Bhagat Singh Birth Anniversary : भारत मां का लाल जिसने 23 साल की उम्र में फांसी के फंदे को चूम लिया

महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद भगत सिंह की आज 114वीं जयंती है. शहीद भगत सिंह भारत के उन महान विभूतियों में से एक हैं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपनी जान की कुर्बानी दे दी. भगत सिंह ने मात्र 23 साल की उम्र में देश के लिए फांसी पर चढ़ गए.

भगत सिंह का प्रारंभिक जीवन

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर साल 1907 को पंजाब (पाकिस्तान) स्थित लायलपुर के बंगा गांव में हुआ था. उनके पिता का नाम किशन सिंह और मां का नाम विद्यावती था. भगत सिंह ने अपनी पढ़ाई दयानंद एंग्लो-वैदिक स्कूल, लाहौर से किया. अपने स्कूली दिनों में वह करतार सिंह सराभा और लाला लाजपत राय से अधिक प्रभावित थे.

भगत सिंह पर 13 अप्रैल साल 1919 को जालियांवाला बाग हत्याकांड का गहरा प्रभाव पड़ा. इसके बाद उन्होंने मात्र 13 साल की उम्र में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन का खुलकर समर्थन किया. चौरी चौरा घटना के बाद महात्मा गांधी ने दुखी होकर असहयोग आंदोलन बंद कर दिया.

भगत सिंह जब लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे तब उनकी मुलाकात सुखदेव थापर और भगवती चरन से हुई. तीनों ने देश को आजाद करने के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ दी. इस दौरान भगत सिंह के घर वाले उनकी शादी करना चाहते थे, लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया और कहा ‘अगर आजादी के पहले मैं शादी करूंगा तो मेरी दुल्हन मौत होगी’.

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साइमन कमीशन का किया विरोध

भगत सिंह ने लाहौर में ‘कीर्ति किसान पार्टी’ के साथ मेल-जोल बढ़ाया. इसके बाद वह कीर्ति किसान पार्टी की पत्रिका ‘कीर्ति’ के लिए काम करने लगे. पत्रिका के माध्यम से वह अपनी बात देश के नौजवानों तक पहुंचाते थे. भगत सिंह ने पंजाबी और उर्दू में कई लेख लिखे. साल 1926 में भगत सिंह को भारत सभा का सेक्रेटरी बनाया गया. इसके बाद भगत सिंह ने चद्रशेखर आजाद की मौलिक पार्टी ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ ज्वाइन कर लिया.

20 अक्टूबर साल 1928 में साइमन कमीशन के विरोध भारत के अलग-अलग हिस्सों में गो बैक साइमन के नारे लगे. लाहौर में भगत सिंह लाला लाजपत राय के साथ मिलकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. बढ़ते विरोध प्रदर्शन को देखते हुए अंग्रेज प्रशासन ने लाठी चार्ज का आदेश दिया जिसमें लाला लाजपत राय बुरी तरह घायल हो गये और इस कारण 17 नवंबर साल 1928 को उनकी मौत हो गई. लाठी चार्ज का आदेश सुप्रीटेंडेंट जेम्स ए स्कॉट ने दिया था.

सांडर्स की हत्या

भगत सिंह ने राजगुरु और सुखदेव के साथ मिलकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने की प्रतिज्ञा की. सुप्रीटेंडेंट जेम्स ए स्कॉट की हत्या के लिए भगत सिंह ने योजना बनाई लेकिन स्कॉट की जगह गलती से असिस्टेंट सुप्रीटेंडेंट ऑफ पुलिस जॉन पी सांडर्स को मार डाला. जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर चमन लाल के अनुसार सांडर्स पर पहली गोली राजगुरु ने चलाई थी जिसके बाद भगत सिंह ने गोली चलाई.

असेंबली हॉल में फेंका बम

भगत सिंह का मानना था कि अंग्रेज बहरे हो गए हैं. उन्हें ऊंचा सुनाई देता है, जिसके लिए एक बड़े धमाके की जरूरत है. भगत सिंह ने फैसला किया कि वह अपना संदेश पूरे देश तक पहुंचाएंगे और इस बार भागने के बजाय वह खुद को पुलिस के हवाले करेंगे. दिसंबर साल 1929 को भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर असेंबली हॉल में बम फेंका. यह बम खाली स्थान पर फेंका गया था. बम फेंकने के बाद भगत सिंह ने इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए और अंसेबली हॉल में पर्चे बाटें.

Source- The Daily Guradian

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव पर अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया. जिसके बाद उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई. उस वक्त जेल में बंद भारतीयों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था न ही सही से खाना मिलता था और न ही पानी.

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी की तारीख 24 मार्च को तय की गई. लेकिन अंग्रेजों को डर था कि कहीं उनकी फांसी के दिन पूरे देश में दंगे न भड़क जाए इसलिए उन्होंने तीनों को 23 मार्च साल 1931 की शाम 7 बजकर 33 मिनट पर ही फांसी दे दी.

पढ़ाई के शौकीन थे भगत सिंह

पढ़ाई के शौकीन भगत सिंह ने अपने मित्र जयदेव कपूर को पत्र लिखा कि उनके लिए कार्ल लीबनेख़्त की ‘मिलिट्रिज़म’, लेनिन की ‘लेफ़्ट विंग कम्युनिज़म’ और आप्टन सिंक्लेयर का उपन्यास ‘द स्पाई’, कुलबीर के ज़रिए भिजवा दें. फांसी से पहले वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे. जेल में बंद होने के दौरान ही भगत सिंह ने Why I am Athesit नामक किताब लिखी.

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