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SHAHID AZMI : ज़िंदगी की वकालत करने वाले को मिली मौत की सज़ा

साल 1994 में उन्हें शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे और कुछ बड़े नेताओं की हत्या की साज़िश में गिरफ्तार कर लिया गया.....

SHAHID AZMI ये वो नाम है जो सुर्ख़ियों  में आज से लगभग 9 साल पहले आया जब उनकी हत्या कर दी गई. एक वकील जिसने अपना पूरा जीवन सिर्फ निर्दोष लोगो को झूठे आरोपों से बचाने में लगा दिया जिसके लिए उनको सिर्फ देश के सिस्टम से नहीं, उन बड़े और कद्दावर लोगों से नहीं, बल्कि अपने परिवार से भी विरोध झेलना पड़ा उनकी पत्नी ने उन्हें तलाक दे दिया. आज से एक दिन पहले यानी की 11 Feb 2010 को SHAHID AZMI  की गोली मार कर हत्या कर दी गई. चलिए शुरू से शुरू करते हैं.

शाहिद अज़मी का जन्म 1977 को गोवंडी मुंबई में हुआ था ये अपने 5 भाई बहनो में तीसरे थे. बात 1992 की है जब बाबरी मस्जिद विध्वंश के बाद जनता में आक्रोश था और जगह जगह साम्प्रदायिक दंगे भड़के हुए थे, मुंबई भी दंगों की आग से अछूता नहीं था. शाहिद उस वक्त महज 14 वर्ष के थे जब उन्हें पुलिस ने दंगाइयों की मदद के आरोप में पकड़ा.

लेकिन बालिग न होने की वजह से छोड़ भी दिया गया इसके बाद से ही शाहिद और शाहिद जैसे और बच्चो के मन में भी प्रशाशन के खिलाफ ज़हर भरा गया. जिसके फलस्वरूप वे भी अपने  साथियों के साथ कश्मीर चले गए मिलिटेंट कैंप में ट्रेनिंग लेने के लिए पर कुछ ही दिनों में वहां की बर्बरता से घबराकर वापस मुंबई भाग आए. कश्मीर जाना उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलतियों में शुमार है क्यूंकि इसकी खबर पुलिस को लग गई थी.

साल 1994 में उन्हें शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे और कुछ बड़े नेताओं की हत्या की साज़िश में गिरफ्तार कर लिया गया केस चलता रहा और जब फैसला आया की उन्हें सभी आरोपों मुक्त किया जाता है. अर्थात वो निर्दोष हैं तब तक 7 साल बीत चुके थे और शाहिद समझ चुके थे की अगर सिस्टम और कानून से लड़ना है. तो उनको कानून के बारे में जानकारी होनी चाहिए इसलिए उन्होंने जेल में ही रहते हुए अपना पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया. LLB की पढ़ाई भी पूरी की उन्होंने अपना जीवन सिर्फ उन लोगों के लिए लड़ने में लगा दिया. जो उन्हें पुलिस द्वारा सिर्फ इस लिए पकड़ा गया था या TADA जैसे संगीन आरोप लगाए गए थे क्यूंकि उनके नाम मुस्लिम थे.

उन्होंने अपने वकालत के करियर की शुरुआत 2003 से की और उनको पहली सफलता मिली. घाटकोपर बस बॉम्बिंग केस में अपने 7 साल के छोटे से करियर में उन्होंने कई हाई प्रोफाइल केसेस किए.

जिनमें आरोपी के ऊपर TADA, POTA, और MCOCA जैसी धाराओं में केस  चल रहा था. लगभग 17 निर्दोष लोगों को अदालत से बरी कराया इस बीच उनको कई बार धमकी भी मिली पर उन्होंने कभी अपने कदम पीछे नहीं हटाए.

साल 2009 में जब वे कहीं जा रहे थे तब उनकी कार पर भी जान लेवा हमला हुआ था. 2010 में जब वे 26/11 मुंबई ब्लास्ट के भारतीय आरोपी फहीम अंसारी की  पैरवी कर रहे थे. ये साबित करने की कोशिश कर रहे थे की फहीम को भी सिर्फ उनके नाम के आधार पर ही फसाया जा रहा है.

उनको धमकियाँ बढ़ने लगी पर वे पीछे नहीं हटे  और आखिर में जब शहीद नहीं माने तो उनको रोकने के लिए उनकी हत्या कर दी गई. हालाँकि फहीम को सबूतों के अभाव में कोर्ट ने 2012 में बरी कर दिया.

आपको बता दें की शाहिद पर SHAHID नाम से ही 2013 में एक फिल्म भी आयी थी. जिसमें शाहिद का किरदार Rajkumar Rao ने निभाया था फिल्म में Shahid Azmi की ज़िंदगी को बखूभी दिखाया गया है.

और इसी के साथ हमारे बीच से उम्मीद की एक और लौ विदा ले गई, शाहिद की कहानी हमें प्रेरणा देती है की हमारे साथ कितना भी गलत हो जाये हम न्यायिक और सही मार्ग पर चल कर दुनिया को एक बेहतर जगह बना सकते है हमारे आने वाली पीढ़ी के लिए.

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