Mariyappan Thangavelu : कौन है हाई जंप में सिल्वर जीतने वाले मरियप्पन थंगावेलु, जिन पर ऐश्वर्या धनुष बना रही हैं फिल्म

मरियप्पन थंगावेलु और शरद कुमार ने मंगलवार को हाईजंप के T42 कैटेगरी में भारत के लिए सिल्वर और ब्राॅन्ज मेडल जीता. वहीं अमेरिका के सैम ग्रीव ने 1.88 मीटर की ऊंची कूद लगाकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया. हाईजंप में दो मेडल के साथ टोक्यो पैरालंपिक में कुल 10 मेडल हो गए हैं. यह पैरालंपिक के इतिहास में भारत का अबतक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. मरियप्पन थंगावेलु इस इवेंट के डिफेंडिंग चैंपियन थे. उन्होंने रियो पैरालंपिक में गोल्ड मेडल जीता था लेकिन इस पैरालंपिक में उन्हें सिल्वर से संतोष करना पड़ा. उन्होंने फाइनल में 1.86 मीटर की ऊंची कूद लगाई.

मरियप्पन थंगावेलू पर बन रही है फिल्म

मरियप्पन के इस सफलता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे मुलाकात करके बधाई दी. बता दें कि साउथ फिल्मों के सुपरस्टार रजनीकांत की बेटी और एक्टर धनुष की पत्नी ऐश्वर्या धनुष ने मरियप्पन के जीवन के पर आधारित एक फिल्म बनाने की घोषणा भी की है. फिल्म का टाइटल भी मरियप्पन ही है.

बचपन में ही पिता घर छोड़कर चले गए

मरियप्पन थंगावेलु का जन्म 28 जून 1995 को तमिलनाडु के सेलम जिले में हुआ था. मरियप्पन अभी गोद में ही थे कि उनके पिता थंगवेल घर छोड़कर हमेशा के लिए चले गए. उसके बाद उनके बारे में ना ही कभी कोई खबर मिली और ना वे वापस लौटे. ऐसी परिस्थिति में मरियप्पन की मां सरोज के लिए एक बड़ी चुनौती थी कि वे कैसे उनको और उनके दो भाईयों और एक बहन को पाल-पोसकर बड़ा करे. अचानक पूरे परिवार पर भारी विपत्ति आ चुकी थी. लेकिन उनकी मां ने कभी हार नहीं माना. उन्होंने खुद पूरे घर की जिम्मेदारी ली. 

घर चलाने के लिए मां ने किया संघर्ष

घर का खर्च चलाने के लिए उनकी तरह-तरह की दिहाड़ी मजदूरी करती थीं. वो कभी ईंट ढ़ोने का काम करती, तो कभी किसी के घर का काम करती. दिन भर में मुश्किल से 100 रुपये की कमाई हो पाती थी. उनका जीवन बहुत ही कठिन दौर से गुजर रहा था लेकिन अपने बच्चों की भलाई के लिए वो कुछ भी करने के लिए तैयार थीं. कुछ समय तक दिहाड़ी मजदूरी करने के बाद वो सब्जी बेचने का काम करने लगीं. मरियप्पन ने बचपन से ही अपनी मां को जीवन जीने के लिए कड़ी मेहनत करते देखा था और शायद इसलिए उनमें भी उनकी मां के गुण आ गए.

पांच साल की उम्र में पियक्कड़ ड्राइवर ने पैर पर चढ़ा दी थी गाड़ी

पांच साल की उम्र में स्कूल में मरियप्पन का दाखिला हुआ और वो पढ़ने जाने लगे. तभी एक दिन उनके साथ एक बहुत दर्दनाक हादसा हो गया. दरअसल, मरियप्पन स्कूल से पढ़कर वापस घर लौट रहे थे कि अचानक एक पियक्कड़ ड्राइवर ने पीछे से उनके उपर गाड़ी चढ़ा दी. उस ड्राइवर ने इतनी पी रखी थी कि उसे पता नहीं चला कि आगे कोई बच्चा और उसने गाड़ी पर से अपना नियंत्रण खो दिया. उसने मरियप्पन के घुटने के नीचले हिस्से पर गाड़ी ऐसे चढ़ाई कि घुटने के नीचे का हिस्सा पूरी तरीके टूट गया. 

उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डाॅक्टर्स ने बताया कि उनकी हालत बहुत ज्यादा खराब है. यहां तक कि उनके जान पर खतरा मंडराने लगा था. ऐसा लग रहा था उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है. उनकी मां सरोज किसी तरह से अपने बेटे की जान बचाना चाहती थीं. लेकिन मरियप्पन को बचाने के लिए गहरे इलाज की आवश्यकता थी, जिसमें भारी खर्च होने वाला था. 

इलाज के लिए लेना पड़ा भारी कर्ज

इलाज के लिए इतना ज्यादा पैसा देना एक गरीब परिवार और उनी मां की बस बात नहीं थी. फिर भी वह अपने बेटे को दर्द में नहीं देख सकती थी. इसलिए उन्होंने मरियप्पन के ईलाज के लिए 3 लाख रुपए का कर्ज लिया. लेकिन अफसोस की बात की यह है कि डाॅक्टर भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाए और उनका दाहिना पैर हमेशा के लिए विकलांग हो गया. इससे मरियप्पन के जीवन का संघर्ष और भी गहरा हो गया. अब उनके परिवार को उनके इलाज के लिए गए तीन लाख का कर्ज भी चुकाना था.

अपने आप को कभी विकलांग नहीं माना

इन सभी विपत्तीयों के बावजूद मरियप्पन टूटे नहीं. वे सभी परिस्थियों से निपटने के लिए तैयार थे. सभी विपरीत परिस्थियों के बावजूद उन्होंंने अपनी पढ़ाई जारी रखी. उन्होंने अपनी विकलांगता को कमजोरी की जगह अपना प्रेरणा बनाया और शुरु से ही अपने जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण रखा. उन्होंने कभी भी अपने आप को दूसरे आम बच्चों से अलग नहीं समझा. 

वाॅलीबाॅल खेलना चाहते थे, पढ़ाई में भी थे गंभीर

मरियप्पन ने बचपन से अपने जीवन में संघर्ष देखा था और पढ़ाई के महत्व को समझते थे. इसलिए स्कूल के दौरान पढ़ाई में बहुत मेहनत करते थे. स्कूल में पढ़ाई करने के दौरान मरियप्पन को वाॅलीबाॅल के खेल में रुचि आई और उन्होंने उस खेलने का भी प्रयास किया. लेकिन विकलांगता की वजह से मरियप्पन वाॅलीबाॅल के लिए जरुरी फिजिकल स्तर तक पहुंचने में असमर्थ थे.

इसके बावजूद वे इस खेल को घंटों देखते थे और अपने साथी खिलाड़ियों को बेहतर खेलने के लिए मनोबल बढ़ाते रहते थे. मैच के बाद वे वाॅलीबाॅल खेलने का प्रयास भी करते लेकिन वे अपने शरीर का संतुलन नहीं बना पाते थे. इसी दौरान उनके शिक्षक ने देखा कि वो काफी अच्छा जंप लगा रहें हैं और उन्होंने हाईजंप में हाथ आजमाने की सलाह दी. यहीं से मरियप्पन के जीवन में एक बार फिर सकारात्मक बदलाव आने शुरु हो गए. 

रियो पैरालंपिक में जीता गोल्ड

मरियप्पन हाई जंप में बहुत बेहतरीन थे. प्रैक्टिस के दौरान वे एबल्ड-बाॅडी यानी दूसरे नाॅर्मल बच्चों को भी हाई जंप में हरा देते थे. उन्होंने नेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप के लिए तैयारी शुरू कर दी. इसी दौरान 2013 में उनकी मुलाकात भारतीय कोच सत्यनारायण से हुई. सत्यनारायण उनकी प्रतिभा को देखकर बहुत आचंभित थे. उन्हें एहसास हो गया था कि भविष्य में मरियप्पन बहुत शानदार खिलाड़ी बनेंगे. उन्होंने तुरंत मरियप्पन को बेंगलुरु भेज, जहां उनको ट्रेंनिंग के लिए विश्व स्तरीय सुविधाएं मिल सके. सत्यनारायण एक बार बताया था कि मरियप्पन बहुत ही अनुशासित और विश्वास से भरा हुआ खिलाड़ी है. 

बचपन से संघर्ष देख रहे मरियप्पन में सफलता पाने की भूख थी और अपनी लगन से उन्होंने ये मकाम हासिल किया. मात्र डेढ़ साल की प्रैक्टिस के बाद ही वे 2015 में हाई जंप में नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर नंबर एक खिलाड़ी बन गए थे. उसके अगले ही साल 2016 के रियो पैरालंपिक में उन्होंने गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया. ये मात्र तीसरी बार था जब किसी भारतीय ने पैरालंपिक में गोल्ड मेडल जीता था. 2004 के बाद पहली बार किसी भारतीय ने पैरालंपिक में गोल्ड हासिल किया था. 

पुरस्कार राशि से मां को दिया उपहार

तमिलनाडु के एक गरीब परिवार से निकलकर पैरालंपिक में गोल्ड मेडल जीतना मरियप्पन के लिए एक बड़ी कामयाबी थी. उनकी वर्षों की कड़ी मेहनत रंग लाई थी. वो रातों-रात स्टार बन गए थे. गोल्ड मेडल जीतने के लिए भारत सरकार और राज्य सरकार की तरफ से उन्हें पुरस्कार राशि भी दिया गया. उन्होंने पुरस्कार में मिले पैसे से अपनी मां के लिए उपहार के रुप में खेत और एक घर खरीदा. उनकी मां ने उन्हें इस मकाम तक पहुंचाने के लिए जीवन भर संघर्ष किया था. 

केंद्र और राज्य सरकार ने भी दिया प्रोत्साहन राशि

मरियप्पन थंगावेलु ने अभ्यास करना जारी रखा. लेकिन अभी भी उनके परिवार को आर्थिक स्थिरता नहीं मिल पाई थी. कुछ दिन बाद तमिलनाडु सरकार उनकी सहायता के लिए आगे आई. राज्य सरकार ने पैरालिंपिक में उनकी शानदार उपलब्धि के सम्मान के रूप में 2 करोड़ रुपये दिए. इसके बाद खेल मंत्रालय से 75 लाख, मध्य प्रदेश सरकार से 50 लाख और सामाजिक न्याय मंत्रालय से 30 लाख रुपये मिले. इस वित्तीय सहायता से उनके परिवार को आर्थिक स्थिरता मिली. अपने परिवार के लिए उनकी चिंताए अब दूर हो गईं थी. इससे उन्हें अपने अभ्यास पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिली. 

इस बार 2 सेंटीमीटर से चुके गोल्ड

2018 में इंडोनेशिया में हुए एशियन पैरा गेम्स में उन्होंने ब्राॅन्ज जीता था. लेकिन वो अपने प्रदर्शन से खुश नहीं थे, क्योंकि उन्होंन मात्र 1.67 मीटर ऊंची कूद लगाई थी. वहीं 2016 के रियो पैरालंपिक में 1.78 मीटर ऊंचा कूदे थे. इसके उन्होंने फिर से कड़ी मेहनत करनी शुरु की और अभी टोक्यो पैरालंपिक के लिए क्वालिफाई हुए. टोक्यो पैरालंपिक के फाइनल में मरियप्पन मात्र 0.02 मीटर यानी 2 सेंटीमीटर से गोल्ड चुक गए. अंत में उन्होंने सिल्वर मेडल अपने नाम किया.

बीबीए किया अब एमबीए करना चाहते हैं, उनके जीवन पर बन रही है फिल्म

जैसा कि पहले बताया वे पढ़ाई को भी बहुत महत्व देते थे, इसलिए गंभीरता से पढ़ते रहे और बीबीए की डिग्री भी पूरी की. आपको बता दें कि मरियप्पन थंगावेलु अपनी पढ़ाई को आज भी उतने ही गंभीर हैं और आगे एमबीए करना चाहते हैं. 

पिछले साल दिसंबर में मरियप्पन को भारतीय खेल प्राधिकरण की तरफ से ग्रुप ए पद पर कोच के लिए नौकरी की पेशकश की गई थी. उन्हें 2017 में पद्म श्री और उसी साल अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उनके जीवन पर एक फिल्म भी बनाई जा रही है, जिसका निर्देशन ऐश्वर्या रजनीकांत धनुष कर रहीं हैं.

फिल्म के रिलीज की तारीख अभी नहीं बताई गई है लेकिन अगले साल तक रिलीज होने की उम्मीद है. ये फिल्म तमिल और इसका कुछ हिस्सा अंग्रेजी में भी शूट की जा रही है. मरियप्पन थंगावेलु का पूरा जीवन अपने आप में दूसरों के लिए एक किसी प्रेरणा से कम नहीं है लेकिन देखना होगा कि ये फिल्म आने के बाद कितने नौजवानों को प्रेरित कर पाती है. 

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