किसे कहते हैं बादल का फटना और वैज्ञानिकों को पूर्वानुमान लगाने में क्यों होती है दिक्कत

मानसून में हर साल तेज बारिश के कारण भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं सुनने को मिलती हैं. हाल में जम्मू, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में बादल फटने की घटनाएं सामने आयी हैं. विशेषज्ञों की माने तो इसका पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है क्योंकि यह घटनाएं अधिकांशतः स्थानीय स्तर पर होती हैं.

बादलों का फटने का मतलब होता है कि एका एक बहुत अधिक बारिश का होना. तकनीकी रूप में कहें तो किसी इलाके में एक घंटे के भीतर 10 सेमी से अधिक भारिश हो तो उसे बादल फटना कहते हैं.

जब गर्म मानसूनी हवाएं ठंडी हवाओं से अंतरक्रिया करती है तो इससे बहुत बड़े बादल बनते हैं. ऐसा भूआकृतियों और पर्वतीय कारणों के कारण भी हो सकते हैं. क्यू्म्यलोनिम्बस तुफानी बादल समुद्र तल से 13 से 14 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित होते हैं.

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Source- News18Hindi

बादल फटने के नुकसान-

आप सोचते होंगे कि बारिश होना अच्छी बात है. लेकिन ज्यादा बारिश होने के कुछ नुकसान भी हैं. बादल फटने में बहुत ज्यादा पानी गिरता है जिसकी वजह से संपत्ति का काफी नुकसान होता है. कई बार इंसानों की इसकी चपेट में आने से मौत हो जाती है. पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन की आशंका बढ़ जाती है. भारतीय मौसम विभाग के डायरेक्टर जनरल मृत्युंजय महापात्रा के अनुसार बादलों का फटना बहुत ही छोटे स्तर की घटना है. ज्यादात्तर बादल हिमालय या पश्चिमी घाटों के पहाड़ी इलाकों में फटते हैं.

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पूर्वानुमान लगाना है मुश्किल-

मौसम विभाग के वैज्ञानिकों के अनुसार बादल फटने की घटनाओं का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल होता है क्योंकि जगह और समय के हिसाब से यह एक छोटी घटना है.

बादल एक ही क्षेत्र के ऊपर जब फंस जाते हैं और हवाओं के न चलने के कारण वे फैल नहीं पाते हैं तो बादल बहुत ही तेजी के साथ बारिश के रूप में जमीन पर गिर जाते हैं. हालांकि बादलों के फटने की घटनाओं का पूर्वानुमान के लिए पहाड़ी इलाकों में रडार लगाने की जरुरत होती है. इसके लिए एक बेहद ही उच्च क्षमता वाली रडार की आवश्यकता होती है.

भारत में अचानक से बादल फटने की घटनाओं में इजाफा हुआ है. इसके लिए कई कारण जिम्मेदार हैं. जैसे वक्त से पहले या बाद में मानसून का आना और असामान्य और अनियमित रूप से बारिश होना.