चींटियों के बारे में रोचक तथ्य | Interesting facts about Ants

दुनिया भर में चींटियों की 10,000 से ज्यादा प्रजातियां मौजूद हैं. ये चीटियां आकार में ये 2 से 7 मिलीमीटर के बीच होती हैं. सबसे बड़ी चींटी कार्पेंटर चींटी कहलाती है. उसका शरीर करीब 2 सेंटीमीटर बड़ा होता है. एक चींटी अपने वजन से 20 गुना ज्यादा भार ढो सकती है.
कीटों में चींटी का दिमाग सबसे तेज माना जाता है. इसमें करीब 250,000 मस्तिष्क कोशिकाएं होती हैं.

सबसे बड़ी चीटी

रानी चींटी सबसे बड़ी होती है. इसका अहम काम अंडे देना है, यह हजारों अंडे देती है. नर चींटे का शरीर छोटा होता है. यह रानी चींटी को गर्भवती करने के कुछ दिन बाद मर जाता है. अन्य चींटियों का काम खाना लाना, बच्चों की देखरेख करना, और कालोनीनुमा घर बनाना है. साथ ही रक्षक चींटियों का काम घर की हिफाजत करना होता है.

सुन नहीं सकती

असल में चींटियां सुन नहीं सकतीं क्योंकि उनके कान नहीं होते. हालांकि ये जीव ध्वनि को कंपन से महसूस कर सकते हैं. आसपास की आवाज को सुनने के लिए ये घुटने और पांव में लगे खास सेंसर पर निर्भर करते हैं.

दो पेट

चींटियों के दो पेट होते हैं. एक में खुद के शरीर के लिए खाना होता है और दूसरे में कालोनी में रहने वाली दूसरी चींटियों के लिए खाना होता है.

चीटी की उम्र

रानी चींटी की उम्र लंबी होती है, वह 20 साल भी जीवित रह सकती है. उसकी मदद करने वाली अन्य चींटियां करीब 45-60 दिन ही जीवित रहती हैं. और अगर रानी मर जाती है तो कुछ ही दिनों में चींटियों की कालोनी नष्ट हो जाती है.

सीमा विस्तार

चींटियों की हर कालोनी की एक तय सीमा होती है. वे लगातार अपनी सीमा का विस्तार करने की कोशिश करती रहती हैं. अगर ऐसा होता है तो युद्ध छिड़ जाता है जो अक्सर कई घंटों तक या कई बार कई हफ्तों तक भी चलता है.

धमाका करने वाली चीटी

न्यूयॉर्क टाइम्स ने जर्नल ज़ूकीज़ में छपी रिसर्च के हवाले से बताया था कि ब्रुनेई के कुआला बेलालॉन्ग फ़ील्ड स्टडीज़ सेंटर के सामने पेड़ों के क़रीब चीटियों के ऐसे कई घर हैं, जो अपने घर पर हमला होने की सूरत में अपनी जान देने से भी पीछे नहीं हटतीं.

इन चीटियों को धमाका करने की ख़ास प्रवृति की वजह से कोलोबोपसिस एक्सप्लोडेंस कहा जाता है. जब इनके घोंसलों पर हमला या अतिक्रमण किया जाता है तो वो अपने पेट में धमाका कर लेती हैं.

ऐसा करने से उनके पेट से चिपचिपा, चमकीला, पीला फ़्लूइड निकलता है, जो ज़हरीला होता है. जिस तरह मधुमक्खी डंक मारने के बाद दम तोड़ देती है, उसी तरह ये चींटियां भी अपनी जान दे देती हैं. लेकिन उनकी ये शहादत कॉलोनी को बचा लेती है.

वैज्ञानिक ख़ुद फटने वाली इन चीटियों के बारे में दो सौ साल से ज़्यादा वक़्त से जानते हैं और सबसे पहले 1916 में इनके बारे में लिखा गया था. लेकिन साल 1935 से इस समूह की चींटियों को कोई आधिकारिक नाम नहीं दिया गया था.

हाथी डरते हैं

हम और आप बचपन से सुनते हैं आये हैं कि हाथी, चीटीं से डरते हैं लेकिन साल २०१० में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि भी हो गई. शोध के मुताबिक पूर्वी अफ़्रीका में बबूल और कीकर के पेड़ों पर रह रही चींटियाँ हाथियों से उन पेड़ों को बचाती हैं.

कीनिया में किए गए इस शोध में अमरीकी शोधार्थियों ने पाया कि हाल के वर्षों में हाथियों की वजह से पेड़ों को काफ़ी नुकसान पहुँचा है, लेकिन बबूल और कीकर के पेड़ों पर रह रही चींटियों की वजह से इन पेड़ों को हाथी से नुकसान नहीं पहुँचता.

शोधकर्ताओं ने पाया कि हाथियों ने पेड़ की उन शाखाओं को छूआ तक नहीं जिस पर चीटियाँ थी. उन्हें चीटियों की गंध लग जाती थी हाथियों को इस बात का डर था कि उनके सूंड़ में चींटियां घुस कर उन्हें काट सकती हैं.

 

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