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Ghalib Special : ‘कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और…’

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे,

कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और.

ऊर्दू – फ़ारसी के सबसे महान शायर मिर्ज़ा असदउल्ला बेग ख़ान ‘ग़ालिब’ हैं. ग़ालिब के लिखे ख़त, जो उस समय प्रकाशित नहीं हुए थे,  उन्हें उर्दू लेखन का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है. ग़ालिब न भारत और पाकिस्तान के सबसे लोकप्रिय शायर हैं. उन्हें दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का ख़िताब मिला.

ये ग़ालिब की बदकिस्मती ही रही कि वो आजीवन क़र्ज़ में डूबे रहे, लेकिन इन्होंने अपनी शानो-शौक़त में कभी कमी नहीं आने दी. यूं तो ग़ालिब के 7 बच्चे हुए लेकिन कोई भी जीवित नहीं रहा.

जिस पेंशन के सहारे इन्हें व इनके घर को एक सहारा प्राप्त था, वह भी बन्द कर दी गई थी. ग़ालिब नवाबी ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे और मुग़ल दरबार में ऊंचे ओहदे पर थे. ग़ालिब (असद) नाम से लिखने वाले मिर्ज़ा मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे.

ग़ालिब शिया मुसलमान थे. जो आदमी एक बार इनसे मिलता था, उसे सदा इनसे मिलने की इच्छा बनी रहती थी.

जन्म –

27 दिसंबर साल 1797 को आगरा में अब्दुल्लाह बेग के घर एक लड़का पैदा हुआ, जो बाद में असदुल्लाह, नौशा मियां और फिर ग़ालिब के नाम से मशहूर हुआ. इनके दादा ‘मिर्ज़ा क़ौक़न बेग ख़ाँ’ समरकन्द से भारत आए थे. बाद में वे लाहौर में ‘मुइनउल मुल्क’ के यहाँ नौकर के रूप में कार्य करने लगे.

मिर्ज़ा क़ौक़न बेग ख़ाँ के बड़े बेटे ‘अब्दुल्ला बेग ख़ाँ से मिर्ज़ा ग़ालिब हुए. अब्दुल्ला बेग ख़ाँ, नवाब आसफ़उद्दौला की फ़ौज में शामिल हुए और फिर हैदराबाद से होते हुए अलवर के राजा ‘बख़्तावर सिंह’ के यहाँ लग गए. लेकिन जब मिर्ज़ा ग़ालिब महज 5 वर्ष के थे, तब एक लड़ाई में उनके पिता शहीद हो गए.

ननिहाल में पले बढ़े –

इनका पालन पोषण पिता की मृत्यु के बाद इनके चचा ने ही इनका पालन किया था, पर शीघ्र ही इनकी भी मृत्यु हो गई थी और ये अपनी ननिहाल में आ गए. पिता स्वयं घर-जमाई की तरह सदा ससुराल में रहे. वहीं उनकी सन्तानों का भी पालन-पोषण हुआ.

निकाह –

जब असदउल्ला ख़ाँ ग़ालिब’ सिर्फ़ 13 वर्ष के थे, इनका विवाह लोहारू के नवाब ‘अहमदबख़्श ख़ाँ’ (जिनकी बहन से इनके चचा का ब्याह हुआ था) के छोटे भाई ‘मिर्ज़ा इलाहीबख़्श ख़ाँ ‘मारूफ़’ की बेटी ‘उमराव बेगम’ के साथ 9 अगस्त, 1810 में हुआ. तब उमराव 11 साल की थीं.

इस तरह लोहारू राजवंश से इनका सम्बन्ध और दृढ़ हो गया. पहले भी वह बीच-बीच में दिल्ली जाते रहते थे, पर शादी के 2-3 वर्ष बाद तो दिल्ली के ही हो गए. वह स्वयं ‘उर्दू-ए-मोअल्ला’ (इनका एक ख़त) में इस घटना का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं कि- “7 रज्जब 1225 हिजरी को मेरे वास्ते हुक्म दवा में हब्स सादिर हुआ. एक बेड़ी (यानी बीवी) मेरे पाँव में डाल दी और दिल्ली शहर को ज़िन्दान मुक़र्रर किया और मुझे इस ज़िन्दाँ में डाल दिया.”

विवाह के बाद ‘ग़ालिब’ की आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ती ही गईं. आगरा, ननिहाल में इनके दिन आराम व रईसीयत से बीतते थे. दिल्ली में भी कुछ दिनों तक रंग रहा. साढ़े सात सौ सालाना पेंशन नवाब अहमदबख़्श ख़ाँ के यहाँ से मिलती थी. वह यों भी कुछ न कुछ देते रहते थे. माँ के यहाँ से भी कभी-कभी कुछ आ जाता था.

गिरफ़्तारी

सन 1845 के लगभग आगरा से बदलकर एक नया कोतवाल फ़ैजुलहसन आया. आते ही उसने सख़्ती से जाँच करनी शुरू की. कई दोस्तों ने मिर्ज़ा को चेतावनी भी दी कि जुआ बन्द कर दो, लेकिन जुआ उनसे छूट नहीं रहा था. एक दिन कोतवाल ने छापा मारा, और लोग तो पिछवाड़े से निकल भागे पर मिर्ज़ा पकड़ लिए गए. मिर्ज़ा की गिरफ़्तारी से पूर्व जौहरी पकड़े गए थे. पर वह पैसे ख़र्च करके बच गए थे. मुक़दमें तक नौबत नहीं आई थी. गालिब मिर्ज़ा के पास में पैसे नहीं थे लेकिन दोस्त थे.

मुसलमान हूँ पर आधा

एक बार एक अंग्रेज़ सार्जेण्ट ने इनकी अनोखे परिधान को देखकर पूछा-‘क्या तुम मुसलमान हो ? मिर्ज़ा ने हंसकर जवाब दिया कि, ‘मुसलमान तो हूँ पर आधा.’ वह इनके जवाब से चकित हुआ. पूछा-‘आधा मुसलमान हो, कैसे ?’ मिर्ज़ा बोले, ‘साहब, शरीब पीता हूँ, हेम (सूअर) नहीं खाता.’

मिर्ज़ा ग़ालिब की मृत्यु 15 फ़रवरी, 1869 ई. को दोपहर ढले हुई थी. इनकी मृत्यु के बाद ही आगरा से प्रकाशित होने वाले पत्र ‘ज़ख़ीरा बालगोविन्द’ के मार्च, 1869 के अंक में इनकी मृत्यु पर जो सम्पादकीय लेख छपा था. जो शायद इनके सम्बन्ध में लिखा सबसे पुराना और पहला लेख है.

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