Take a fresh look at your lifestyle.

एक शापित कवि : अवतार सिंह सिंधु “पाश”

9 Sept. 1950 को जालंधर के तलवंडी गाँव में जन्म हुआ “अवतार सिंह सिंधु” का जिनको आज हम सब “पाश” के नाम से जानते हैं वही पाश जिन्हे श्रद्धांजलि देते हुए कवि  नामवार सिंह ने शापित कवि कहा था जो जीवन भर जीने के लिए लड़ता रहा और जीने की इस लड़ाई का अंत हत्या पर हुआ “एक कवि की हत्या पर”

ये वो वक्त था जब देश के हालात स्थिरता से कोसों दूर थे पंजाब में खालिस्तान की मांग  को लेकर खालिस्तानी समर्थक कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे और दूसरी तरफ राजनीतिक भ्रष्टाचार के चलते भारतीय किसान और मजदूर वर्ग भी शोषित होने को मजबूर , इन सबके बीच बड़े होते हुए अवतार ने समाज को इतना करीब से जिया की वो उनकी धमनियों से होकर बहने लगा।

15 साल उम्र में पहली कविता लिखी और अपनी कविताओं से जनता की आवाज बनते – बनते वो अवतार सिंह सिंधु से अवतार सिंह सिंधु “पाश” बन गए , 20 वर्ष की उम्र में पहला काव्य संग्रह “लौह कथा “ छपा तो उनकी क्रांतिकारी कविताओं के चलते उनको उग्रवादी करार देते हुए खून के झूठे इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया गया।  इसके चलते उनको लगभग २ वर्षो तक जेल में रहना पड़ा।  वे मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित थे। उस वक्त जबकि कोई भी कवि या लेखक सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने का सहस नहीं जुटा पा रहा था  उन्होंने न सिर्फ सरकार का बल्कि खालिस्तानी समर्थकों का भी अपनी ज्वलंत कविताओं से लगातार विरोध किया जिसके परिणाम स्वरुप खालिस्तानी उग्रवादियों ने 23 March 1988 को उनकी हत्या कर दी।

लोगों  का मानना है की वो एक मार्क्सवादी और क्रांतिकारी कवि थे जो भगत सिंह जी के क्रांतिकारी विचारो से प्रेरित थे मगर ये बात पूर्णतः सत्य नहीं है उन्होंने जितनी सिद्दत से आक्रोश को स्वर दिया है उतनी ही सिद्दत उनकी कविताओं में मोहब्बत को लेकर भी देखने को मिलती है उनकी कविताओं में आप एक प्रकार की तड़प को देख पाएंगे जिसको शब्दों का रूप शायद “पाश” ही दे सकते थे। आज भी सरकारें उनकी कविताओं से इस प्रकार खौफ खाती हैं  की वे चाहतीं है की पाश को, उनकी कविताओं को, लोग भूल जाएँ लेकिन ऐसा होना संभव नहीं है ये पाश के शब्दों की ही ताकत है की उनकी मौत के बाद भी वो और उनके विचार हमारे जेहन में हमेशा ज़िंदा रहेंगे।

साल 2006 में पहली बार जब 11 वीं कक्षा की NCERT की हिंदी की किताब में उनकी सबसे चर्चित कविता “सबसे खतरनाक” को शामिल किया गया तो एक उम्मीद जगी की शायद समाज एक नए बदलाव का  को तैयार है  लेकिन वर्ष 2017 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के आदेश पर कविता को किताब से हटा दिया गया। हम आपके लिए उस कविता को यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं:

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

मशहूर शायर निदा फाजली ने क्यों लिखी दुख भरी खूबसूरत नज्में.

Leave A Reply