Radcliffe Line: बंटवारे के वक्त कैसे खींची गई थी रैडक्लिफ लाइन, जो भारत और पाकिस्तान को बांटती है

14 अगस्त को पाकिस्तान और 15 अगस्त को भारत आजाद तो हो गए लेकिन इन्हें अपनी-अपनी सीमा के लिए और दो दिनों का इंतजार करना पड़ा था. भारत की आजादी के दो दिनों के बाद यानी कि आज ही के दिन 17 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान को विभाजित करने वाली रेखा ‘रैडक्लिफ लाइन’अपने अस्तित्व में आई थी. इसका नाम सीमा निर्धारण आयोग के चेयरमैन सर सिरिल रैडक्लीफ के नाम पर रखा गया. यह सीमा रेखा आज पश्चिम में भारत और पाकिस्तान के बीच और पूर्व में भारत और बांग्लादेश के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा है.

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क्यों सर सिरिल रैडक्लिफ को बनाया गया था सीमा निर्धारण आयोग का चेयरमैन?

फरवरी, 1947 में लाॅर्ड माउंटबेटेन को भारत का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया था. इससे पहले भारत के वायसराय रह चुके लाॅर्ड वेवेल ने भारत-पाकिस्तान की सीमा रेखा तैयार कर दी थी लेकिन वह सीमा रेखा पूरी तरह से स्पष्ट नहीं था. जुन, 1947 में ब्रिटिश सरकार ने सर सिरिल रैडक्लिफ को सीमा निर्धारण आयोग का चेयरमैन नियक्त कर भारत भेजा. ब्रिटिश की नजर में सर सिरिल सीमा निर्धारण के लिए एक न्युट्रल व्यक्ती थे. वे पेशे से एक वकील थे. ब्रिटिशर्स के अनुसार सर सिरिल सीमा निर्धारण में पक्षपात नहीं करते क्योंकि उन्हें पहले से भारत और यहां की स्थिति के बारे में काई जानकारी नहीं थी. इन सब कारणों की वजह से ब्रिटिश सरकार ने सर सिरिल रैडक्लिफ को सीमा निर्धारण आयोग का चेयरमैन बनाया गया.

सीमा निर्धारण के लिए पांच हफ्ते का दिया गया था वक्त

जुलाई, 1947 में रैडक्लिफ भारत पहुंचे. सीमा निर्धारण के लिए उन्हें पांच सप्ताह का वक्त दिया गया था. दरअसल, 15 जुलाई 1947 को भारत में The Indian Independence Act 1947 लागू हुआ, जिसके तहत भारत 15 अगस्त, 1947 से एक ब्रिटिश शासन से आजाद होने वाला था. इस एक्ट में भारत को दो देशों में विभाजित करने का प्रावधान था. इस एक्ट के तहत भारत को Union Of India और Dominion of Pakistan दो देशों के रुप में विभाजित होना था. जहां पाकिस्तान को भारतीय मुस्लिमों का देश बनना था वहीं भारत को एक धर्मनिपेक्ष राष्ट्र के रुप में खड़ा होना था.

सर सिरिल रैडक्लिफ सीमा निर्धारण आयोग के सदस्यों से मिलने पहले लाहौर और फिर कोलकाता गए. उस वक्त मुस्लिम लीग की तरफ से मुहम्मद अली जिन्ना और काॅंग्रेस की तरफ से जवाहर लाल नेहरु सीमा निर्धारण आयोग का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. नेहरु और जिन्ना चाहते थे कि आजादी की वजह से सीमा निर्धारण का कार्य पूरा हो जाए. रैडक्लिफ 12 अगस्त तक इस कार्य को पूरा भी कर दिया लेकिन राजनीतिक कारणों से इसे 17 अगस्त 1947 को आधिकारिक रुप से जारी किया गया. 

किस आधार पर तय हुई रैडक्लिफ लाइन

विभाजन के पहले यह तय हुआ था कि भारत और पाकिस्तान का बंटवारा टु नेशन थ्योरी यानी हिंदु- मुस्लिम दो समुदायों के आधार पर होगा. इस थ्योरी का मुख्य प्रस्तावक ऑल इंडिया मुस्लिम लीग था, जो भारत में ब्रिटिश शासन काल से ही मुस्लिमों को प्रतिनिधित्व कर रहा था, जिसके नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने 1940 में टु नेशन थ्योरी की नींव को लाहौर के एक भाषण के दौरान रखा था. ऑल इंडिया मुस्लिम लीग मुस्लिम बहुल प्रांतों को मिलाकर अपना एक अलग देश बनाना चाहती थी. इसलिए रैडक्लिफ लाइन को कुछ इस तरह से खींचा जाना था कि मुस्लिम बहुल प्रांत पाकिस्तान में चल जाएं और हिंदु और सिख बहुल प्रांत भारत में ही मिले रहे. 

कौन सा इलाका किसे मिला –

चूंकि भारत और पाकिस्तान का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ था इसलिए भारत के उत्तर में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को पाकिस्तान का हिस्सा बनना था. बलूचिस्तान और सिंध अपने आप ही पाकिस्तान का हिस्सा बन गए, क्योंकि इन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी बहुलता में थी. सिंध की लगभग 70 प्रतिशत आबादी मुस्लिम थी, वहीं बलूचिस्तान की लगभग 90 प्रतिशत आबादी मुस्लिम थी. पंजाब के दो प्रांतों (55.9%मुस्लिम) और बंगाल (54.5% मुस्लिम) प्रांत के विभाजन में चुनौती थी जहां पर किसी भी समुदाय की आबादी इतनी नहीं की उस सीधे पाकिस्तान या भारत का हिस्सा बना दिया जाए.

पंजाब और बंगाल को पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे जिन्ना

हालांकि मुहम्मद अली जिन्ना चाहते थे कि इन दोनों प्रांतों को भी पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया जाए लेकिन कांग्रेस पार्टी इसके लिए तैयार नहीं हुई. इसलिए इन प्रांतों को काटकर दोनों देशों को हिस्से में देने का फैसला किया गया. आखिरकार पंजाब का पश्चिमी हिस्सा पश्चिमी पाकिस्तान का हिस्सा बना और पूर्वी हिस्सा भारत का हिस्सा बन गया. पूर्वी पंजाब को बाद में तीन राज्यों में विभाजित किया गया.

बंगाल राज्य भी पूर्वी बंगाल और पश्चिम बंगाल में विभाजित हो गया. पूर्वी बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बना और पश्चिम बंगाल भारत में रह गया. अफगानिस्तान के पास मौजूद नाॅर्थ वेस्ट फ्राॅन्टियर प्रांत ने आजादी के बाद पाकिस्तान में मिलने के लिए वोट किया, जिसके बाद वो पाकिस्तान का हिस्सा हो गया. पंजाब प्रांत की आबादी काफी बिखरी हुई थी. इसलिए वहां ऐसी रेखा खींचना बहुत ही मुश्किल काम था, जो हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों को स्पष्ट रूप से विभाजित कर दे.

रियासते बनी नई चुनौती

विभाजन के समय रियासतें भी एक नई चुनौती के तौर पर उभर कर आईं. क्योंकि विभाजन से पहले भारत का 40 प्रतिशत हिस्सा रियासतों में बँटा हुआ था, जो ब्रटिश शासन के अधीन नहीं था. इसलिए ब्रटिश सरकार ना ही उनको आजादी दे सकती थी और ना ही विभाजित कर सकती थी. इसलिए ये पूरी तरह से उन पर निर्भर था कि वे भारत में शामिल होना चाहते हैं या पाकिस्ताान में या एक आजाद राज्य के तौर पर रहना चाहते हैं.

चनौती भरा काम था सीमा निर्धारण

सीमा निर्धारण आयोग को न केवल  एक प्रांत की आबादी का ध्यान रखना था बल्कि उन्हें रोडवेज और रेलवे लाइनों, बिजली सिस्टम, सिंचाई योजनाओं और व्यक्तिगत भूमि का भी ध्यान रखना था. इसलिए आयोग ने एक ऐसी सीमा रेखा खींचने का फैसला किया, जिससे कम से कम लोगों को स्थानांतरण करना पड़े. इसके अलावा किसान भी अपने जमीनों से दूर न हों. अब सीमा निर्धारण आयोग को 4,50,000 वर्ग किमी के क्षेत्र के बीच 88 मिलियन लोगों के लिए एक सीमा रेखा खिंचनी थी.

आयोग में पांच लोग थे शामिल

पंजाब और बंगाल दोनों सीमाओं के आयोग में पांच-पांच सदस्य शामिल थे. प्रत्येक आयोग में सर सिरिल रैडक्लिफ के अलावा मुस्लिम लीग के नाॅमिनेटेड दो सदस्य और काॅंग्रेस पार्टी के द्वारा नाॅमिनेटेड दो सदस्य शामिल थे. सर सिरिल को 15 अगस्त 1947 तक सीमा निर्धारण का काम खत्म करने को कहा गया था. 12 अगस्त तक दोनों देशों की सीमाओं का निर्धारण भी कर दिया गया था लेकिन आधिकारिक रुप से इसे जारी नहीं किया गया था.

ऐसा कहा जाता है कि ब्रिटिश इंडिया के अंतिम गवर्नर जनरल लाॅर्ड माउंटबेटेन नहीं चाहते थे कि दोनों देशों की स्वतंत्रता दिवस समारोहों पर सीमा रेखा को तरजीह दी जाए क्योंकि कराची और दिल्ली दोनों जगह की अध्यक्षता वे ही कर रहे थे. वे नहीं चाहते थे कि स्वतंत्रता समारोह के पहले सीमा रेखा को लेकर कोई नया विवाद खड़ा हो जाए. नतीजा यह हुआ कि भारत और पाकिस्तान की आजादी के बाद कुछ सीमा से सटे भारतीय जिलों ने अपना देश पाकिस्तान को मान लिया और पाकिस्तानी जिलों ने भारत को अपना देश समझ लिया. 

अंतिम फैसला रैडक्लिफ पर छोड़ा गया

मुस्लिम लीग और कांग्रेस के प्रतिनिधिनयों में कई मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई. इसलिए अंतिम फैसला सीमा निर्धारण आयोग की चेयरमैन सर सिरिल रैडक्लिफ पर छोड़ दिया गया. कुछ क्षेत्रों में किसी समुदाय की साफ बहुमत नहीं होने, दूसरे देश में पहुंच की कमी और सांस्कृतिक अंतर होने की वजह से दोनों में से किसी भी देश को देने में काफी दिक्कत आ रही थी. इसलिए कुछ मस्लिम बहुल इलाकों को भारत को दे दिया गया, वहीं कुछ हिंदु बहुल इलाकों को पाकिस्तान को दे गया.

पंजाब प्रांत में अमृतसर का अजनाला, गुरदासपुर और फिरोजपुर इलाके को मुस्लिम बहुल होने के बावजूद भारत का हिस्सा बना दिया गया. वहीं चटगांव जिसकी लगभग 97 प्रतिशत गैर-मुस्लिम आबादी या बौद्ध आबादी होने बावजूद भारत उनकी पहुंच की कमी की वजह से पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया गया. इसके अलावा 51 प्रतिशत हिंदु आबादी वाला खुलना जिला पाकिस्तान में शामिल हो गया और 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाला मुर्शिदाबाद भारत में शामिल हो गया. 

विभाजन कारण गई 10 लाख से अधिक जानें

देश के विभाजन के समय 10 लाख से अधिक लोगों की जानें गईं इसके अलावा एक करोड़ से अधिक लोगों को स्थानांतरित पर होना पड़ा. सर सिरिल रैडक्लिफ सीमा निर्धारण की रेखा जारी होने से पहले ही भारत छोड़कर ब्रिटेन चले गए. उन्होंने सीमा निर्धारण के लिए तय 40,000 रुपये का पेमेंट भी नहीं लिया.