राजा महेंद्र प्रताप सिंह कौन हैं जिनके नाम पर अलीगढ़ में बनने जा रही है यूनिवर्सिटी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) 14 सितंबर को उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के अलीगढ़ पहुंचेंगे. वहां राजा महेंद्र प्रताप सिंह (Raja Mahendra Pratap Singh) राज्य विश्वविद्यालय और डिफेंस कॉरिडोर का शिलान्यास करेंगे. इसे लेकर अलीगढ़ में तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के अलावा राज्य के सीएम योगी आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा और राज्यपाल आनंदीबेन पटेल शामिल होंगी.

साल 2019 में हुई थी विश्वविद्यालय की घोषणा

सीएम योगी आदित्यनाथ ने 14 सितंबर साल 2019 को विश्वविद्यालय के निर्माण की घोषणा की थी. राजा महेंद्र प्रताप विश्व राज्य विद्यालय के लिए लोधा क्षेत्र के गांव मूसेपुर भूमि प्रस्तावित हुई थी. जिला प्रशासन ने 37 हेक्टेयर से अधिक सरकारी भूमि देने का निर्णय किया था इसके अलावा 10 हेक्टेटर की भूमि अधिग्रहित की गई थी.

राजा महेंद्र प्रताप सिंह कौन थे

महेंद्र प्रताप का जन्म 1 दिसंबर साल 1886 में एक जाट परिवार में हुआ था. उनके पिता घनश्याम सिंह मुरसान रियासत के राजा थे. वर्तमान में मुरसान यूपी के हाथरस जिले के अंतर्गत आता है. वह राजा घनश्याम सिंह के तीसरे पुत्र थे. जब महेंद्र प्रताप तीन साल के तब हाथरस के राजा हरनारायण सिंह ने उन्हें पुत्र के रूप में गोद ले लिया. साल 1902 में उनका विवाह बलवीर कौर के साथ हुआ. बलवीर कौर जिन्द रियासत के सिद्धू जाट परिवार से ताल्लुक रखती थीं.

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Source- The Indian Express

दादाभाई नौरोजी और बाल गंगाधर तिलक से थे प्रभावित

राजा महेंद्र प्रताप स्वदेशी आंदोलन से जुड़े थे. उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं और स्थानीय कारीगरों के साथ छोटे उद्योगों को लगातार बढ़ावा देते थे. दादाभाई नौरोजी और बाल गंगाधर तिलक के भाषणों ने उन्हें बहुत प्रभावित किया जिसके बाद महेंद्र प्रताप ने अपने राज्य में विदेशी कपड़ों को जलाने के लिए आंदोलन शुरू किया.

स्वतंत्रता के संघर्ष में भारत के लिए समर्थन प्राप्त करने के प्रयास में महेंद्र प्रताप ने विदेशों का भी दौरा किया. सेना की नीतियों और उसके कामकाज के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए उन्होंने पोलिश सीमा (पोलैंड) के पास एक सैन्य शिविर का भी दौरा किया.

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Source- TOI

इतिहासकारों के मुताबिक मैसर्स थॉमस कुक एंड संस के मालिक ने बिना पासपोर्ट के अपनी कंपनी के स्टीमर से राजा महेन्द्र प्रताप और स्वामी श्रद्धानंद के बड़े बेटे हरिचंद्र को इंग्लैड ले गए. महेंद्र प्रताप बाद में बुडापेस्ट, बुल्गारिया, तुर्की होकर हेरात पहुंचे जहां उन्होंने अफगान के बादशाह मुलाकात की और 1 दिसंबर साल 1915 में काबुल से भारत में अस्थायी सरकार की घोषणा की इस सरकार के राष्ट्रपति खुद को तथा प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्ला खाँ को घोषित किया.

वृंदावन में महाविद्यालय की स्थापना

महात्मा गांधी की अहिंसा नीति में विश्वास रखने वाले, महेंद्र प्रताप ने वृंदावन के अपने महल में प्रेम महा विद्यालय की स्थापना की, जो अपनी तरह का एक पॉलिटेक्निक संस्थान है. कॉलेज ने एक ही छत के नीचे बढ़ईगीरी, धातु के काम, मिट्टी के बर्तनों और वस्त्र जैसे विषयों को पढ़ाया जाता था.

उनका यह भी मानना ​​था कि पूरी दुनिया एक परिवार है और पुलिस और सशस्त्र बलों के ऊपर कम किया गया खर्च विकासशील देशों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. उन्होंने पंचायत राज को एक ऐसे उपकरण के रूप में भी प्रोत्साहित किया जो वास्तविक शक्ति को आम आदमी के हाथों में डालने और भ्रष्टाचार को कम करने में मदद कर सकता है.

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Source- News Track

शिक्षा के लिए संपति का किया त्याग-

महेंद्र प्रताप का नाम साल 1993 में नोबल के शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था. महेंद्र प्रताप ने शैक्षिक उद्देश्यों के लिए अपनी संपत्ति छोड़ दी और उन्होंने वृंदावन में एक तकनीकी कॉलेज की स्थापना की. साल 1913 में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में गांधी के अभियान में भाग लिया. उन्होंने अफगानिस्तान और भारत की स्थिति के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए दुनिया भर की यात्रा की. साल 1925 में वे तिब्बत के एक मिशन पर गए और दलाई लामा से मिले.

महेंद्र प्रताप सिंह ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई, वह साल 1957 में लोकसभा चुनावों में भारतीय जनसंघ (जो बाद में भाजपा में परिवर्तित हो गया) के उम्मीदवार अटल बिहारी वाजपेयी को हराकर संसद के लिए चुने गए. साल 1979 में महेंद्र प्रताप का निधन हो गया.

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