Covid 19 Vaccine : पोर्क जलेटिन क्या है और इसे लेकर हंगामा क्यों मचा है?

कोरोना वायरस के वैक्सीन को लेकर कुछ मुस्लिम देशों में बहस छिड़ गई है. बहस की शुरुआत इंडोनेशिया से हुई. वहां के मुस्लिम समुदाय के बीच यह बात तेजी से फैली है कि कोरोना के वैक्सीन में इस्तेमाल होने वाला पोर्क जलेटिन सुअर के मांस बना हुआ है और यह इस्लामिक कानून के तहत ‘हराम’ है. पोर्क जलेटिन पर यह विवाद नया नहीं है. 2018 में इंडोनेशिया में उलेमा काउंसिल ने चेचक और रुबेला के टीकों में पोर्क जलेटिन की मौजूदगी बताकर उसे हराम करार दिया था.

Covid Vaccine
Source – wtvy.com

पोर्क जलेटिन सूअर के चर्बी से प्राप्त होता है. इसका इस्तेमाल दवा बनाने में किया जाता है. पोर्क जलेटिन वैक्सीन में स्टेपलाइजर का काम करता है. यह वैक्सीन को स्टोरेज के दौरान सुरक्षित और असरदार बनाए रखने में मदद करता है.

कुछ वैक्सीन बनाने वाली कम्पनियों (Pfizer, Moderna, और AstraZeneca) ने COVID-19 टीकों में सुअर के चर्बी होने की बातों का खण्डन किया है.

ब्रिटिश इस्लामिक मेडिकल एसोसिएशन के महासचिव का कहना है कि ‘ऑर्थोडॉक्स यहूदियों और मुसलमानों समेत विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच टीके के इस्तेमाल को लेकर असमंजस की स्थिति है, जो सुअर के मांस से बने उत्पादों के इस्तेमाल को धार्मिक रूप से अपवित्र मानते हैं’. तो वही सिडनी विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर डॉक्टर हरनूर राशिद के अनुसार ‘टीके में पोर्क जलेटिन के उपयोग पर अब तक हुई विभिन्न परिचर्चा में आम सहमति यह बनी है कि यह इस्लामी कानून के तहत स्वीकार्य है, क्योंकि यदि टीकों का उपयोग नहीं किया गया तो ‘बहुत नुकसान’ होगा.

हालांकि अब संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की संस्था यूएई फतवा काउंसिल ने इसे जायज करार देते हुए कहा कि अगर वैक्सीन में सुअर से बनने वाला जलेटिन मौजूद है तो भी मुस्लिम उस वैक्सीन को ले सकते हैं. काउंसिल के अध्यक्ष शेख अब्दुल्ला बिन बय्या ने कहा कि ‘अगर कोई और विकल्प नहीं है तो कोरोना वायरस टीकों को इस्लामी पाबंदियों से अलग रखा जा सकता है क्योंकि पहली प्राथमिकता ‘मनुष्य का जीवन बचाना है.’