सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज नरीमन ने देशद्रोह कानून और UAPA को बताया अंग्रेज़ों का कानून

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज नरीमन ने भारत में मौजूद देशद्रोह कानून(124ए) और UAPA पर अपनी राय जाहिर की है. जस्टिस नरीमन ने देशद्रोह कानून को रद्द करने और UAPA के कुछ प्रावधानों को हटाने की वकालत की. उन्होंने इन कानूनों को अंग्रेजों का कानून बताया और कहा कि कोर्ट अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर इसे रद्द करे ताकि देश के नागरिक खुलकर सांस ले सकें.

दरअसल जस्टिस रोहिंगटन फली नरीमन विश्वनाथ पसायत के पैनल चर्चा में शामिल थे. जहां ब्रिटेन और भारत में मौजूद देशद्रोह कानूनों के इतिहास पर चर्चा हो रही थी.

नरीमन ने क्या-क्या कहा

जस्टिस नरीमन ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा, ‘मैं सुप्रीम कोर्ट से आग्रह करूंगा कि वह उनके सामने लंबित देशद्रोह के मामलों को वापस केंद्र को ना भेजे. सरकारें आएंगी और जाएंगी लेकिन कोर्ट के लिए ये महत्वपूर्ण है कि वो अपनी शक्ति का उपयोग धारा 124ए और UAPA के कुछ हिस्सों को रद्द करने में करें. ताकि देश के नागरिक खुलकर सांस ले सकें.’

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उन्होंने भारत के कानून सूचकांक पर ध्यान दिलाते हुए कहा कि फिलीपींस के दो पत्रकारों को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया लेकिन वहां भारत का स्थान 142वां था. ऐसा क्यों? नरीमन ने कहा ऐसा इसलिए क्योंकि यहां कठोर कानून अभी भी मौजूद हैं.

भारत में मौजूद हैं अंग्रेजों के कानून

जस्टिस नरीमन ने कहा कि भारत का चीन और पाकिस्तान से युद्ध के बाद ये औपनिवेशिक कानून, गैरकानूनी निषेध अधिनियम बनाए गए थे. मौजूदा समय में UAPA अंग्रेजों का कानून हैं क्योंकि इसमें कोई अग्रिम ज़मानत नहीं दिया जाता है और इस कानून के तहत सबसे कम 5 साल की सज़ा सुनिश्चित है. इसके अलावा यह कानून अभी भी जांच के दायरे में नहीं रखा गया है इसलिए देशद्रोह कानून के साथ-साथ इस पर भी विचार होना चाहिए.

क्या कहती है धारा 124ए

जस्टिस नरीमन ने धारा 124 का जिक्र करते हुए कहा कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में धारा 124ए अभी तक कैसे बची हुई है. ऐसे में ये जानना जरूरी है कि आखिर धारा 124ए क्या कहती है. इसके अंतर्गत कोई भी नागरिक देश के खिलाफ यदि लिखकर, बोलकर, संकेत देकर या अभिव्यक्ति के जरिए नफरत फैलाता है या विद्रोह करता है तब आईपीसी की धारा 124ए के अंदर उस पर केस दर्ज किया जाता है और इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर उम्रकैद की सज़ा हो सकती है.

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