रभावशाली पश्तून जनजाति में हुआ था. मुल्ला बरादर ने सोवियत संघ के खिलाफ मुजाहिदीन गुरिल्लाओं के साथ लड़ाई लड़ी. साल 1989 में सोवियत संघ के पीछे हटने के बाद देश में गृह युद्ध शुरू हो गया. इस दौरान बरादर ने पूर्व कमांडर और अपने बहनोई, मोहम्मद उमर के साथ कंधार में एक मदरसा स्थापित किया. साथ ही दो मुल्लाओं ने तालिबान की स्थापना की जो युवाओं का नेतृत्व कर रहा था.

Mullah Abdul Ghani Baradar
Source- Hindustan Times

तालिबान शासन मेंं मिला था अहम पद

तालिबान के अपने 5 साल के शासन के दौरान और अमेरिकी-अफगान सैन्य बलों द्वारा सत्ता से बेदखल होने से पहले मुल्ला अब्दुल गनी बरादर उप रक्षा मंत्री सहित कई अन्य प्रमुख पदों पर रहा.

साल 2001 में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया तब मुल्ला अब्दुल गनी बरादर पाकिस्तान चला गया. साल 2010 में उसे पाकिस्तान के कराची से गिरफ्तार किया गया. मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने आठ साल कैद में बिताए. साल 2018 में जब अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने तालिबान से बातचीत करनी शुरू की तब मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को रिहा कर दिया गया. तालिबान ने अमेरिका के साथ दोहा समझौते पर हस्ताक्षर किया जिसके अनुसार अमेरिका अपने सैनिकों को वापस बुला लेगा और तालिबान अल-कायदा को पनाह नहीं देगा.

15 अगस्त को काबुल पर कब्जा करने के बाद मुल्ला अब्दुल गनी बरादर ने कहा कि उसे उम्मीद नहीं थी कि अफगानिस्तान में तालिबान की जीत होगी. काले रंग की पगड़ी पहने हुए बरादर ने कैमरे के सामने कहा,

“अब परीक्षा आती है, हमें अपने राष्ट्र की सेवा और सुरक्षा की चुनौती का सामना करना चाहिए और इसे आगे बढ़ते हुए एक स्थिर जीवन देना चाहिए.”

मुल्ला अब्दुल गनी बरादर

क्यों अहम हो जाती है पाकिस्तान की भूमिका

तालिबान अब अफगानिस्तान की सत्ता संभालने के लिए तैयार है. जब पाकिस्तान की बात आती है तो यह अभी तय नहीं है कि तालिबान की रणनीति क्या होगी हालांकि यह स्पष्ट है कि नई सरकार पाकिस्तान की सेना और आईएसआई से अधिक स्वतंत्र होगी.

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