History

देश के राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ से जुड़ा है आज का इतिहास, जानिए कैसे मिली पहचान

स्कूल हो या कॉलेज, दिन की शुरुआत के पहले राष्ट्रगीत का प्रचलन बहुत पहले से है. देश के सम्मान से जुड़ा ये गीत बच्चे-बच्चे की जुबान पर रटा हुआ है. राष्ट्रगीत के इतिहास को देखते हुए आज का दिन बेहद खास है. क्योंकि आज ही के दिन यानि कि 20 दिसंबर साल 1876 में इस गीत की रचना महान कवि बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने की थी.

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ऐसा माना जाता है कि साल 1876 में जब बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय एक सरकारी अधिकारी थे उसी समय से उन्होंने वन्दे मातरम् की रचना कर ली थी. उन्होंने इस कविता को भारतीय स्वतंत्रता अभियान से प्रेरित होकर ही रचा था. इस कविता को बंगाली और संस्कृत शब्दों का इस्तेमाल कर बनाया गया था.

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वन्दे मातरम् का प्रकाशन साल 1882 में कवि बंकिमचन्द्र के एक उपन्यास आनंद मठ में अंतर्निहित गीत के रूप में हुआ था. इस उपन्यास में यह गीत भवानंद नाम के सन्यासी द्वारा गया गया है. साथ ही इसकी धुन को यदुनाथ भट्टाचार्य ने बनाया था.

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जानकारी के लिए बता दें कि स्वाधीनता संग्राम इस गीत की निर्णायक भागीदारी के बावजूद जब राष्ट्रगान के चयन की बात सामने आई तो वन्दे मातरम् की जगह ‘जन गण मन’ को सबसे पहले वरीयता दी गयी. क्योंकि मुस्लिम संगठन के लोगों को वन्दे मातरम् गाने में आपत्ति थी. इस गीत में देवी दुर्गा की स्तुति की गयी है. और इसे जिस उपन्यास से लिया गया है वो भी मुस्लिमों के खिलाफ था.

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साल 1937 में इस गीत पर उठ रही आपत्तियों के बारे में बहुत सोचा गया. हालांकि इस गीत की बाद की लाईनों में देवी देवताओं का काफी जिक्र होने की वजह से इस गीत के शुरूआती दो पदों को ही राष्ट्रगान के रूप में चुना गया. भारत की स्वतंत्रता के बाद डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी साल 1950 में ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रगीत स्वीकार कर लिया गया.

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वन्दे मातरम् को अलग-अलग प्रकार के संगीतों के साथ बनाया गया है. जिसमें साल 1907  की सबसे पुरानी रिकॉर्डिंग भी शामिल है.

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