Tokyo Paralympic : डिस्कस थ्रो में ब्राॅन्ज जीतने वाले विनोद कुमार से पैरालंपिक कमेटी ने क्यों वापस ले लिया मेडल

भारतीय पैरा एथलीट विनोद कुमार ने रविवार को टोक्यो पैरालंपिक के डिस्कस थ्रो F52 इवेंट में ब्राॅन्ज मेडल जीता था. मेडल के जीतने के अगले दिन उनके रिजल्ट की दोबारा जांच हुई और वर्गीकरण पैनल ने रिजल्ट को निरर्थक घोषित कर उनके मेडल को वापस ले लिया. विनोद ने डिस्कस थ्रो के फाइनल मुकाबले में 19.91 मीटर का थ्रो करके पोलैंड के पियोट्र कोसेविक्ज़ (20.02 मीटर) और क्रोएशिया के वेलिमिर सैंडोर (19.98 मीटर) के बाद तीसरा स्थान हासिल किया था. 

BSF के जवान थे, पहाड़ी से गिरने पर 10 सालों तक बेड पर रहना पड़ा

विनोद एक आर्मी परिवार से आते हैं. उनके पिता बांग्लादेश की आजादी के लिए पाकिस्तान के खिलाफ लड़ी गई 1971 की लड़ाई का हिस्सा थे. अपने पिता से प्रेरित होकर विनोद ने भी अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद BSF में शामिल हो गए थे. 2002 में अपने ट्रेनिंग के दौरान लेह में एक पहाड़ी से गिर गए थे, जिसमें उनके दोनों पैरों में गहरी चोट आई थी. इस हादसे के बाद विनोद को 10 साल तक बेड पर ही रहना पड़ा था. 2016 में उन्हें पैरा एथलेटिक्स के बारे में पता चला, जिसके बाद भारतीय खेल प्रधिकरण के साथ जुड़कर उन्होंने प्रैक्टिस शुरु किया. 

टोक्यो ओलंपिक में आखिर ऐसा क्या हुआ जिससे उन्हें अपनी मेडल गंवाना पड़ा. आइए जानते हैं.

विनोद कुमार ने रविवार को मेडल जीता. इवेंट के तुरंत बाद उनके रिजल्ट को रिव्यू में डाल दिया गया और उसके अगले ही दिन यानी सोमवार को ऑर्गनाइजर्स ने रिजल्ट में सुधार की घोषणा की. वर्गीकरण पैनल ने उन्हें F52 डिस्कस थ्रो के लिए अयोग्य पाया. दोबारा जांच करने के बाद पैनल ने कहा कि वे विनोद कुमार को कोई भी स्पोर्ट क्लास देने में असमर्थ रहे. इसका मतलब कि विनोद ने कोई मेडल नहीं जीता. वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स की मास्टर लिस्ट सूची के वर्गीकरण में भी विनोद को पहले ही रिव्यू में डाला जा चुका था. 

पैरा खेलों का वर्गीकरण –

इंटरनेशनल पैरालंपिक कमेटी के अनुसार पैरा खेलों में वर्गीकरण का मुख्य उद्देश्य है कि स्किल, फिटनेस और टैक्टिस जैसे मापदंडों के आधार पर सबसे सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी ही मेडल जीते. ऐसा न होने पाए कि कोई खिलाड़ी जो दूसरे खिलाड़ियों के मुकाबले बहुत कम विकलांग हो और इस खेल में हिस्सा लेकर मेडल जीत ले. 

वर्गीकरण के जरिए कमेटी की कोशिश होती है कि सभी खिलाड़ियों को स्पर्धा करने का बराबर मौका मिले. इसके लिए एक अतंर्राष्ट्रीय वर्गीकरण पैनल बनाया गया है.

किस प्रकार होता है खिलाड़ियों का वर्गीकरण ?

किसी भी प्रतियोगिता के पहले क्लासीफायर्स द्वारा खिलाड़ियों की जांच की जाती है. जांच के दौरान उनके विकलांगता के आधार पर ये तय किया जाता है कि खिलाड़ी संबंधित खेल के किस कैटेगरी में भाग ले सकते हैं. वर्गीकरण करने वाले क्लासीफायर्स को इसके लिए इंटरनेशनल फेडरेशन द्वारा ट्रेनिंग दी जाती है. कई टूर्नामेंट में वर्गीकरण नहीं भी किया जा सकता है. 

वर्गीकरण के बाद क्या होता है ?

सभी खिलाड़ियों की जांच हो जाने के बाद वर्गीकरण पैनल एथलीट को ‘स्पोर्ट क्लास स्टेटस’ देते हैं. इससे पता चलता है कि भविष्य में उस खिलाड़ी पर दोबारा जांच की जरुरत है या नहीं. 

विनोद कुमार के मामले में क्या हुआ ?

विनोद कुमार का वर्गीकरण 22 अगस्त को किया गया था. उस वक्त उन्हें F52 में कैटेगरी में खेलने की अनुमति मिल गई थी. IPC के अनुसार, F52 श्रेणी में भाग लेने वाले एथलीटों के कंधे की मांसपेशियां अच्छी होती हैं और पूरी कोहनी और कलाई की मांसपेशियां हल्की कमजोर होती हैं, जो किसी भी वस्तु को फेंकने के लिए आवश्यक होती हैं. इसके अलावा फिंगर फ्लेक्सर और एक्सटेंसर मांसपेशियां काम नहीं करती, जिससे किसी वस्तु को पकड़ने में मुश्किल होती है और IPC की नियमानुसार आमतौर पर नहीं फेंकने वाले हाथ को बांधना होता है.

वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स के डाटाबेस के अनुसार विनोद कुमार का वर्गीकरण इस साल के लिए पहले से ही रिव्यू में था. विनोद को इसके बारे में जानकारी थी या नहीं या पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया (PCI) ने इस बारे में उन्हें बताया था कि नहीं यह अभी स्पष्ट नहीं हो सका है.

किसी भी एथलिट की जांच दोबारा कब की जा सकती है ? 

वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स वर्गीकरण नियमों के अनुसार, एक वर्गीकरण पैनल कई कारकों के आधार पर किसी भी एथलीट की दोबारा जांच बैठा सकता है. इसके कई कारण हो सकते हैं. यदि किसी एथलीट को हाल ही के कुछ टूर्नामेंट या प्रतियोगिता में रिव्यू में डाला गया हो या उस पर कुछ प्रतिबंध लगें हो तो वर्गीकरण पैनल उस खिलाड़ी पर दोबारा रिव्यू के आदेश दे सकता है. विनोद कुमार 25वें भारतीय पैरा एथलिट हैं, जिन पर वर्ल्ड पैरा एथेलेटिक्सन ने रिव्यू किया है.

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